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Hisar News: अच्छा खानपान रखा जाए तो पशु के ब्यांत में घटा सकते हैं 8 से 9 माह

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 26 Nov 2023 11:25 PM IST
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If good diet is maintained then the calving period of the animal can be reduced by 8 to 9 months.
हिसार। लुवास ने 16 महीने की बछड़ी को गर्भ धारण कराया है। इससे अच्छा दूध उत्पादन हो रहा है। उसका स्वास्थ्य भी बेहतर है। लुवास के वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर पशुओं का खानपान अच्छा रखा जाए तो पशु के पहले ब्यांत के समय को 8 से 9 महीने तक कम किया जा सकता है। पहले गर्भधारण के समय पशु का वजन 250 किलोग्राम या अधिक होना चाहिए। बता दें कि हरियाणा को दूध उत्पादन में नंबर वन बनाने के लिए लुवास नस्ल सुधार कार्यक्रम के अलावा पशुओं के पहले ब्यांत की आयु कम करने के लक्ष्य पर काम कर रहा है।
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इस बीच दूध उत्पादन में हरियाणा दूसरे नंबर से खिसक कर तीसरे पायदान पर पहुंच गया है। राजस्थान दूध उत्पादन में पहले तथा पंजाब दूसरे स्थान पर है। दूध उत्पादन में पहले नंबर के लक्ष्य को लेकर हरियाणा का पशु चिकित्सा विभाग भी काम करेगा। जिसमें लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय (लुवास) की बड़ी भूमिका रहेगी। सबसे अधिक दूध देने वाली मुर्राह की नस्ल का सुधार करने के लिए लगातार प्रयास चल रहे हैं। हरियाणा पशुपालन विभाग, केंद्रीय भैंस अनुसंधान केंद्र, लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय, हरियाणा पशुधन बोर्ड की ओर से पशु नस्ल सुधार कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उत्तम नस्ल की भैंसों के कटड़ों को तैयार कर उनके सीमन को प्रदेश भर के पशु अस्पतालों में उपलब्ध कराया जा रहा है। वर्ष 2019 की पशुगणना के अनुसार प्रदेश में करीब प्रदेश में करीब 43 लाख से अधिक भैंस, 19 लाख गाय का पशुधन है। हरियाणा में सबसे अधिक संख्या में मुर्राह नस्ल की भैंस हैं।
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सामान्य तौर पर हरियाणा में कटडी-बछड़ी की पहले गर्भधारण की आयु 24 से 30 महीने के बीच होती है। लोगों की धारणा है कि अगर इससे पहले पशु को गर्भधारण कराया गया तो उसका संपूर्ण विकास नहीं हो पाएगा। उसके दूध उत्पादन पर भी असर पड़ेगा। हमने लुवास में अपने अध्ययन में पाया कि अगर सही से पशु को संतुलित चारा देकर तैयार किया जाए तो 16 महीने में भी गर्भधारण कराया जा सकता है। अगर हम पहले ब्यांत की आयु कम करने में सफल रहे तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। प्रदेश के दूध उत्पादन में काफी प्रभाव पड़ेगा। -
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डॉ. सज्जन सिहाग ,डीन, डेयरी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, लुवास
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