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भाई बहन का प्रेम देख गोरखनाथ का दिल पसीजा
कुरुक्षेत्र
Updated Sun, 29 Sep 2013 11:46 PM IST
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कुरुक्षेत्र के मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर में 26 से 29 सितंबर तक उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र इलाहाबाद व मैक कुरुक्षेत्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित चार दिवसीय सांग उत्सव में तीसरे दिन करनाल के सांगी श्यामलाल ने धनपत सिंह का लिखा सांग गोपीचंद-भरतरी का मंचन किया गया। मंच संचालन नाथूराम पांचाल द्वारा किया गया।
सांग में दिखाया गया कि धारा नामक शहर में राजा पदमसेन और रानी मैनावती के यहां पुत्र गोपीचंद तथा पुत्री चंद्रावल का जन्म होता है। विवाह के बाद गोपीचंद को अपनी पत्नी से पुत्र की प्राप्ति नहीं होती। गोपीचंद के माता-पिता उसका दूसरा विवाह कर देते हैं। लेकिन दूसरी पत्नी से भी पुत्री ही होती है।
इस तरह राजा पदमसेन और रानी मैनावती गोपीचंद का सोलह बार विवाह करवाते हैं किंतु दुर्भाग्यवश गोपीचंद को किसी भी पत्नी से पुत्र प्राप्त नहीं होता बल्कि उसके घर में बारह पुत्रियां जन्म लेती हैं। रानी मैनावती अपने भाई भरतरी को बुलाकर गोपीचंद के पुत्र प्राप्ति के लिए विचार विमर्श करती है।
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भरतरी रानी मैनावती को कहता है कि गोपीचंद को पुत्र की प्राप्ति के लिए राजमहल छोड़कर जंगलों में फकीरों की तरह रहकर तपस्या करनी होगी। रानी मैनावती पहले इंकार कर देती हैं, लेकिन भरतरी के समझाने पर वह गोपीचंद को जंगल में जाकर तपस्या करने को कहती है।
गोपीचंद अपनी सोलह रानियों से जाने की इजाजत लेता है और जंगल में चला जाता है। जंगल में बैठ कर गोपीचंद हर रोज ईश्वर की उपासना करता है तथा संध्याकाल के समय में भीख मांगने निकल पड़ता है। कई दिन बीतने के पश्चात एक दिन गोपीचंद अपनी बहन चंद्रावल के ससुराल पहुंच जाता है।
चंद्रावल उसे पहचान लेती है। भाई को फकीर के भेष में देखकर चंद्रावल को दिल का दौरा पड़ता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। अपनी बहन को मरा देखकर गोपीचंद बहुत रोता-बिलखता है। बहन को पुन: जीवित करने के लिए गोपीचंद गुरु गोरखनाथ जी के पास पहुंचता है।
गोपीचंद गुरु गोरखनाथ को सारी कहानी बताता है तथा अपनी बहन को पुन: जीवन दान देने की प्रार्थना करता है। गुरु गोरखनाथ गोपीचंद का अपनी बहन के प्रति अटूट स्नेह देखकर चंद्रावल को पुन: जीवित करने के लिए गोपीचंद के साथ चल देते हैं। गुरु गोरखनाथ के स्पर्श से चंद्रावल को जीवन दान मिल जाता है। चंद्रावल गुरु गोरखनाथ से प्रार्थना करती है कि गोपीचंद को पुत्रप्राप्ति का वरदान भी दे दीजिए।
गुरु गोरखनाथ भाई-बहन के आपसी प्रेम से प्रसन्न होकर गोपीचंद को पुत्र के साथ-साथ अमरता का वरदान भी दे देते हैं। गोपीचंद अपनी बहन से विदा लेकर राजमहल लौट आता है। इस तरह गोपीचंद की जीवन खुशहाल हो जाता है। इस अवसर पर मैक ओपन एअर थियेटर में कुरुक्षेत्र के नहीं अपितु आस-पास के इलाके से भी सैकड़ों की तादाद में सांग प्रेमी सांग का लुत्फ उठाने पहुंचे।
