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Hisar News: धान-गेहूं की प्रतिकूल मौसम और बीमारियों से लड़ने में सक्षम किस्में तैयार हो सकेंगी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 26 Oct 2026 11:33 PM IST
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It will be possible to develop varieties of paddy and wheat capable of withstanding adverse weather and diseases.
डाॅ. पुष्पा खरब सेवानिवृत्त प्राध्यापिका एचएयू हिसार।
हिसार। सेक्टर 15 निवासी एवं चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) की सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. पुष्पा खरब ने 65 वर्ष की आयु में पेटेंट हासिल किया है। खरब को 21 अक्तूबर को धान और गेहूं के पौधों को ट्रांसजेनिक बनाने की विधि के लिए छठा पेटेंट मिला है। यह पेटेंट दोनों फसलों में आनुवंशिक बदलाव लाने की प्रक्रिया को सुलभ व प्रभावी बनाने से जुड़ा है। इस तकनीक का उद्देश्य प्रयोगशाला के अनुसंधानों को सीधे खेतों तक पहुंचाना है ताकि फसलों की गुणवत्ता बढ़े और किसानों की लागत व श्रम में कमी आए।
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डॉ. पुष्पा ने बताया कि ट्रांसजेनिक तकनीक के जरिए पौधे के आनुवंशिक गुणों में सुधार के लिए बाहरी जीन को शामिल किया जाता है।
यह विधि भविष्य में व्यापक स्तर पर इस्तेमाल होने वाली जीन एडिटिंग तकनीक के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी। इसके माध्यम से सीधे पौधों के मूल जीन में सकारात्मक बदलाव किए जा सकेंगे जिससे प्रतिकूल मौसम और बीमारियों से लड़ने में सक्षम नई किस्में तैयार होंगी। भारत सरकार और एचएयू के वित्तपोषित प्रोजेक्ट्स के तहत तैयार इस शोध की भविष्य की संभावनाओं को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की गहन जांच से गुजरना होगा। इसके बाद देश में ही बनी ट्रांसजेनिक किस्म को खेतों तक पहुंचाया जाएगा। उन्होंने बताया कि वे वर्ष 2005 से अब तक 13 पेटेंट के लिए आवेदन कर चुकीं हैं। भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से 6 पेटेंट मंजूर हो चुके हैं। वर्ष 2004-05 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) से प्रायोजित एचएयू की श्रेष्ठ शिक्षिका का पुरस्कार भी मिल चुका है। पति डॉ. राजपाल खरब एचएयू के बीज विज्ञान एवं तकनीकी विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। डॉ. पुष्पा आणविक जीव विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी और जैव सूचना विज्ञान विभाग की पूर्व अध्यक्ष रह चुकी हैं।
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शुरुआती खोजों से नवीनतम उपलब्धि तक का सफर
डॉ. खरब को पहला पेटेंट वर्ष 2011 में टिश्यू कल्चर से पौधे तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले माध्यम को जीवाणु की मदद से अधिक प्रभावी बनाने की विधि के लिए मिला था। वर्ष 2012 में दूसरा पेटेंट चने में बाहरी जीन डालने की विधि तैयार करने के लिए मिला जिससे बीटी चना विकसित किया। वर्ष 2018 में खजूर के पौधों की पहचान से जुड़ी तकनीक के लिए तीसरा पेटेंट मिला। खजूर में नर और मादा पौधों की पहचान सामान्यतः चार-पांच साल बाद फूल आने पर होती है लेकिन डॉ. पुष्पा ने ऐसी विधि विकसित की जिससे बीज उगते ही या पत्ते के नमूने से ही नर या मादा पौधे का पता लगाया जा सकता है। इससे अनुपयोगी पौधों की देखभाल में लगने वाले समय और श्रम की बचत होती है। डॉ. पुष्पा कहती हैं कि किसी शोध को पेटेंट तब मिलता है जब वह निर्धारित नवीनता और अन्य मानदंडों पर खरा उतरता है। इसकी मियाद आवेदन की तिथि से 20 साल तक होती है।
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ट्रांसजेनिक पौधे कैसे बनाए जाते हैं
उपयोगी जीन की पहचान: ऐसा जीन खोजा जाता है जो फसल में वांछित गुण ला सके।
जीन का स्थानांतरण: प्रयोगशाला में उस जीन को पौधे की कोशिकाओं के डीएनए में शामिल किया जाता है।
नया पौधा तैयार करना: संशोधित कोशिका से पूरा पौधा विकसित किया जाता है।
परीक्षण: पौधे में नए गुण, उनकी स्थिरता और संभावित जोखिमों की जांच की जाती है
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