{"_id":"5ac66fd54f1c1bcf618b5a4d","slug":"201522954197-fatehabad-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"सलमान के बाद एनपीसीआईएल के बड़े अफसरों पर भी भारी पड़ सकता है काले हिरणों की मौत का मसला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सलमान के बाद एनपीसीआईएल के बड़े अफसरों पर भी भारी पड़ सकता है काले हिरणों की मौत का मसला
Updated Fri, 06 Apr 2018 12:19 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
फतेहाबाद।
फिल्म अभिनेता सलमान खान को एक काले हिरण के शिकार के मामले में जोधपुर की अदालत के पांच साल की सजा सुनने के बाद अब इसी तरह का खतरा फतेहाबाद में गोरखपुर परमाणु संयंत्र बनाने वाली न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन लिमिटेड के दो बड़े अधिकारियों पर भी मंडराने लगा है। सलमान के मामले में तो एक काले हिरण के शिकार का मामला था, फतेहाबाद के बड़ोपल में तो सात काले हिरणों की मौत का आरोप एनपीसीआईएल के अधिकारियों पर है। इस मामले में कुरुक्षेत्र की पर्यावरण अदालत ने गोरखपुर हरियाणा अणु विद्युत परियोजना के निदेशक टी आर अरोड़ा, चीफ इंजीनियर संजय कुमार गुमास्ता के खिलाफ ट्रायल चलाने के आदेश जारी किए हुए हैं।
सलमान के मामले की तरह फतेहाबाद में भी बिश्नोई समाज के विनोद कड़वासरा ने पर्यावरण अदालत में याचिका डाली थी, इसकी सुनवाई में दोनों अधिकारियों के खिलाफ ट्रायल चलाने की अनुमति दी गई थी। इसी मामले में तत्कालीन डीसी डॉ. साकेत कुमार, तत्कालीन एसडीएम बलजीत सिंह, मुख्य वन्यजीव संरक्षक हरियाणा डॉ. अमेन्दर कौर, मंडलीय वन्य प्राणी अधिकारी शक्ति सिंह, जिला वन्य प्राणी अधिकारी द्वारका प्रसाद को भी पर्यावरण अदालत ने वन्यप्राणी सुरक्षा अधिनियम 1972 की धारा 2 उपधारा 16, धारा 9 व धारा 51 के तहत सम्मन जारी किए थे। लेकिन बाद में अरोड़ा और गुमास्ता को छोड़कर बाकी सभी की पुनर्विचार याचिका पर्यावरण कोर्ट ने स्वीकार कर ली है। तत्कालीन एसडीएम बलजीत सिंह की अब मौत हो चुकी है।
ये है मामला
केंद्र सरकार ने राज्य सरकार के माध्यम से गोरखपुर हरियाणा अणु विद्युत परियोजना के लिए 2010 से गांव गोरखपुर में 1313 एकड़ एवं गांव बड़ोपल में 185 एकड़ भूमि का अधिग्रहण प्रारंभ किया। बड़ोपल गांव में अधिगृहित भूमि काले हिरणों का सदियों से प्राकृतिक आवास है। भारतीय वन्यप्राणी कानून 1972 के अनुसार काला हिरण अनुसूची एक का संरक्षित जीव है। पर्यावरण मंत्रालय की ओर से एनपीसीआईएल को काले हिरणों की संरक्षण योजना बनाने के निर्देश दिए गए, लेकिन विनोद कड़वासरा का आरोप था कि एनपीसीआईएल ने मंत्रालय के निर्देशानुसार काले हिरणों के संरक्षण की कोई योजना नहीं बनाई बल्कि उन्हे खदेड़ कर मारने की योजना बनाई ताकि सर्वे टीम आने तक कोई मुद्दा ना रहे।
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वहीं कड़वासरा का आरोप था कि 5 जुलाई से 14 जुलाई 2013 के दौरान में परमाणु संयंत्र कालोनी की बाड़बंदी के रूप में लगाई गई कांटेदार तार के कारण चंद ही दिनों में सात हिरण मौत का शिकार हुए। हिरणों की मौत के दौरान बिश्नोई समाज ने राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्युनल की शरण ली गई, इसके बाद 15 जुलाई 2013 को सभी संबंधित को नोटिस जारी हुए और एनपीसीआईएल को बाडबंदी हटानी पड़ी। लेकिन तब तक सात हिरण मारे जा चुके थे। हिरणों की मौत के लिए जिम्मेवार एनपीसीआईएल के खिलाफ शिकायत की गई लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई। कई दिनों तक गांव बड़ोपल में बिश्नोई समाज के लोगों द्वारा धरना दिया गया लेकिन धरने की सुध भी किसी अधिकारी ने नहीं ली। अंत में पर्यावरण एवं जीव रक्षा बिश्नोई सभा के सचिव विनोद कुमार कड़वासरा द्वारा द्वारा वन्यप्राणी सुरक्षा अधिनियम 1972 की धारा 55 के तहत दोषियों के खिलाफ कार्यवाही हेतू 60 दिन का नोटिस दिया गया। इसकी अवधि फरवरी 2014 में पुरी हुई लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई। इसके बाद याचिकाकर्ता द्वारा कुरुक्षेत्र स्थित विशेष पर्यावरण की शरण ली गई जहां से अब आरोपियों के खिलाफ सम्मान जारी हुए थे, जिनके खिलाफ आरोपियों ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी।
