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Hisar News: किसान आंदोलन के 5 साल पूरे, लंबित मांगों के लिए 17 संगठनों ने किया प्रदर्शन
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इंटक मजदूर किसान यूनियन के सदस्य अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हुए।
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हिसार। किसान आंदोलन के पांच वर्ष पूरे होने पर बुधवार को 17 किसान संगठनों सहित कुल 22 संगठनों ने शहर में एकजुट होकर प्रदर्शन किया। संगठनों ने आरोप लगाया कि वे पिछले पांच साल से केंद्र सरकार के लिखित आश्वासनों के पूरा होने की संयमपूर्वक प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। किसानों का कहना था कि सरकार लंबित मांगों पर तत्काल वार्ता शुरू करे, अन्यथा किसानों और मजदूरों के पास संघर्ष तेज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
बुधवार सुबह किसान, मजदूर और महिला संगठन क्रांतिमान पार्क में एकत्रित हुए। यहां से उन्होंने पैदल मार्च निकालते हुए लघु सचिवालय की ओर कूच किया। प्रदर्शन के दौरान किसानों ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। सुरक्षा की दृष्टि से जिला प्रशासन ने लघु सचिवालय परिसर में भारी पुलिस बल तैनात किया था। सभी प्रदर्शनकारियों को मुख्य गेट पर ही रोक दिया गया।
किसानों ने बताया कि वे उपायुक्त को अपनी मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपना चाहते हैं। हालांकि उपायुक्त की अनुपस्थिति में प्रशासन ने उनके स्थान पर एक अन्य अधिकारी को भेजा। पहले किसान संगठनों ने इसका विरोध किया, लेकिन बाद में उन्होंने ज्ञापन उक्त अधिकारी को सौंप दिया।
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यह बोले किसान
किसानों ने कहा कि किसान आंदोलन की पांचवीं वर्षगांठ के मौके पर देशभर के किसान और मजदूर फिर से विरोध प्रदर्शनों के लिए मजबूर हो रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि किसान आंदोलन 26 नवंबर 2020 को दिल्ली की सीमाओं पर शुरू हुआ था और इसमें संयुक्त ट्रेड यूनियनों का सक्रिय समर्थन रहा। यह आंदोलन 380 दिनों तक चला और 736 किसानों की जान चली गई जिसके बाद केंद्र सरकार तीन कृषि कानूनों की वापसी पर सहमत हुई। किसान नेताओं ने कहा कि 9 दिसंबर 2021 को केंद्र द्वारा संयुक्त किसान मोर्चा को दिए गए लिखित आश्वासन के आधार पर आंदोलन स्थगित किया गया था। इसमें एमएसपी को सी2+50 प्रतिशत फॉर्मूला पर लागू करने के संबंध में समिति गठित करने का वादा भी शामिल था। पांच वर्ष बीतने के बावजूद सरकार ने न केवल आश्वासन पूरे नहीं किए, बल्कि ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे किसानों की आर्थिक स्थिति और कमजोर हुई। उन्होंने कहा कि मौजूदा नीतियों से कृषि आत्मनिर्भरता और देश की खाद्य सुरक्षा पर भी प्रभाव पड़ा है।
इन मांगों के समाधान की उठाई मांग
अत्यधिक बारिश, जलभराव और बाढ़ से नष्ट हुई खरीफ 2025 की फसलों का पूर्ण मुआवजा दिया जाए। बोनी जीरी व वायरस से संक्रमित फसलों को भी मुआवजा मिले।
जिन जिलों में स्थायी या अस्थायी जलभराव व सेम की समस्या है, वहां के लिए विशेष बजट जारी कर स्थायी निकासी प्रबंध किए जाएं।
लगातार बाढ़ झेल रहे जिलों के लिए मास्टर प्लान तैयार कर समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए।
धान की फसल में हुई किसानों की लूट व बाहर से आने वाले धान की उच्च स्तरीय जांच हो। खरीफ फसलों पर घोषित एमएसपी न मिलने से हुए नुकसान की भरपाई हेतु आर्थिक मदद व बोनस दिया जाए।
धान की फसल में नमी प्रतिशत की सीमा 17 से बढ़ाकर 22 प्रतिशत की जाए।
फसल बीमा कंपनियों की मनमानी पर रोक लगाई जाए। गांव को इकाई मानने की शर्त हटे और खरीफ 2025 के बीमा क्लेम पर लगाए गए ऑब्जेक्शन रद्द किए जाएं। निजी बीमा कंपनियों की जगह सरकारी कंपनियों को जोड़ा जाए।
खाद की कालाबाजारी पर सख्त कार्रवाई की जाए। खाद लेने के लिए शुरू किए गए पोर्टल/ऑनलाइन शर्तें हटाई जाएं। किसानों को पर्याप्त खाद उपलब्ध कराई जाए। खाद के साथ जबरन नैनो, जिंक, सल्फर, बीज आदि थोपने वाले विक्रेताओं पर कार्रवाई की जाए और इसकी जांच के लिए अंदरूनी प्रशासनिक टीमें बनाई जाएं।
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बुधवार सुबह किसान, मजदूर और महिला संगठन क्रांतिमान पार्क में एकत्रित हुए। यहां से उन्होंने पैदल मार्च निकालते हुए लघु सचिवालय की ओर कूच किया। प्रदर्शन के दौरान किसानों ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। सुरक्षा की दृष्टि से जिला प्रशासन ने लघु सचिवालय परिसर में भारी पुलिस बल तैनात किया था। सभी प्रदर्शनकारियों को मुख्य गेट पर ही रोक दिया गया।
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किसानों ने बताया कि वे उपायुक्त को अपनी मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपना चाहते हैं। हालांकि उपायुक्त की अनुपस्थिति में प्रशासन ने उनके स्थान पर एक अन्य अधिकारी को भेजा। पहले किसान संगठनों ने इसका विरोध किया, लेकिन बाद में उन्होंने ज्ञापन उक्त अधिकारी को सौंप दिया।
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यह बोले किसान
किसानों ने कहा कि किसान आंदोलन की पांचवीं वर्षगांठ के मौके पर देशभर के किसान और मजदूर फिर से विरोध प्रदर्शनों के लिए मजबूर हो रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि किसान आंदोलन 26 नवंबर 2020 को दिल्ली की सीमाओं पर शुरू हुआ था और इसमें संयुक्त ट्रेड यूनियनों का सक्रिय समर्थन रहा। यह आंदोलन 380 दिनों तक चला और 736 किसानों की जान चली गई जिसके बाद केंद्र सरकार तीन कृषि कानूनों की वापसी पर सहमत हुई। किसान नेताओं ने कहा कि 9 दिसंबर 2021 को केंद्र द्वारा संयुक्त किसान मोर्चा को दिए गए लिखित आश्वासन के आधार पर आंदोलन स्थगित किया गया था। इसमें एमएसपी को सी2+50 प्रतिशत फॉर्मूला पर लागू करने के संबंध में समिति गठित करने का वादा भी शामिल था। पांच वर्ष बीतने के बावजूद सरकार ने न केवल आश्वासन पूरे नहीं किए, बल्कि ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे किसानों की आर्थिक स्थिति और कमजोर हुई। उन्होंने कहा कि मौजूदा नीतियों से कृषि आत्मनिर्भरता और देश की खाद्य सुरक्षा पर भी प्रभाव पड़ा है।
इन मांगों के समाधान की उठाई मांग
अत्यधिक बारिश, जलभराव और बाढ़ से नष्ट हुई खरीफ 2025 की फसलों का पूर्ण मुआवजा दिया जाए। बोनी जीरी व वायरस से संक्रमित फसलों को भी मुआवजा मिले।
जिन जिलों में स्थायी या अस्थायी जलभराव व सेम की समस्या है, वहां के लिए विशेष बजट जारी कर स्थायी निकासी प्रबंध किए जाएं।
लगातार बाढ़ झेल रहे जिलों के लिए मास्टर प्लान तैयार कर समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए।
धान की फसल में हुई किसानों की लूट व बाहर से आने वाले धान की उच्च स्तरीय जांच हो। खरीफ फसलों पर घोषित एमएसपी न मिलने से हुए नुकसान की भरपाई हेतु आर्थिक मदद व बोनस दिया जाए।
धान की फसल में नमी प्रतिशत की सीमा 17 से बढ़ाकर 22 प्रतिशत की जाए।
फसल बीमा कंपनियों की मनमानी पर रोक लगाई जाए। गांव को इकाई मानने की शर्त हटे और खरीफ 2025 के बीमा क्लेम पर लगाए गए ऑब्जेक्शन रद्द किए जाएं। निजी बीमा कंपनियों की जगह सरकारी कंपनियों को जोड़ा जाए।
खाद की कालाबाजारी पर सख्त कार्रवाई की जाए। खाद लेने के लिए शुरू किए गए पोर्टल/ऑनलाइन शर्तें हटाई जाएं। किसानों को पर्याप्त खाद उपलब्ध कराई जाए। खाद के साथ जबरन नैनो, जिंक, सल्फर, बीज आदि थोपने वाले विक्रेताओं पर कार्रवाई की जाए और इसकी जांच के लिए अंदरूनी प्रशासनिक टीमें बनाई जाएं।