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पराली जलाने से मिट्टी के पोषक तत्वों में आती है कमी, धुएं के कारण बढ़ता है प्रदूषण
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हिसार के खरबला गांव के राजकीय बालिका सीनियर सेकेंडरी स्कूल में गोष्ठी के बाद निकाली गई जागरूकता ?
- फोटो : Hisar
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हिसार। हांसी इलाके के खरबला गांव के राजकीय बालिका सीनियर सेकेंडरी स्कूल में कृषि विज्ञान केंद्र सदलपुर हिसार की तरफ से फसल अवशेष प्रबंधन को लेकर स्कूल जागरूक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें पराली जलाने से खेती व पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में बताया गया।
कृषि विज्ञान केन्द्र सदलपुर के कोऑर्डिनेटर डॉ. नरेंद्र कुमार ने इस गोष्ठी में छात्र-छात्राओं को बताया कि पराली जलाने से होने वाले धुएं के चलते पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। साथ ही खेत की जमीन बंजर होने की तरफ बढ़ रही है। आग जलाने से मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणु मर जाते हैं। मित्र कीट मधुमक्खियां भी धुएं व आग के कारण मर जाती हैं। खेतों की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने वाले केंचुए भी आग लगने के कारण मर जाते हैं।
कृषि वैज्ञानिक अजीत सांगवान ने कहा कि अक्तूबर व नवंबर में पराली जलाने से होने वाले धुएं के साथ ओस की बूंदे मिलकर स्मॉग बना देती हैं। इस समय हवा की गति भी कम होती है जिसके कारण धुआं एकत्रित हो जाता है। इससे पर्यावरण दूषित करने के साथ ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इस कारण सांस लेने में तकलीफ के साथ आंखों में जलन होती है। इस गोष्ठी में बताया गया कि किसान पराली जलाने के बजाय कंबाइन मशीन से धान की कटाई के बाद मिट्टी पलटने वाले हल से खेत की जुताई करा दें तो इससे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ जाएगी।
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इसके अलावा जीरो टिलेज मशीन, रोटावेटर, सुपर सीडर मशीन से फसल अवशेषों को खेत में मिलाकर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने व बिजाई करने से होने वाले लाभ के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई। इसके अलावा सरकार की तरफ से किसानों के लिए चलाई जा रही योजनाओं के बारे में भी विस्तार से बताया गया। डॉ. कुलदीप ने बाग लगाने के तरीके व मिट्टी की जांच के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां दीं।
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कृषि विज्ञान केन्द्र सदलपुर के कोऑर्डिनेटर डॉ. नरेंद्र कुमार ने इस गोष्ठी में छात्र-छात्राओं को बताया कि पराली जलाने से होने वाले धुएं के चलते पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। साथ ही खेत की जमीन बंजर होने की तरफ बढ़ रही है। आग जलाने से मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणु मर जाते हैं। मित्र कीट मधुमक्खियां भी धुएं व आग के कारण मर जाती हैं। खेतों की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने वाले केंचुए भी आग लगने के कारण मर जाते हैं।
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कृषि वैज्ञानिक अजीत सांगवान ने कहा कि अक्तूबर व नवंबर में पराली जलाने से होने वाले धुएं के साथ ओस की बूंदे मिलकर स्मॉग बना देती हैं। इस समय हवा की गति भी कम होती है जिसके कारण धुआं एकत्रित हो जाता है। इससे पर्यावरण दूषित करने के साथ ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इस कारण सांस लेने में तकलीफ के साथ आंखों में जलन होती है। इस गोष्ठी में बताया गया कि किसान पराली जलाने के बजाय कंबाइन मशीन से धान की कटाई के बाद मिट्टी पलटने वाले हल से खेत की जुताई करा दें तो इससे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ जाएगी।
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इसके अलावा जीरो टिलेज मशीन, रोटावेटर, सुपर सीडर मशीन से फसल अवशेषों को खेत में मिलाकर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने व बिजाई करने से होने वाले लाभ के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई। इसके अलावा सरकार की तरफ से किसानों के लिए चलाई जा रही योजनाओं के बारे में भी विस्तार से बताया गया। डॉ. कुलदीप ने बाग लगाने के तरीके व मिट्टी की जांच के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां दीं।