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हर-भरी वसुंधरा संस्था : 29 हजार पौधे लगाकर बदली शहर की तस्वीर, डंपिंग यार्ड को बना दिया हरियाली का हब

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 23 Nov 2025 12:23 AM IST
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Har-Bhari Vasundhara Initiative: Transformed the city by planting 29,000 trees, turning the dumping yard into a greenery hub
संस्था ने पौधे लगाने के लिए खोदे गड्ढे। 
हिसार। पर्यावरण है तभी जीवन है। इसे बचाने के लिए हर व्यक्ति को जितना हो सके योगदान देना चाहिए। चाहे शुरुआत घर से ही क्यों न करें। घर की बगिया में लगाए गए पौधे भी आसपास के वातावरण को खुशनुमा रखते हैं, भरपूर ऑक्सीजन देते हैं। हरियाली बढ़ाने में क्या योगदान दे सकती हूं, इसी विचार के लिए हर-भरी वसुंधरा संस्था बनाई। संस्था न सिर्फ पौधरोपण करती है, बल्कि उन पौधों की नियमित देखभाल भी करती है। संस्था अब तक लगभग 29 हजार पौधे लगा चुकी है, जिनमें से करीब 85 प्रतिशत जीवित हैं।
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पौधे लगाने का नतीजा है कि शहर में कई जगह डंपिंग यार्ड के रूप में पहचान रखने वाली जमीन आज हरियाली का मॉडल जोन बन चुकी है। हर सीजन में 65 से अधिक किस्मों के पौधे उगाए जाते हैं, जिन पर नेम-प्लेट्स लगाकर पहचान दी जाती है। चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुके कई सीजनल प्लांट्स पर फ्लावर मैन ऑफ इंडिया राम जयमल द्वारा डाले गए बीजों से उगे पौधों के फूल पूरे क्षेत्र को महका देते हैं। संस्था के पास खुद की एक नर्सरी भी है, जहां गर्मियों और बरसात में हजारों पौध तैयार कर शहर में लगाए जाते हैं। कई लोग अपने घरों में अधिक संख्या में उगे पौधे भी संस्था को दान करते हैं। (जैसा कि सेक्टर 14 निवासी सुनीता रहेजा ने बताया )
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अर्बन फोरेस्ट बनने चाहिए
सुनीता बताती हैं कि वे 2016 से हर उस गतिविधि के खिलाफ मुहिम चला रही हैं, जो पर्यावरण को प्रदूषित करती हैं। शहरों में बढ़ती कंक्रीट की इमारतों और वाहनों की संख्या से प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अर्बन फोरेस्ट बनाए जाने चाहिए। इसी सोच को हकीकत बनाने के लिए संस्था ने चार मियावाकी टेक्नीक पर आधारित जंगल तैयार किए हैं। इनमें एक सेक्टर 33 के बूस्टिंग स्टेशन पर, एक सेक्टर 13 में दूरदर्शन रेजिडेंशियल एरिया में और दो आजाद नगर में हैं। ये घने, हरे-भरे और जैव-विविधता से भरपूर हैं। पौधरोपण का ही नतीजा है कि आज जहां हरियाली नजर आती है, वहां पहले बदबूदार डंपिंग यार्ड था।
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वेस्ट मैनेजमेंट पर भी कर रहे हैं काम
संस्था सिर्फ पौधरोपण तक सीमित नहीं है। वेस्ट मैनेजमेंट में भी अग्रणी है। सूखे पत्तों और घरों से आने वाले गीले कचरे जैसे सब्जियों के छिलकों से खाद तैयार की जाती है और लोगों को निशुल्क उपलब्ध कराई जाती है। संस्था ने छह साल पहले बर्तन बैंक की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य डिस्पोजेबल उपयोग को कम कर कचरे के पहाड़ को रोकना था। आज यह बर्तन बैंक सफलतापूर्वक चल रहा है और इसे देखकर शहर में कई और बर्तन बैंक खुल चुके हैं। धार्मिक स्थलों पर फैले कचरे और प्लास्टिक को रोकने के लिए संस्था एक और अनोखा कार्य कर रही है। पीपल के पेड़ों के नीचे या नहरों में डाले गए मंदिरों के सामान को संस्था के वाॅलंटियर्स इकट्ठा करते हैं। उपयोग योग्य मूर्तियों को साफ कर दोबारा धार्मिक उपयोग में लाया जाता है, जबकि खंडित मूर्तियों को विशेष विधि से डिकंपोज किया जाता है। सुनीता ने बताया कि जब संस्था शुरू की थी, तब उनके साथ संजय सातरोडिया, मनीष बंसल, अजय जिंदल और डॉ. नारंग जुड़े थे। आज वही छोटी-सी टीम एक बड़ा पर्यावरणीय बदलाव लाने में सफल हो रही है।
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