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मुर्राह के बाद लुप्त हो रही भैंसों की नस्ल बचाएगा एलएलआरयू
अमर उजाला ब्यूरो/हिसार/सुनील बैनीवाल
Updated Thu, 30 Jul 2015 01:29 AM IST
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मुर्रा नस्ल को एक आयाम तक पहुंचाने के बाद लुवास प्रशासन प्रदेश की लुप्त होने वाली भैंसों की नस्ल को बचाएगा। इसी के चलते लुवास प्लानिंग में जुट गया है।
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फिलहाल वह खुद की विकसित की गई मुर्रा नस्ल पर शोध कर उसे और बेहतर व किसानों के लिए लाभकारी बनाने में लगा हुआ है। इसी को लेकर उसने प्रदेश सरकार से ग्रांट की मांग भी की है।
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गौरतलब है कि लुवास विश्वविद्यालय की मुर्रा नस्ल प्रदेश भर में धूम मचाए हुए है। प्रदेश के लगभग हर घर में उसकी यह मुर्रा भैंस लगभग पहुंच चुकी है और लुवास विश्वविद्यालय इस नस्ल को देश भर में फैलाना चाहता है।
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प्रदेश में लुवास द्वारा विकसित की गई मुर्रा नस्ल का वर्चस्व कायम हो गया है। 30 किलो से ज्यादा दूध देने वाली यह भैंस अब पशुपालकों की चहेती बनी हुई है।
दो नस्लों के जिन को मिलाकर यह मुर्रा नस्ल लुवास वैज्ञानिकों ने तैयार की थी, जिसकी मांग दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। इसी के चलते इस किस्म को विकसित किया जा रहा है, ताकि लोगों को कम दामों में बेहतर मुर्रा नस्ल की कटड़ी व भैंस मिल सके और किसान दूध बेचकर खुद को संपन्न बना सके।
यह नस्लें हो गईं लुप्त
कई नस्लों की भैंसे कुछ सालों पहले प्रदेश में पाई जाती थी। लेकिन मुर्रा के आने से अन्य नस्लों की भैंसें लगातार कम होती गई। हालात यह हैं कि वह नस्लें लुप्त होने की कगार पर हैं।
प्रदेश मेें एक समय था जब किसान के घरों में नीली रावी व जाफरवादी नस्ल की भैंस पाई जाती थीं, जो देखने में मुर्रा से बिल्कुल अलग थीं। दूध की मात्रा कम होने के चलते मुर्रा ने उनका स्थान ले लिया और किसानों ने दोनों नस्लों को आगे बढ़ाने का काम ही बंद कर दिया।
ऐसे में लुवास विश्वविद्यालय मुर्रा नस्ल को एक आयाम तक पहुंचाने के बाद इन लुप्त होने वाली नस्लों को विकसित करने का प्रयास करेगा। वह भी जिनोमिक्स प्रोडक्शन के तहत किया जाएगा, जिससे उनकी दूध की क्षमता को बढ़ाया जा सके और वह भी मुर्रा की तरह किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सके।
मुर्रा हमारी विकसित की गई नस्ल है। इससे इस लेवल पर पहुंचाया कि हर किसान को कम कीमत पर मुर्रा नस्ल की भैंस मिल सके। मुर्रा को हर घर में पहुंचाने के बाद पुरानी लुप्त हुई भैंसों की प्रजातियों को पुन: किसानों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।
डॉ. रविंद्र शर्मा, निदेशक, रिसर्च