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Hisar News: तिगड़ाना-मिताथल में हड़प्पाकालीन धरोहरों का होगा संरक्षण, 15 मीटर के दायरे में खनन-निर्माण पर पाबंदी
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5 अगस्त को प्रकाशित समाचार।
भिवानी। करीब पांच हजार साल पुरानी हड़प्पाकालीन सभ्यता की गवाह तिगड़ाना और मिताथल की पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण की उम्मीद जगी है। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग ने दोनों स्थलों के आसपास 15 मीटर दायरे में खनन और निर्माण कार्यों पर पाबंदी लगा दी है। इस क्षेत्र से आगे करीब 30 मीटर दायरे को विनियंत्रित क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव भी तैयार किया है। तिगड़ाना में प्राचीन टीले की पैमाइश कर चहारदीवारी बनाने की तैयारी है। इसके लिए बजट भी मंजूर हो चुका है।
संवाद न्यूज एजेंसी ने अमर उजाला में तिगड़ाना और मिताथल समेत जिले की अन्य पुरातात्विक धरोहरों की बदहाल स्थिति को प्रमुखता से उजागर किया था। इसके बाद पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग ने इन स्थलों के संरक्षण की दिशा में कदम उठाया है। पिछले करीब डेढ़ दशक में दोनों स्थलों पर मौजूद हड़प्पाकालीन टीले अवैध खनन के कारण काफी सिमट गए हैं। हरियाणा सरकार ने 13 मार्च 2025 को अधिसूचना जारी कर तिगड़ाना और मिताथल के हड़प्पाकालीन टीलों को संरक्षित पुरातात्विक स्थल घोषित किया था। करीब 25 एकड़ क्षेत्र में फैले तिगड़ाना के टीले का बड़ा हिस्सा अब समतल हो चुका है। वर्तमान में करीब आधा एकड़ हिस्सा ही टीले के रूप में बचा है। शेष जमीन पर किसानों ने खेती शुरू कर दी है। आबादी से करीब ढाई किलोमीटर दूर खेतों के बीच स्थित इस स्थल की अब पैमाइश कराई जाएगी। मिताथल का हड़प्पाकालीन टीला भी खेती और मिट्टी खनन के कारण लगातार सिमट रहा है। आबादी से करीब चार किलोमीटर दूर खेतों में स्थित इस स्थल के चारों तरफ फिलहाल कोई सुरक्षा दीवार नहीं है।
दफन हैं मानव सभ्यता से जुड़े अवशेष
भिवानी जिले में पांच ऐसे पुरातात्विक स्थल चिह्नित हैं जहां हड़प्पाकालीन सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े अवशेष मिल चुके हैं। इनमें तोशाम क्षेत्र के खानक, मानहेरू, नौरंगाबाद, मिताथल और तिगड़ाना शामिल हैं। वर्तमान में नौरंगाबाद के खेड़े को छोड़कर अन्य स्थलों पर पुरातत्व विभाग की ओर से अपेक्षित संरक्षण नहीं हो पाया है। मानहेरू और खानक में हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़े अवशेषों के निशान लगभग खत्म हो चुके हैं। मिताथल का टीला अतिक्रमण और खेती के कारण सिकुड़ रहा है।
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किस स्थल पर कब की गई खोदाई
मानहेरू में दिल्ली और एमडीयू विश्वविद्यालय रोहतक की संयुक्त टीम ने वर्ष 2009 में शोध किया था। तोशाम क्षेत्र के खानक में प्रोफेसर आरएन सिंह के नेतृत्व में बनारस विश्वविद्यालय की पुरातत्व टीम ने वर्ष 2016 में खोदाई कर हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़े अवशेष खोजे थे। तिगड़ाना में हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, पाली (महेंद्रगढ़) के पुरातत्व विभाग के तत्कालीन निदेशक डॉ. नरेंद्र परमार के नेतृत्व में मई 2016 में खेड़े की खोदाई हुई थी। यहां हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़ी कई वस्तुएं मिली थीं। पुरातत्व विभाग ने शोध के बाद इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की थी। नौरंगाबाद के खेड़े में वर्ष 2001 में यौधेय-कुषाण कालीन सभ्यता के अवशेष मिले थे। यहां भी पुरातत्व विभाग की ओर से मानव सभ्यता से जुड़ी वस्तुओं की खोज की गई। मिताथल में वर्ष 1968 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सूरजभान ने हड़प्पाकालीन अवशेषों की खोज की थी।