देर रात तक चले इस सांग ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। इस सांग में श्यामलाल, नरेन, राममेहर, अजमेर, राजेश, पवन, नफे सिंह, श्याम कुमार, मेनपाल, राजेश कुमार राजू, राज, इंद्र, राजेंद्र धमाका तथा राम आश्रय आदि कलाकारों ने अपनी कला के जौहर दिखाए। अंत में उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र इलाहाबाद के कार्यक्रम अधिकारी राजेंद्र कुमार ने मैक की ओर से सांगी श्यामलाल को एक स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।
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सांग में दिखाया गया कि धारा नामक शहर में राजा पदमसेन और रानी मैनावती के यहां पुत्र गोपीचंद तथा पुत्री चंद्रावल का जन्म होता है। विवाह के बाद गोपीचंद को अपनी पत्नी से पुत्र की प्राप्ति नहीं होती। गोपीचंद के माता-पिता उसका दूसरा विवाह कर देते हैं। लेकिन दूसरी पत्नी से भी पुत्री ही होती है।
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इस तरह राजा पदमसेन और रानी मैनावती गोपीचंद का सोलह बार विवाह करवाते हैं किंतु दुर्भाग्यवश गोपीचंद को किसी भी पत्नी से पुत्र प्राप्त नहीं होता बल्कि उसके घर में बारह पुत्रियां जन्म लेती हैं। रानी मैनावती अपने भाई भरतरी को बुलाकर गोपीचंद के पुत्र प्राप्ति के लिए विचार विमर्श करती है।
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भरतरी रानी मैनावती को कहता है कि गोपीचंद को पुत्र की प्राप्ति के लिए राजमहल छोड़कर जंगलों में फकीरों की तरह रहकर तपस्या करनी होगी। रानी मैनावती पहले इंकार कर देती हैं, लेकिन भरतरी के समझाने पर वह गोपीचंद को जंगल में जाकर तपस्या करने को कहती है।
गोपीचंद अपनी सोलह रानियों से जाने की इजाजत लेता है और जंगल में चला जाता है। जंगल में बैठ कर गोपीचंद हर रोज ईश्वर की उपासना करता है तथा संध्याकाल के समय में भीख मांगने निकल पड़ता है। कई दिन बीतने के पश्चात एक दिन गोपीचंद अपनी बहन चंद्रावल के ससुराल पहुंच जाता है।
चंद्रावल उसे पहचान लेती है। भाई को फकीर के भेष में देखकर चंद्रावल को दिल का दौरा पड़ता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। अपनी बहन को मरा देखकर गोपीचंद बहुत रोता-बिलखता है। बहन को पुन: जीवित करने के लिए गोपीचंद गुरु गोरखनाथ जी के पास पहुंचता है।
गोपीचंद गुरु गोरखनाथ को सारी कहानी बताता है तथा अपनी बहन को पुन: जीवन दान देने की प्रार्थना करता है। गुरु गोरखनाथ गोपीचंद का अपनी बहन के प्रति अटूट स्नेह देखकर चंद्रावल को पुन: जीवित करने के लिए गोपीचंद के साथ चल देते हैं। गुरु गोरखनाथ के स्पर्श से चंद्रावल को जीवन दान मिल जाता है। चंद्रावल गुरु गोरखनाथ से प्रार्थना करती है कि गोपीचंद को पुत्रप्राप्ति का वरदान भी दे दीजिए।
गुरु गोरखनाथ भाई-बहन के आपसी प्रेम से प्रसन्न होकर गोपीचंद को पुत्र के साथ-साथ अमरता का वरदान भी दे देते हैं। गोपीचंद अपनी बहन से विदा लेकर राजमहल लौट आता है। इस तरह गोपीचंद की जीवन खुशहाल हो जाता है। इस अवसर पर मैक ओपन एअर थियेटर में कुरुक्षेत्र के नहीं अपितु आस-पास के इलाके से भी सैकड़ों की तादाद में सांग प्रेमी सांग का लुत्फ उठाने पहुंचे।
देर रात तक चले इस सांग ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। इस सांग में श्यामलाल, नरेन, राममेहर, अजमेर, राजेश, पवन, नफे सिंह, श्याम कुमार, मेनपाल, राजेश कुमार राजू, राज, इंद्र, राजेंद्र धमाका तथा राम आश्रय आदि कलाकारों ने अपनी कला के जौहर दिखाए। अंत में उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र इलाहाबाद के कार्यक्रम अधिकारी राजेंद्र कुमार ने मैक की ओर से सांगी श्यामलाल को एक स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।