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फतेहाबाद।
फिल्म अभिनेता सलमान खान को एक काले हिरण के शिकार के मामले में जोधपुर की अदालत के पांच साल की सजा सुनने के बाद अब इसी तरह का खतरा फतेहाबाद में गोरखपुर परमाणु संयंत्र बनाने वाली न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन लिमिटेड के दो बड़े अधिकारियों पर भी मंडराने लगा है। सलमान के मामले में तो एक काले हिरण के शिकार का मामला था, फतेहाबाद के बड़ोपल में तो सात काले हिरणों की मौत का आरोप एनपीसीआईएल के अधिकारियों पर है। इस मामले में कुरुक्षेत्र की पर्यावरण अदालत ने गोरखपुर हरियाणा अणु विद्युत परियोजना के निदेशक टी आर अरोड़ा, चीफ इंजीनियर संजय कुमार गुमास्ता के खिलाफ ट्रायल चलाने के आदेश जारी किए हुए हैं।
सलमान के मामले की तरह फतेहाबाद में भी बिश्नोई समाज के विनोद कड़वासरा ने पर्यावरण अदालत में याचिका डाली थी, इसकी सुनवाई में दोनों अधिकारियों के खिलाफ ट्रायल चलाने की अनुमति दी गई थी। इसी मामले में तत्कालीन डीसी डॉ. साकेत कुमार, तत्कालीन एसडीएम बलजीत सिंह, मुख्य वन्यजीव संरक्षक हरियाणा डॉ. अमेन्दर कौर, मंडलीय वन्य प्राणी अधिकारी शक्ति सिंह, जिला वन्य प्राणी अधिकारी द्वारका प्रसाद को भी पर्यावरण अदालत ने वन्यप्राणी सुरक्षा अधिनियम 1972 की धारा 2 उपधारा 16, धारा 9 व धारा 51 के तहत सम्मन जारी किए थे। लेकिन बाद में अरोड़ा और गुमास्ता को छोड़कर बाकी सभी की पुनर्विचार याचिका पर्यावरण कोर्ट ने स्वीकार कर ली है। तत्कालीन एसडीएम बलजीत सिंह की अब मौत हो चुकी है।
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ये है मामला
केंद्र सरकार ने राज्य सरकार के माध्यम से गोरखपुर हरियाणा अणु विद्युत परियोजना के लिए 2010 से गांव गोरखपुर में 1313 एकड़ एवं गांव बड़ोपल में 185 एकड़ भूमि का अधिग्रहण प्रारंभ किया। बड़ोपल गांव में अधिगृहित भूमि काले हिरणों का सदियों से प्राकृतिक आवास है। भारतीय वन्यप्राणी कानून 1972 के अनुसार काला हिरण अनुसूची एक का संरक्षित जीव है। पर्यावरण मंत्रालय की ओर से एनपीसीआईएल को काले हिरणों की संरक्षण योजना बनाने के निर्देश दिए गए, लेकिन विनोद कड़वासरा का आरोप था कि एनपीसीआईएल ने मंत्रालय के निर्देशानुसार काले हिरणों के संरक्षण की कोई योजना नहीं बनाई बल्कि उन्हे खदेड़ कर मारने की योजना बनाई ताकि सर्वे टीम आने तक कोई मुद्दा ना रहे।
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वहीं कड़वासरा का आरोप था कि 5 जुलाई से 14 जुलाई 2013 के दौरान में परमाणु संयंत्र कालोनी की बाड़बंदी के रूप में लगाई गई कांटेदार तार के कारण चंद ही दिनों में सात हिरण मौत का शिकार हुए। हिरणों की मौत के दौरान बिश्नोई समाज ने राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्युनल की शरण ली गई, इसके बाद 15 जुलाई 2013 को सभी संबंधित को नोटिस जारी हुए और एनपीसीआईएल को बाडबंदी हटानी पड़ी। लेकिन तब तक सात हिरण मारे जा चुके थे। हिरणों की मौत के लिए जिम्मेवार एनपीसीआईएल के खिलाफ शिकायत की गई लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई। कई दिनों तक गांव बड़ोपल में बिश्नोई समाज के लोगों द्वारा धरना दिया गया लेकिन धरने की सुध भी किसी अधिकारी ने नहीं ली। अंत में पर्यावरण एवं जीव रक्षा बिश्नोई सभा के सचिव विनोद कुमार कड़वासरा द्वारा द्वारा वन्यप्राणी सुरक्षा अधिनियम 1972 की धारा 55 के तहत दोषियों के खिलाफ कार्यवाही हेतू 60 दिन का नोटिस दिया गया। इसकी अवधि फरवरी 2014 में पुरी हुई लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई। इसके बाद याचिकाकर्ता द्वारा कुरुक्षेत्र स्थित विशेष पर्यावरण की शरण ली गई जहां से अब आरोपियों के खिलाफ सम्मान जारी हुए थे, जिनके खिलाफ आरोपियों ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी।