{"_id":"6245f8d693ff7d0b9d0c8e46","slug":"dumping-yards-were-used-to-dispose-of-the-waste-from-the-factory-hisar-news-hsr627997684","type":"story","status":"publish","title_hn":"फैक्टरी से निकलने वाले कचरे के निस्तारण के लिए होते थे डंपिंग यार्ड","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
फैक्टरी से निकलने वाले कचरे के निस्तारण के लिए होते थे डंपिंग यार्ड
विज्ञापन
नारनौंद। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चलाई गई स्वच्छ भारत मुहिम की झलक हड़प्पा सभ्यता में भी देखने को मिली है। करीब पांच हजार साल पहले भी लोग स्वच्छता व बीमारियों से बचाने का प्रयत्न करते थे। इसके सुबूत राखीगढ़ी में चल रही खोदाई के दौरान डंपिंग यार्ड के रूप में मिले हैं। इनको देखकर हर कोई आश्चर्यचकित है।
हड़प्पा सभ्यता व संस्कृति के सबसे पुराने स्थल राखीगढ़ी में हो रही खुदाई से लगातार अनेक ऐसे तथ्य उजागर हो रहे हैं, जिससे इतिहास को जानने की इच्छा रखने वाले लोगों की जिज्ञासा और बढ़ती जा रही है। खुदाई के दौरान मिले डंपिंग यार्ड से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि उस दौरान जितना जोर व्यापार करके मुनाफा कमाने पर दिया जाता था, उससे कहीं ज्यादा जोर फैक्टरियों से निकलने वाले कूड़े कचरे के संग्रहण पर भी दिया जाता था। इतना ही नहीं कच्चे माल को राखीगढ़ी में लाकर दूरदराज के राज्यों में व्यापार के दृष्टिकोण से बेचा जाता था।
राखीगढ़ी में खुदाई के दौरान मिले अवशेषों से यह साफ हो गया है कि करीब पांच हजार साल पहले भी यहां के लोग व्यापार को बढ़ावा देते थे और अनेक ऐसी वस्तुएं बनाते थे। साइट नंबर एक पर हो रही खोदाई के दौरान अभी तक की सबसे मोटी दीवार मिली है, जोकि विशेषज्ञों के अनुसार फैक्टरी का पुख्ता प्रमाण है। इतना ही नहीं इसके साथ फैक्टरी से निकलने वाले कूड़े कचरे का सही तरीके से इस्तेमाल करने, बीमारियों से बचने व गंदगी से बचाने के लिए डंपिंग यार्ड का भी स्ट्रक्चर वहां पर मिला है।
विज्ञापन
कार्लेनियन पत्थर गुजरात के धोलावीरा से राखीगढ़ी लाया जाता था
पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग दिल्ली के डायरेक्टर डिप्टी डायरेक्टर संजय मंजूल ने बताया कि टीला नंबर एक पर खोदाई चल रही है। खोदाई के दौरान कई वस्तुएं निकल रही है। जिनकी सही जांच के बाद आगे का खुलासा हो सकेगा। पहली बार यह देखने को मिला है कि राखीगढ़ी के अंदर व्यापार ही नहीं होता था, बल्कि कच्चे माल के रूप में कार्लेनियन पत्थर को गुजरात के धोलावीरा से राखीगढ़ी में लाया जाता था। सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े स्थानों पर उसके बिड्स बनाकर सप्लाई किए जाते थे। जिस के पुख्ता सबूत भी यहां पर मिले हैं। अभी तक की खुदाई के दौरान जहां व्यापार व फैक्टरी होने के पुख्ता सुबूत मिल चुके हैं। वही यह भी साफ हो गया है कि उस समय के दौरान पालतू जानवरों के माध्यम से व्यापार किया जाता था।
विज्ञापन
हड़प्पा सभ्यता व संस्कृति के सबसे पुराने स्थल राखीगढ़ी में हो रही खुदाई से लगातार अनेक ऐसे तथ्य उजागर हो रहे हैं, जिससे इतिहास को जानने की इच्छा रखने वाले लोगों की जिज्ञासा और बढ़ती जा रही है। खुदाई के दौरान मिले डंपिंग यार्ड से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि उस दौरान जितना जोर व्यापार करके मुनाफा कमाने पर दिया जाता था, उससे कहीं ज्यादा जोर फैक्टरियों से निकलने वाले कूड़े कचरे के संग्रहण पर भी दिया जाता था। इतना ही नहीं कच्चे माल को राखीगढ़ी में लाकर दूरदराज के राज्यों में व्यापार के दृष्टिकोण से बेचा जाता था।
विज्ञापन
राखीगढ़ी में खुदाई के दौरान मिले अवशेषों से यह साफ हो गया है कि करीब पांच हजार साल पहले भी यहां के लोग व्यापार को बढ़ावा देते थे और अनेक ऐसी वस्तुएं बनाते थे। साइट नंबर एक पर हो रही खोदाई के दौरान अभी तक की सबसे मोटी दीवार मिली है, जोकि विशेषज्ञों के अनुसार फैक्टरी का पुख्ता प्रमाण है। इतना ही नहीं इसके साथ फैक्टरी से निकलने वाले कूड़े कचरे का सही तरीके से इस्तेमाल करने, बीमारियों से बचने व गंदगी से बचाने के लिए डंपिंग यार्ड का भी स्ट्रक्चर वहां पर मिला है।
विज्ञापन
कार्लेनियन पत्थर गुजरात के धोलावीरा से राखीगढ़ी लाया जाता था
पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग दिल्ली के डायरेक्टर डिप्टी डायरेक्टर संजय मंजूल ने बताया कि टीला नंबर एक पर खोदाई चल रही है। खोदाई के दौरान कई वस्तुएं निकल रही है। जिनकी सही जांच के बाद आगे का खुलासा हो सकेगा। पहली बार यह देखने को मिला है कि राखीगढ़ी के अंदर व्यापार ही नहीं होता था, बल्कि कच्चे माल के रूप में कार्लेनियन पत्थर को गुजरात के धोलावीरा से राखीगढ़ी में लाया जाता था। सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े स्थानों पर उसके बिड्स बनाकर सप्लाई किए जाते थे। जिस के पुख्ता सबूत भी यहां पर मिले हैं। अभी तक की खुदाई के दौरान जहां व्यापार व फैक्टरी होने के पुख्ता सुबूत मिल चुके हैं। वही यह भी साफ हो गया है कि उस समय के दौरान पालतू जानवरों के माध्यम से व्यापार किया जाता था।