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ये कैसा फादर्स-डे :वृद्घाश्रम में रहने को मजबूर,बेटियों ने भी मुंह फेरा
ब्यूरो/अमर उजाला, हिसार
Updated Sun, 19 Jun 2016 01:03 AM IST
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ये कैसा फादर्स-डे
- फोटो : bureau
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यहां अपनों के होते ही तन्हा हैं। जिनके लिये जीवन भर संघर्ष कर पैरों पर खड़ा किया वे आज खुद उनके अपने दूर हैं। संतानों के पास अपने माता-पिता से मिलने के लिए एक समय नहीं है। खासबात यह है कि बेटों की तरह बेटियां भी पिता से मुंह कैसे फेर लेती है... यह देखना है तो कैमरी रोड़ स्थित वृद्घाश्रम में चले आइये।
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आश्रम में 28 पुरूष व 18 महिलाएं एक दूसरे का सहारा बने हुए हैं। अब इन्होंने आशा छोड़ दी है कि इनके अपने लेने आएंगे। जीवन की इस सच्चाई को आत्मसात करके अब एक दूसरे का सहारा बने हुए हैं। ऐसे में अमर उजाला ने इन वृद्धजनों से बात कि तो उन्होंने बताया कि जीवन की यह हकीकत है। इसको हम स्वीकार कर जीवन जी रहे हैं।
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अब तो वृद्धाश्रम ही अपना घर
75 साल के रामकुमार ने बताया कि उसे वृद्घाश्रम आए दो साल हो गए है। लेकिन उनके बेटों के पास उनके लिए समय नहीं है। ना ही बेटे उन्हें अपने पास रखते है, ओर ना ही अपने पोतों-पोतियों से मिलने देते है।
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रामकुमार ने बताया कि उन्होंने मेहनत-मजदूरी करके बेटों को उच्च शिक्षा दिलवाई ओर साथ ही उनकी एक बेटी को भी ग्रेजूएट तक पढ़ाया। लेकिन आज उनकी तीनों ही संतानों को अपने पास रखने में हीन भावना महसूस होती है। उनकी पत्नि तुलसी का देहांत भी 15 साल पहले हो चुका है। रामकुमार का कहना है कि अब तो यह वृद्घाश्रम ही उनका घर है
यहां बेटियों के पास भी नहीं समय
इसी आश्रम में रहने वाले 72 साल के जोगिंद्र सिंह ने बताया कि उनकी तीन लड़कियां है। जिनमें से एक की मौत हो चुकी है। दो लड़किया फ्रांस में रह रही है। जोगिंद्र सिंह ने बताया कि वो हिसार के सेक्टर 13 में रहते थे। वो पेशे से मैकेनिक का काम करते थे। उन्होंने अथाह मेहनत करते हुए बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाई। लेकिन बेटियों के पास अब उनके लिए समय नहीं है। वो पिछले दो साल से यहां रह रहे है। उनकी पत्नि भी पिछले छह महीने से अपनी बेटी के पास विदेश में है। जोगिंद्र सिंह का कहना है कि उनकी बेटियां अपनी मां को तो बुला लेती है। लेकिन उनके पास मेरे लिये जगह नहीं है।
आते हैं पोता-पोती मिलने
पिछले 5 साल से कैमरी रोड़ स्थित आश्रम में रह रहे आरएस अग्रवाल ने बताया कि चार साल पहले लड़के की मौत हो चुकी है। तथा पांच साल पहले उनकी पत्नि भी स्वर्ग सिधार चुकी है। आरएस अग्रवाल ने बताया कि उनकी बहू उनके मकान में अपने बच्चों के साथ रहती है। लेकिन उनकी बहू को उनका घर में रहना अच्छा नहीं लगता।
इस कारण वो अपनी पत्नि की मौत के बाद से ही वृद्घाश्रम में रहने को मजबूर है। हालांकि उनके पोते-पोती कभी-कभी मिलने के लिए आ जाते है। लेकिन उनकी दोनों बेटियों के पास भी उनसे मिलने का समय नहीं है।
संतानों के पास नहीं है समय
पारसदास भी अपनी संतानों के होते हुए भी पिछले 5 साल से वृद्घाश्रम में रहने को मजबूर है। पारसदास का कहना है कि उनकी चार लड़कियां व एक लड़का है। लेकिन उनकी संतानों के पास उनके लिए समय नहीं है। इस कारण वो वृद्घाश्रम में ही रहने को मजबूर है।