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Fatehabad News: जिले की राजनीति में कामरेडों की रही मजबूत दावेदारियां, एक बार मिली विधायकी

Fri, 20 Sep 2024 12:38 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद Updated Fri, 20 Sep 2024 12:38 AM IST
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Comrades had strong claims in district politics, got MLA once
फतेहाबाद। जिले की राजनीति में कभी कामरेडों की भी मजबूत दावेदारियां रही हैं। जिले की तीनों सीटों में से एक बार टोहाना से सीपीआईएम को जीत भी हासिल हुई है। सीपीआईएम की टिकट पर कामरेड हरपाल सिंह टोहाना विधानसभा क्षेत्र से वर्ष 1987 के चुनाव में विधायक बने थे। इसके अलावा फतेहाबाद विधानसभा क्षेत्र में कामरेड पृथ्वी सिंह गोरखपुरिया ने अपना प्रभावी कद दिखाया था।
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मगर मौजूदा समय में कामरेडों की राजनीति जिले में काफी कमजोर हुई है। कामरेड पृथ्वी सिंह व कामरेड कृष्णस्वरूप गोरखपुरिया के बाद कोई बड़ा नेता जिला मुख्यालय की राजनीति में असरदार भूमिका नहीं निभा सका है। हालांकि, अब हरपाल सिंह आम आदमी पार्टी में शामिल हो चुके हैं और वह प्रदेश उपाध्यक्ष हैं।
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दरअसल, कामरेड पृथ्वी सिंह गोरखपुरिया ने वर्ष 1977 के विधानसभा चुनाव से फतेहाबाद हलके की राजनीति में कदम बढ़ाए थे। इस चुनाव में वह निर्दलीय उतरे और 4,723 वोट लेकर चौथे स्थान पर रहे। इसके बाद वर्ष 1982 में उन्होंने फतेहाबाद से विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। मगर 1987 में सीपीआईएम की टिकट से उतरते हुए जबरदस्त छलांग लगाकर दूसरे स्थान पर रहे। इस चुनाव में बेशक भाजपा के बलबीर चौधरी जीते थे। मगर पृथ्वी सिंह गोरखपुरिया ने अपने पहले चुनाव से तीन गुणा 14,864 वोट हासिल किए।
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इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहे थे। साल 1991 में फिर से सीपीआईएम के पृथ्वी सिंह गोरखपुरिया का वोट बढ़ा। इस बार भी वह दूसरे नंबर पर रहे और पहले से अधिक 19,675 वोट लिए। इसके बाद वर्ष 1996 में हरियाणा विकास पार्टी की हवा में पृथ्वी सिंह गोरखपुरिया को नुकसान हुआ और वह दूसरे से सीधे पांचवें स्थान पर पहुंच गए। उन्हें इस बार 6,442 वोट मिले।
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साल 2000 के चुनाव में कामरेड कृष्णस्वरूप की हुई एंट्री
साल 2000 के चुनाव में कामरेड कृष्णस्वरूप गोरखपुरिया सीपीआईएम के उम्मीदवार बने। पहले ही चुनाव में कामरेड कृष्णस्वरूप तीसरे नंबर पर रहे, उन्हें 12,099 वोट मिले। साल 2005 के चुनाव में भी कामरेड कृष्णस्वरूप गोरखपुरिया ही सीपीआईएम के उम्मीदवार रहे। इस बार उनके वोट घटकर 5,772 हो गए। साल 2009 के चुनाव में फतेहाबाद से कामरेड रामसरुप ने सीपीआईएम से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें मात्र 1,798 वोट ही मिले। साल 2014 में सीपीआईएम के उम्मीदवार रहे मोहनलाल नारंग को मात्र 1,199 वोट ही मिल पाए। साल 2019 में सीपीआईएम ने विधानसभा चुनाव ही नहीं लड़ा। इस बार भी कांग्रेस के साथ गठबंधन के चलते उम्मीदवार नहीं उतारे हैं।
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टोहाना में ही कभी दूसरे तो कभी तीसरे स्थान पर भी रहे
टोहाना में साल 1972 के चुनाव में कामरेडों ने अपना प्रभाव दिखाया। यहां सीपीआई के उम्मीदवार संपूर्ण सिंह दूसरे नंबर पर रहे। साल 1977 में सीपीआई के इसर सिंह 2040 वोट लेकर तीसरे नंबर पर रहे। साल 1982 में फिर से संपूर्ण सिंह को सीपीआई की टिकट मिली और वह भी तीसरे नंबर पर रहे। साल 1985 के उपचुनाव में सीपीआईएम से कामरेड हरपाल सिंह मैदान में उतरे और उन्होंने 7549 वोट लेकर तीसरा स्थान हासिल किया। इसके बाद 1987 के चुनाव में उन्होंने 30,261 वोट लेकर कांग्रेस के परमवीर सिंह को 11,487 वोटों से करारी शिकस्त दी। इसके बाद के किसी भी चुनाव में कामरेड हरपाल सिंह जीत नहीं पाए। साल 1991 के चुनाव में भी कामरेड हरपाल सीपीआईएम से लड़े, लेकिन 11,960 वोट लेकर तीसरे नंबर पर रहे। 1996 में भी कामरेड हरपाल सिंह को ही सीपीआईएम की टिकट मिली, इस बार उनका ग्राफ काफी कम हो गया। वह मात्र 2339 वोट लेकर चौथे स्थान पर रहे। साल 2000 के चुनाव में सीपीआईएम ने चुनाव नहीं लड़ा। इसके बाद साल 2005 के चुनाव में फिर से कामरेड हरपाल ही सीपीआईएम उम्मीदवार रहे, मगर वह 3,120 वोट लेकर पांचवें नंबर पर रहे। साल 2009 में सीपीआई से संपूर्ण सिंह उतरे, उन्हें सातवां स्थान मिला। साल 2014 में सीपीआई से चांद सिंह प्रत्याशी बने, लेकिन मात्र 869 वोट ही ले पाए। साल 2019 में कामरेड जगतार सिंह सीपीआईएम से लड़े और 1334 वोट लेकर छठे स्थान पर रहे।
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रतिया में कोई प्रभावी छाप नहीं रही
रतिया विधानसभा क्षेत्र में यूं तो 1977 से सीपीआईएम उम्मीदवार उतारती रही, लेकिन वहां कोई प्रभावी छाप नहीं छोड़ी जा सकी। अधिकांश बार पार्टी उम्मीदवार टॉप तीन में भी नहीं पहुंच पाए। कभी एक हजार तो कभी तीन हजार वोट ही ले पाए।
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:: पूरे उत्तर भारत में ही कामरेडों की शक्ति कमजोर हुई है। इसका असर जिले में भी हुआ है। इसको लेकर मंथन जारी है। इस बार सीपीआईएम और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ रही है।

-कामरेड जगतार सिंह, जिला सचिव, किसान सभा
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:: कामरेड पृथ्वी सिंह और कामरेड कृष्णस्वरूप गोरखपुरिया के बाद कोई प्रभावी लीडर नहीं बन सका। इस कारण राजनीतिक रूप से दिक्कत रही हैं। मगर किसान, मजदूर, कर्मचारी के मुद्दे उठाने में कामरेड पीछे नहीं है।
-कामरेड रामकुमार बहबलपुरिया, मजदूर यूनियन नेता
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