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तिगड़ाना और मिताथल समेत लोहारू के ऐतिहासिक किले को संरक्षित स्थल घोषित किया गया है। तिगड़ाना में प्राचीन टीले की चहारदीवारी के लिए बजट मंजूर हो चुका है और भूमि की पैमाइश की प्रक्रिया चल रही है। मिताथल में भी संरक्षण की प्रक्रिया विचाराधीन है। इन टीलों के आसपास मिट्टी खनन और निर्माण पर पाबंदी लगाई गई है। - डॉ. नरेंद्र सिंह परमार, डिप्टी डायरेक्टर, पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, हरियाणा
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संवाद न्यूज एजेंसी ने अमर उजाला में तिगड़ाना और मिताथल समेत जिले की अन्य पुरातात्विक धरोहरों की बदहाल स्थिति को प्रमुखता से उजागर किया था। इसके बाद पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग ने इन स्थलों के संरक्षण की दिशा में कदम उठाया है। पिछले करीब डेढ़ दशक में दोनों स्थलों पर मौजूद हड़प्पाकालीन टीले अवैध खनन के कारण काफी सिमट गए हैं। हरियाणा सरकार ने 13 मार्च 2025 को अधिसूचना जारी कर तिगड़ाना और मिताथल के हड़प्पाकालीन टीलों को संरक्षित पुरातात्विक स्थल घोषित किया था। करीब 25 एकड़ क्षेत्र में फैले तिगड़ाना के टीले का बड़ा हिस्सा अब समतल हो चुका है। वर्तमान में करीब आधा एकड़ हिस्सा ही टीले के रूप में बचा है। शेष जमीन पर किसानों ने खेती शुरू कर दी है। आबादी से करीब ढाई किलोमीटर दूर खेतों के बीच स्थित इस स्थल की अब पैमाइश कराई जाएगी। मिताथल का हड़प्पाकालीन टीला भी खेती और मिट्टी खनन के कारण लगातार सिमट रहा है। आबादी से करीब चार किलोमीटर दूर खेतों में स्थित इस स्थल के चारों तरफ फिलहाल कोई सुरक्षा दीवार नहीं है।
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दफन हैं मानव सभ्यता से जुड़े अवशेष
भिवानी जिले में पांच ऐसे पुरातात्विक स्थल चिह्नित हैं जहां हड़प्पाकालीन सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े अवशेष मिल चुके हैं। इनमें तोशाम क्षेत्र के खानक, मानहेरू, नौरंगाबाद, मिताथल और तिगड़ाना शामिल हैं। वर्तमान में नौरंगाबाद के खेड़े को छोड़कर अन्य स्थलों पर पुरातत्व विभाग की ओर से अपेक्षित संरक्षण नहीं हो पाया है। मानहेरू और खानक में हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़े अवशेषों के निशान लगभग खत्म हो चुके हैं। मिताथल का टीला अतिक्रमण और खेती के कारण सिकुड़ रहा है।
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किस स्थल पर कब की गई खोदाई
मानहेरू में दिल्ली और एमडीयू विश्वविद्यालय रोहतक की संयुक्त टीम ने वर्ष 2009 में शोध किया था। तोशाम क्षेत्र के खानक में प्रोफेसर आरएन सिंह के नेतृत्व में बनारस विश्वविद्यालय की पुरातत्व टीम ने वर्ष 2016 में खोदाई कर हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़े अवशेष खोजे थे। तिगड़ाना में हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, पाली (महेंद्रगढ़) के पुरातत्व विभाग के तत्कालीन निदेशक डॉ. नरेंद्र परमार के नेतृत्व में मई 2016 में खेड़े की खोदाई हुई थी। यहां हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़ी कई वस्तुएं मिली थीं। पुरातत्व विभाग ने शोध के बाद इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की थी। नौरंगाबाद के खेड़े में वर्ष 2001 में यौधेय-कुषाण कालीन सभ्यता के अवशेष मिले थे। यहां भी पुरातत्व विभाग की ओर से मानव सभ्यता से जुड़ी वस्तुओं की खोज की गई। मिताथल में वर्ष 1968 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सूरजभान ने हड़प्पाकालीन अवशेषों की खोज की थी।
तिगड़ाना और मिताथल समेत लोहारू के ऐतिहासिक किले को संरक्षित स्थल घोषित किया गया है। तिगड़ाना में प्राचीन टीले की चहारदीवारी के लिए बजट मंजूर हो चुका है और भूमि की पैमाइश की प्रक्रिया चल रही है। मिताथल में भी संरक्षण की प्रक्रिया विचाराधीन है। इन टीलों के आसपास मिट्टी खनन और निर्माण पर पाबंदी लगाई गई है। - डॉ. नरेंद्र सिंह परमार, डिप्टी डायरेक्टर, पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, हरियाणा