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Hisar News: चौधर गामां की... बैल वाला पुरा से बने बहबलपुर को विरासत में मिली राजनीति, गाजर की मिठास ने दी पहचान
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बहबलपुर के कुएं पर की गई पेंटिंग।
हिसार। शहर से 25 किलोमीटर दूर स्थित गांव बहबलपुर अपने राजनीतिक रसूख के लिए अलग ही पहचान रखता है। विधायक से जिला परिषद चेयरमैन तक और वर्तमान जिला कांग्रेस अध्यक्ष (ग्रामीण) भी इसी गांव के रहने वाले हैं। हरियाणा गठन से पहले संयुक्त पंजाब के समय गांव के हुन्नामल गोयल हिसार विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे।
करीब 6 हजार की आबादी वाला बहबलपुर गांव नेशनल हाईवे 52 पर स्थित है। इस गांव को स्वच्छता के मामले में राज्य स्तर पर कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। गांव में एक पार्क, वातानुकूलित पुस्तकालय और खेलने के लिए स्टेडियम भी है। गांव को गाजर की खेती के लिए भी जाना जाता है। बड़ी संख्या में लोग गाजर की पैदावार लेते हैं। गांव की एक खासियत यहां का सता मंदिर है। दिवाली से एक दिन पहले कई राज्यों से श्रद्धालु यहां आकर पूजा-अर्चना करते हैं।
गांव में ये हैं समस्याएं
गांव में अतिक्रमण की बड़ी समस्या है। लोगों ने जोहड़ों पर कब्जे किए हुए हैं। इस कारण जलभराव की समस्या रहती है। जलभराव का दूसरा कारण यह भी है कि लंबे समय से जोहड़ों की खोदाई भी नहीं की गई है। गांव में पेयजल की भी किल्लत है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। इस वजह से ग्रामीणों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अन्य गांवों या निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है।
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राजनीति ने दी पहचान
ग्रामीण बंसीलाल बताते हैं कि वर्ष 1962 में संयुक्त पंजाब के समय बहबलपुर के रहने वाले हुन्नामल गोयल हिसार विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे। उन्होंने साेशलिस्ट पार्टी की टिकट से चुनाव लड़ा था और बलवंत राय तायल को हराया था। सबसे पहले पेयजल सुविधा इसी गांव में उपलब्ध करवाई गई। उस समय हिसार हलके में तीन स्कूल थे, जिनमें से एक बहबलपुर में था। हिसार-बरवाला रोड को अपग्रेड करवाया था। इसके बाद हुड्डा सरकार में गांव के बृजलाल जिला परिषद के चेयरमैन बने थे। वर्तमान में कांग्रेस के जिलाध्यक्ष (ग्रामीण) बृजलाल इसी गांव के हैं और कुम्हार महासभा के जिला प्रधान भजनलाल भी यहीं के रहने वाले हैं।
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गांव में है तीन पुस्तकालय
गांव में 4 एकड़ में स्टेडियम बना हुआ है। इसमें ओपन जिम की भी सुविधा है। गांव में कुश्ती हॉल भी है और एक खेल नर्सरी चल रही है। गांव के कुश्ती खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुके हैं। गांव में तीन पुस्तकालय हैं और पीएमश्री गवर्नमेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल भी है।
- सुशील, ग्रामीण
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300 एकड़ में गाजर की खेती
गांव गाजर की खेती के लिए मशहूर है। कई साल पहले ग्रामीण जय सिंह ने गाजर की खेती शुरू की थी। उन्हें देखकर अन्य ग्रामीण भी करने लगे। पिछले साल करीब 300 एकड़ में गाजर की खेती हुई थी। गाजर की मिठास अच्छी होने के कारण पंजाब, राजस्थान, चंडीगढ़ व दिल्ली में भी सप्लाई की जाती है। गाजर के अलावा प्याज, गोभी, तोरी, घीया आदि सब्जियां भी उगाई जाती हैं। - रोहताश जांगड़ा, ग्रामीण।
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बैल वाला पुरा से बना बहबलपुर
करीब 250 साल पहले पुरा नाम के व्यक्ति ने इस गांव को बसाया था। वह राजस्थान के बगड़ी गांव से आया था। उसके पास एक बैल भी था। उसके नाम से इस गांव को बैल वाला पुरा कहा जाने लगा। समय के साथ-साथ नाम में बदलाव होता गया है और आज यह नाम बहबलपुर हो गया। पुरा की 9वीं पीढ़ी गांव में रह रही है। गांव में सता मंदिर है।
- गुलाब सिंह, ग्रामीण।
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सता मंदिर आस्था का केंद्र
गांव में सता मंदिर है, जो सबसे पुराना है। रामदेव मंदिर, दादा खेड़ा का मंदिर, हनुमान मंदिर भी है। सता मंदिर के बारे में कहा जाता है कि बनिया समाज का एक व्यक्ति यहां लड़ते हुए आया और उसकी धड़ पड़ी मिली थी। उन्हीं के नाम पर यह मंदिर बनाया गया। बनिया समाज में इस मंदिर की काफी मान्यता है। दिवाली से एक दिन पहले कोलकाता, मुंबई व अहमदाबाद आदि शहरों से लोग यहां आकर पूजा करते हैं। - दीवान चंद, ग्रामीण।
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बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने का प्रयास
शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल व सड़क आदि बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने का प्रयास किया जा रहा है। गांव में पुस्तकालयों का निर्माण करवाया है, जहां बच्चे शांत माहौल में पढ़ सकते हैं। यह सुविधा निशुल्क है। स्टेडियम का भी निर्माण करवाया है। पेयजल का प्रोजेक्ट अभी चल रहा है। तीन-चार माह में शुरू होने की संभावना है। ग्रामीणों को स्वच्छ जल व ढाणियों में लाइट की सुविधा उपलब्ध करवाने की योजना है।
- रमेश, सरपंच
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करीब 6 हजार की आबादी वाला बहबलपुर गांव नेशनल हाईवे 52 पर स्थित है। इस गांव को स्वच्छता के मामले में राज्य स्तर पर कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। गांव में एक पार्क, वातानुकूलित पुस्तकालय और खेलने के लिए स्टेडियम भी है। गांव को गाजर की खेती के लिए भी जाना जाता है। बड़ी संख्या में लोग गाजर की पैदावार लेते हैं। गांव की एक खासियत यहां का सता मंदिर है। दिवाली से एक दिन पहले कई राज्यों से श्रद्धालु यहां आकर पूजा-अर्चना करते हैं।
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गांव में ये हैं समस्याएं
गांव में अतिक्रमण की बड़ी समस्या है। लोगों ने जोहड़ों पर कब्जे किए हुए हैं। इस कारण जलभराव की समस्या रहती है। जलभराव का दूसरा कारण यह भी है कि लंबे समय से जोहड़ों की खोदाई भी नहीं की गई है। गांव में पेयजल की भी किल्लत है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। इस वजह से ग्रामीणों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अन्य गांवों या निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है।
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राजनीति ने दी पहचान
ग्रामीण बंसीलाल बताते हैं कि वर्ष 1962 में संयुक्त पंजाब के समय बहबलपुर के रहने वाले हुन्नामल गोयल हिसार विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे। उन्होंने साेशलिस्ट पार्टी की टिकट से चुनाव लड़ा था और बलवंत राय तायल को हराया था। सबसे पहले पेयजल सुविधा इसी गांव में उपलब्ध करवाई गई। उस समय हिसार हलके में तीन स्कूल थे, जिनमें से एक बहबलपुर में था। हिसार-बरवाला रोड को अपग्रेड करवाया था। इसके बाद हुड्डा सरकार में गांव के बृजलाल जिला परिषद के चेयरमैन बने थे। वर्तमान में कांग्रेस के जिलाध्यक्ष (ग्रामीण) बृजलाल इसी गांव के हैं और कुम्हार महासभा के जिला प्रधान भजनलाल भी यहीं के रहने वाले हैं।
गांव में है तीन पुस्तकालय
गांव में 4 एकड़ में स्टेडियम बना हुआ है। इसमें ओपन जिम की भी सुविधा है। गांव में कुश्ती हॉल भी है और एक खेल नर्सरी चल रही है। गांव के कुश्ती खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुके हैं। गांव में तीन पुस्तकालय हैं और पीएमश्री गवर्नमेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल भी है।
- सुशील, ग्रामीण
300 एकड़ में गाजर की खेती
गांव गाजर की खेती के लिए मशहूर है। कई साल पहले ग्रामीण जय सिंह ने गाजर की खेती शुरू की थी। उन्हें देखकर अन्य ग्रामीण भी करने लगे। पिछले साल करीब 300 एकड़ में गाजर की खेती हुई थी। गाजर की मिठास अच्छी होने के कारण पंजाब, राजस्थान, चंडीगढ़ व दिल्ली में भी सप्लाई की जाती है। गाजर के अलावा प्याज, गोभी, तोरी, घीया आदि सब्जियां भी उगाई जाती हैं। - रोहताश जांगड़ा, ग्रामीण।
बैल वाला पुरा से बना बहबलपुर
करीब 250 साल पहले पुरा नाम के व्यक्ति ने इस गांव को बसाया था। वह राजस्थान के बगड़ी गांव से आया था। उसके पास एक बैल भी था। उसके नाम से इस गांव को बैल वाला पुरा कहा जाने लगा। समय के साथ-साथ नाम में बदलाव होता गया है और आज यह नाम बहबलपुर हो गया। पुरा की 9वीं पीढ़ी गांव में रह रही है। गांव में सता मंदिर है।
- गुलाब सिंह, ग्रामीण।
सता मंदिर आस्था का केंद्र
गांव में सता मंदिर है, जो सबसे पुराना है। रामदेव मंदिर, दादा खेड़ा का मंदिर, हनुमान मंदिर भी है। सता मंदिर के बारे में कहा जाता है कि बनिया समाज का एक व्यक्ति यहां लड़ते हुए आया और उसकी धड़ पड़ी मिली थी। उन्हीं के नाम पर यह मंदिर बनाया गया। बनिया समाज में इस मंदिर की काफी मान्यता है। दिवाली से एक दिन पहले कोलकाता, मुंबई व अहमदाबाद आदि शहरों से लोग यहां आकर पूजा करते हैं। - दीवान चंद, ग्रामीण।
बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने का प्रयास
शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल व सड़क आदि बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने का प्रयास किया जा रहा है। गांव में पुस्तकालयों का निर्माण करवाया है, जहां बच्चे शांत माहौल में पढ़ सकते हैं। यह सुविधा निशुल्क है। स्टेडियम का भी निर्माण करवाया है। पेयजल का प्रोजेक्ट अभी चल रहा है। तीन-चार माह में शुरू होने की संभावना है। ग्रामीणों को स्वच्छ जल व ढाणियों में लाइट की सुविधा उपलब्ध करवाने की योजना है।
- रमेश, सरपंच