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Fatehabad News: भट्टू और रतिया क्षेत्र में भूजल और मिट्टी में सोडियम वृद्धि से घट रही फसल पैदावार
Thu, 04 Dec 2025 11:32 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
Updated Thu, 04 Dec 2025 11:32 PM IST
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फतेहाबाद में स्थित जल एवं लवणता एवं जांच विभाग में रखे गए मिट्टी जांच के सैंपल। संवाद
फतेहाबाद। भट्टू और रतिया क्षेत्र की मिट्टी में सोडियम की बढ़ती मात्रा किसानों की चिंता का कारण बन रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, ट्यूबवेल के अत्यधिक प्रयोग से सोडियम की मात्रा अधिक बढ़ रही है, जिससे मिट्टी की भौतिक संरचना खराब हो रही है और भूमि की प्राकृतिक उर्वरता कमजोर हो रही है।
किसान मिट्टी में सोडियम संतुलन बनाए रखने के लिए जिप्सम का उपयोग कर रहे हैं, जिससे रासायनिक खादों का प्रयोग बढ़ा है। भूजल स्तर काफी नीचे जाने के बावजूद कई किसान सिंचाई के लिए ट्यूबवेल के पानी पर निर्भर हैं। हालांकि जिले में नहरी पानी पर्याप्त है, लेकिन धान की फसल के लिए किसान नहरी सिंचाई पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकते।
मिट्टी जांच विशेषज्ञों ने बताया कि मिट्टी में सोडियम की अधिकता से फसलों की पैदावार प्रभावित हो रही है। इसके साथ ही सेम की समस्या के कारण नमक मिट्टी की सतह पर जमा हो रहा है, जिससे भूमि की उर्वरता घटती जा रही है।
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किसान इस समस्या से निपटने के लिए मिट्टी सुधार तकनीक अपनाने और सिंचाई में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता बता रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्यूबवेल पानी का संतुलित प्रयोग और नहरी पानी पर अधिक निर्भरता से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखी जा सकती है और फसल उत्पादन में सुधार किया जा सकता है।
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इन गांवों की जमीन हो चुकी है सेम से खराब
जिले के 30 से अधिक गांवों में सेम की समस्या है। इस कारण 40 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन खराब हो गई है। जिले के गांव शेखुपूर, भट्टू कलां, ठुइयां, जांडवाला बागड़, ढाबी खुर्द, ढाबी कलां, रामसरा, खाबड़ा कलां, बनमंदोरी, पीलीमंदोरी, मेहूवाला, सूली खेड़ा, बड़ोपल, धांगड़, खारा खेड़ी, चिंदड़, गदली, दहमन और कुम्हारियां में सेम की ज्यादा समस्या है। इससे भूमि खराब हो चुकी है।
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लौह और मैगनीज की है कमी
डॉ. बिजेंद्र, उपनिदेशक, कृषि मृदा एवं लवणता विभाग ने बताया मृदा खराब होने मुख्य कारण सेम की समस्या, ट्यूबवेल के पानी का अधिक प्रयोग और बारानी क्षेत्र में बारिश की कमी का होना है। जिले की मिट्टी में लौह और मैगनीज की कमी है। ये पौधों के विकास के लिए एक आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व हैं। इस कमी को दूर करने के लिए आवश्यक उपचार और मिट्टी सुधार कार्यक्रम किसानों के लिए काफी महंगे साबित हो रहे हैं। किसानों को रासायनिक खाद का प्रयोग करने के स्थान पर हरी खाद का प्रयोग करना चाहिए। उनको धान की पराली को मिट्टी में दबाना और गोबर की खाद का प्रयोग करने से जमीन की उर्वरता शक्ति को बढ़ाया जा सकता है।
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सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, रासायनिक खाद का प्रयोग बढ़ा
किसान फसलों से अधिक पैदावार लेने के लिए रासायनिक खादों का अत्यधिक प्रयोग कर रहे हैं। हालांकि, यह अल्पकालिक उपाय है, जो लंबे समय में मिट्टी के स्वास्थ्य को और अधिक नुकसान पहुंचाता है। रासायनिक अवशेष मिट्टी की प्राकृतिक संरचना और उसमें मौजूद लाभदायक सूक्ष्म जीवों को नष्ट कर रहे हैं, जिससे मिट्टी और भी अधिक कमजोर हो रही है। किसानों, कृषि विशेषज्ञों और सरकारी विभागों को इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए जिप्सम का प्रयोग, नहरी पानी का न्यायोचित वितरण, और जैविक खेती को बढ़ावा देने जैसे ठोस कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है।
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मानक-परिणाम-सामान्य श्रेणी-स्थिति
खारी अंग (पीएच)-7.80-6.5-8.5-आशिक क्षारीय
विद्युत चालकता-0.39-0.0-1.0-सामान्य
ऑर्गेनिक कार्बन- 0.93-0.51-0.75-ज्यादा
फॉस्फोरस (पीओ प्रति किलोग्राम हेक्टेयर)-44.25-23-57-मध्यम
पोटाशियम (केओ प्रति किलोग्राम हेक्टेयर)-156.00-145-337-मध्यम
सल्फर-61.15-10 से अधिक-पर्याप्त
जिंक-0.65-0.6 से अधिक-पर्याप्त
लोहा-0.78-4.5 से अधिक अभावग्रस्त
कॉपर-0.40-0.2 में अधिक-पर्याप्त
