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पढ़ाई से बचने के लिए अखाड़े में उतरा बजरंग, अब दुनिया में दिखा रहा कुश्ती का दम
Updated Tue, 27 Mar 2018 01:55 AM IST
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मनीष कुमार
बहादुरगढ़।
कॉमनवेल्थ गेम्स-2018 में देश का प्रतिनिधित्व करने जा रहे जिले के लाल अर्जुन अवॉर्डी बजरंग पूनिया ने पढ़ाई से बचने के लिए कुश्ती की दुनिया में कदम रखा। शुरुआती संघर्ष के बाद किसान का यह बेटा अब दुनिया में कुश्ती का सितारा बनकर चमक रहा है। कॉमनवेल्थ गेम्स में पूरी दुनिया बजरंगी के कुश्ती का दम देखेगी।
ऐसे हुई शुरुआत
गांव खुड्डन के किसान बलवान पूनिया के यहां 24 फरवरी 1994 में बजरंग का जन्म हुआ। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे बजरंग का पढ़ाई में ज्यादा मन नहीं लगता था। स्कूल से बचने के लिए अक्सर वह गांव के अखाड़े में पहुंच जाता। कुश्ती के प्रति उसकी रुचि देख पिता बलवान ने उसे अखाड़े में भेजना शुरू कर दिया। सात वर्ष की उम्र में बजरंग ने कुश्ती की एबीसीडी सीखनी शुरू की। इसके बाद करीब 10 वर्ष की आयु में परिजनों ने उसे छारा स्थित लाला दीवानचंद अखाड़े में छोड़ दिया। यहां गुरु आर्य वीरेंद्र के मार्गदर्शन में उसके खेल में निखार आया। महज 13 वर्ष की आयु में ही बजरंग ने सब जूनियर में ब्रांज और सिलवर मेडल जीते। इसके उपरांत बजरंग दिल्ली के छत्रसाल अखाड़े में चला गया। यहां गुरु महाबली सतपाल की देखरेख में ओलंपियन योगेश्वर के सहयोग से बजरंगी इंटरनेशनल चैंपियन बनकर उभरा। इसके बाद बजरंग ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और कामयाबी का सिलसिला शुरू हो गया।
ईरानी और क्लिंच पसंदीदा दाव
24 वर्षीय बजरंग वर्ल्ड कुश्ती चैंपियनशिप में 2 मेडल जीतने वाला एकमात्र भारतीय पहलवान है। श्रेष्ठ पहलवानी पर वर्ष-2015 में बजरंग को अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया। ईरानी और क्लिंच बजरंग के पसंदीदा दाव हैं। पहलवानी के अलावा बजरंग रेलवे में टीटीई है।
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पिता बोले, गोल्ड ल्यावैगा म्हारा छोरा
पिता बलवान ने कहा कि बजरंग ने अपनी मेहनत से उनका नाम रोशन किया है। जब भी कहीं बजरंग का जिक्र होता है तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। बकौल बलवान, कॉमनवेल्थ गेम्स मैं इबकै उनका छोरा गोल्ड मेडल ल्यावैगा। जब जीत कै आवैगा तो पूरे गाम में जश्न मनावैंगे।
इस बार जीतूंगा गोल्ड, फिर ओलंपिक की तैयारी
अमर उजाला से बातचीत में बजरंग पूनिया ने कहा कि पिछले कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड से चूक गया था, मगर इस बार गोल्ड मेडल के लिए जी-जान लड़ा दूंगा। उसका सपना ओलंपिक में देश के लिए मेडल जीतना है। कॉमनवेल्थ के बाद टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतना ही उसका लक्ष्य रहेगा। शादी के बारे में बजरंग ने कहा कि यह काम परिजनों का है, उसका तो फोकस केवल पहलवानी पर है। बजरंग ने युवाओं को नशे व अन्य बुुराई से दूर होकर माता-पिता की सेवा और राष्ट्रहित में कार्य करने का संदेश दिया है।
योगेश्वर दत्त का चहेता है बजरंग
बजरंग ओलंपियन योगेश्वर दत्त को बड़ा भाई, आईडियल और गुरु मानता है। वर्ष 2008 से वह योगेश्वर के साथ है। छत्रसाल अखाड़े को छोड़ने के बाद बजरंग बीते दो साल से योगेश्वर से ही ट्रेनिंग ले रहा है। योगेश्वर भी बजरंग को छोटा भाई मानता है। योगेश्वर ने बजरंग के लिए ही 61 केजी कैटेगिरी छोड़ी थी। अब 65 किलोग्राम कैटेगिरी भी छोड़ दी। बजरंग का कहना है कि योगी भाई के सहयोग से ही आज वह इस मुकाम पर है।
बजरंग की उपलब्धियां
- अर्जुन अवॉर्ड
- वर्ल्ड चैंपियनशिप 2013 में ब्रांज
- कॉमनवेल्थ गेम्स 2014 में सिल्वर
- एशियन गेम्स 2014 सिलवर
- एशियन चैंपियनशिप 2013 में ब्रांज
- एशियन चैंपियनशिप 2014 में सिल्वर
- एशियन चैंपियनशिप 2017 में गोल्ड
- कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप सिंगापुर 2016 गोल्ड