मैंगनीज- 0.48-2.0 से अधिक-अभाव्यस्त
बोरोन-0.5 में अधिक
:: जिले की मृदा क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हैं। टोहाना, फतेहाबाद और रतिया में ट्यूबवेल का पानी अधिक प्रयोग होने से मृदा में साेडियम की मात्रा ज्यादा है। वहीं भट्टू क्षेत्र में सेम की समस्या होने के कारण यहां नमक की मात्रा अधिक है।
-डॉ. राजेश कुमार, निदेशक, कृषि मृदा एवं लवणता विभाग, फतेहाबाद।
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किसान मिट्टी में सोडियम संतुलन बनाए रखने के लिए जिप्सम का उपयोग कर रहे हैं, जिससे रासायनिक खादों का प्रयोग बढ़ा है। भूजल स्तर काफी नीचे जाने के बावजूद कई किसान सिंचाई के लिए ट्यूबवेल के पानी पर निर्भर हैं। हालांकि जिले में नहरी पानी पर्याप्त है, लेकिन धान की फसल के लिए किसान नहरी सिंचाई पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकते।
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मिट्टी जांच विशेषज्ञों ने बताया कि मिट्टी में सोडियम की अधिकता से फसलों की पैदावार प्रभावित हो रही है। इसके साथ ही सेम की समस्या के कारण नमक मिट्टी की सतह पर जमा हो रहा है, जिससे भूमि की उर्वरता घटती जा रही है।
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किसान इस समस्या से निपटने के लिए मिट्टी सुधार तकनीक अपनाने और सिंचाई में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता बता रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्यूबवेल पानी का संतुलित प्रयोग और नहरी पानी पर अधिक निर्भरता से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखी जा सकती है और फसल उत्पादन में सुधार किया जा सकता है।
इन गांवों की जमीन हो चुकी है सेम से खराब
जिले के 30 से अधिक गांवों में सेम की समस्या है। इस कारण 40 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन खराब हो गई है। जिले के गांव शेखुपूर, भट्टू कलां, ठुइयां, जांडवाला बागड़, ढाबी खुर्द, ढाबी कलां, रामसरा, खाबड़ा कलां, बनमंदोरी, पीलीमंदोरी, मेहूवाला, सूली खेड़ा, बड़ोपल, धांगड़, खारा खेड़ी, चिंदड़, गदली, दहमन और कुम्हारियां में सेम की ज्यादा समस्या है। इससे भूमि खराब हो चुकी है।
लौह और मैगनीज की है कमी
डॉ. बिजेंद्र, उपनिदेशक, कृषि मृदा एवं लवणता विभाग ने बताया मृदा खराब होने मुख्य कारण सेम की समस्या, ट्यूबवेल के पानी का अधिक प्रयोग और बारानी क्षेत्र में बारिश की कमी का होना है। जिले की मिट्टी में लौह और मैगनीज की कमी है। ये पौधों के विकास के लिए एक आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व हैं। इस कमी को दूर करने के लिए आवश्यक उपचार और मिट्टी सुधार कार्यक्रम किसानों के लिए काफी महंगे साबित हो रहे हैं। किसानों को रासायनिक खाद का प्रयोग करने के स्थान पर हरी खाद का प्रयोग करना चाहिए। उनको धान की पराली को मिट्टी में दबाना और गोबर की खाद का प्रयोग करने से जमीन की उर्वरता शक्ति को बढ़ाया जा सकता है।
सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, रासायनिक खाद का प्रयोग बढ़ा
किसान फसलों से अधिक पैदावार लेने के लिए रासायनिक खादों का अत्यधिक प्रयोग कर रहे हैं। हालांकि, यह अल्पकालिक उपाय है, जो लंबे समय में मिट्टी के स्वास्थ्य को और अधिक नुकसान पहुंचाता है। रासायनिक अवशेष मिट्टी की प्राकृतिक संरचना और उसमें मौजूद लाभदायक सूक्ष्म जीवों को नष्ट कर रहे हैं, जिससे मिट्टी और भी अधिक कमजोर हो रही है। किसानों, कृषि विशेषज्ञों और सरकारी विभागों को इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए जिप्सम का प्रयोग, नहरी पानी का न्यायोचित वितरण, और जैविक खेती को बढ़ावा देने जैसे ठोस कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है।
मानक-परिणाम-सामान्य श्रेणी-स्थिति
खारी अंग (पीएच)-7.80-6.5-8.5-आशिक क्षारीय
विद्युत चालकता-0.39-0.0-1.0-सामान्य
ऑर्गेनिक कार्बन- 0.93-0.51-0.75-ज्यादा
फॉस्फोरस (पीओ प्रति किलोग्राम हेक्टेयर)-44.25-23-57-मध्यम
पोटाशियम (केओ प्रति किलोग्राम हेक्टेयर)-156.00-145-337-मध्यम
सल्फर-61.15-10 से अधिक-पर्याप्त
जिंक-0.65-0.6 से अधिक-पर्याप्त
लोहा-0.78-4.5 से अधिक अभावग्रस्त
कॉपर-0.40-0.2 में अधिक-पर्याप्त
मैंगनीज- 0.48-2.0 से अधिक-अभाव्यस्त
बोरोन-0.5 में अधिक
:: जिले की मृदा क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हैं। टोहाना, फतेहाबाद और रतिया में ट्यूबवेल का पानी अधिक प्रयोग होने से मृदा में साेडियम की मात्रा ज्यादा है। वहीं भट्टू क्षेत्र में सेम की समस्या होने के कारण यहां नमक की मात्रा अधिक है।
-डॉ. राजेश कुमार, निदेशक, कृषि मृदा एवं लवणता विभाग, फतेहाबाद।

फतेहाबाद में स्थित जल एवं लवणता एवं जांच विभाग में रखे गए मिट्टी जांच के सैंपल। संवाद