- एशियन इंडोर गेम 2017 में गोल्ड
- वर्ल्ड चैंपियनशिप 2017 में सिल्वर
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बहादुरगढ़।
कॉमनवेल्थ गेम्स-2018 में देश का प्रतिनिधित्व करने जा रहे जिले के लाल अर्जुन अवॉर्डी बजरंग पूनिया ने पढ़ाई से बचने के लिए कुश्ती की दुनिया में कदम रखा। शुरुआती संघर्ष के बाद किसान का यह बेटा अब दुनिया में कुश्ती का सितारा बनकर चमक रहा है। कॉमनवेल्थ गेम्स में पूरी दुनिया बजरंगी के कुश्ती का दम देखेगी।
ऐसे हुई शुरुआत
गांव खुड्डन के किसान बलवान पूनिया के यहां 24 फरवरी 1994 में बजरंग का जन्म हुआ। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे बजरंग का पढ़ाई में ज्यादा मन नहीं लगता था। स्कूल से बचने के लिए अक्सर वह गांव के अखाड़े में पहुंच जाता। कुश्ती के प्रति उसकी रुचि देख पिता बलवान ने उसे अखाड़े में भेजना शुरू कर दिया। सात वर्ष की उम्र में बजरंग ने कुश्ती की एबीसीडी सीखनी शुरू की। इसके बाद करीब 10 वर्ष की आयु में परिजनों ने उसे छारा स्थित लाला दीवानचंद अखाड़े में छोड़ दिया। यहां गुरु आर्य वीरेंद्र के मार्गदर्शन में उसके खेल में निखार आया। महज 13 वर्ष की आयु में ही बजरंग ने सब जूनियर में ब्रांज और सिलवर मेडल जीते। इसके उपरांत बजरंग दिल्ली के छत्रसाल अखाड़े में चला गया। यहां गुरु महाबली सतपाल की देखरेख में ओलंपियन योगेश्वर के सहयोग से बजरंगी इंटरनेशनल चैंपियन बनकर उभरा। इसके बाद बजरंग ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और कामयाबी का सिलसिला शुरू हो गया।
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ईरानी और क्लिंच पसंदीदा दाव
24 वर्षीय बजरंग वर्ल्ड कुश्ती चैंपियनशिप में 2 मेडल जीतने वाला एकमात्र भारतीय पहलवान है। श्रेष्ठ पहलवानी पर वर्ष-2015 में बजरंग को अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया। ईरानी और क्लिंच बजरंग के पसंदीदा दाव हैं। पहलवानी के अलावा बजरंग रेलवे में टीटीई है।
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पिता बोले, गोल्ड ल्यावैगा म्हारा छोरा
पिता बलवान ने कहा कि बजरंग ने अपनी मेहनत से उनका नाम रोशन किया है। जब भी कहीं बजरंग का जिक्र होता है तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। बकौल बलवान, कॉमनवेल्थ गेम्स मैं इबकै उनका छोरा गोल्ड मेडल ल्यावैगा। जब जीत कै आवैगा तो पूरे गाम में जश्न मनावैंगे।
इस बार जीतूंगा गोल्ड, फिर ओलंपिक की तैयारी
अमर उजाला से बातचीत में बजरंग पूनिया ने कहा कि पिछले कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड से चूक गया था, मगर इस बार गोल्ड मेडल के लिए जी-जान लड़ा दूंगा। उसका सपना ओलंपिक में देश के लिए मेडल जीतना है। कॉमनवेल्थ के बाद टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतना ही उसका लक्ष्य रहेगा। शादी के बारे में बजरंग ने कहा कि यह काम परिजनों का है, उसका तो फोकस केवल पहलवानी पर है। बजरंग ने युवाओं को नशे व अन्य बुुराई से दूर होकर माता-पिता की सेवा और राष्ट्रहित में कार्य करने का संदेश दिया है।
योगेश्वर दत्त का चहेता है बजरंग
बजरंग ओलंपियन योगेश्वर दत्त को बड़ा भाई, आईडियल और गुरु मानता है। वर्ष 2008 से वह योगेश्वर के साथ है। छत्रसाल अखाड़े को छोड़ने के बाद बजरंग बीते दो साल से योगेश्वर से ही ट्रेनिंग ले रहा है। योगेश्वर भी बजरंग को छोटा भाई मानता है। योगेश्वर ने बजरंग के लिए ही 61 केजी कैटेगिरी छोड़ी थी। अब 65 किलोग्राम कैटेगिरी भी छोड़ दी। बजरंग का कहना है कि योगी भाई के सहयोग से ही आज वह इस मुकाम पर है।
बजरंग की उपलब्धियां
- अर्जुन अवॉर्ड
- वर्ल्ड चैंपियनशिप 2013 में ब्रांज
- कॉमनवेल्थ गेम्स 2014 में सिल्वर
- एशियन गेम्स 2014 सिलवर
- एशियन चैंपियनशिप 2013 में ब्रांज
- एशियन चैंपियनशिप 2014 में सिल्वर
- एशियन चैंपियनशिप 2017 में गोल्ड
- कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप सिंगापुर 2016 गोल्ड
- एशियन इंडोर गेम 2017 में गोल्ड
- वर्ल्ड चैंपियनशिप 2017 में सिल्वर