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रोज लोगों की परेशानियां सुनेंगे अफसर
अमर उजाला चंडीगढ़
Updated Tue, 12 Nov 2013 01:14 PM IST
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पौने नौ साल से मुख्यमंत्री की गद्दी संभालने के बाद मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने आखिरकार मान ही लिया कि अफसर बेलगाम हो गए हैं। इसलिए उन्होंने अफसरों पर नकेल कसने का ऐलान सार्वजनिक तौर पर किया।
हरियाणा प्रदेश कांग्रेस की हर मीटिंग में कांग्रेस वर्कर यह मुद्दा उठाते रहे हैं।
मुख्यमंत्री समय-समय पर उन्हें कहते रहे हैं कि अगर कोई अफसर गौर न करे तो प्रस्ताव पारित कर प्रदेश कांग्रेस को भेजें।
साथ-साथ उन्हें (सीएम) भी बताएं। मगर अफसरों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
मुख्यमंत्री ने हर उपायुक्त-पुलिस अधीक्षक बैठक में अफसरों को साफ निर्देश दिए कि वे दफ्तरों में बैठकर हर रोज तय समय पर लोगों की दिक्कतें सुनें और समाधान करें।
अगर किसी कारणवश वे दफ्तर में मौजूद न हों तो दूसरे अफसर की ड्यूटी लगाकर जाएं। मगर कई अफसर सरकारी दफ्तर में न बैठकर कोठी के कैंप कार्यालय से काम चलाते हैं।
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मुख्यमंत्री को ये शिकायतें मिलती रही हैं मगर कांग्रेस वर्करों के साथ-साथ हरियाणा के विपक्षी दलों के नेता भी आरोप लगाते रहे हैं कि प्रदेश की अफसरशाही बेलगाम हो गई है।
मुख्यमंत्री के निर्देशों की ये अफसर कितनी परवाह करते हैं उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गत 14 अक्तूबर को मुख्यमंत्री ने एक नवंबर तक क्लास तीन के रिक्त पदों को भरने के लिए आग्रह पत्र कर्मचारी चयन आयोग के पास पहुंच जाना चाहिए और मुख्य सचिव को उसकी जानकारी भेजी जाए।
एक नवंबर तक एक भी अफसर ने आग्रह पत्र नहीं भेजा और मुख्यमंत्री ने 2 नवंबर को बैठक में नाराजगी जताई।
अक्तूबर की बैठक में मुख्यमंत्री ने अफसरों से कहा था कि वे ही समय पर दफ्तर में नहीं पहुंचते हैं तो निचले अफसरों पर क्या असर पड़ेगा।
आखिरकार मुख्यमंत्री ने गोहाना रैली में सार्वजनिक तौर पर कहा कि अफसरों की जवाबदेही बनाने के लिए कानून बनाएंगे और काम न करने वाले अफसर को वे ठोकेंगे।
पिछले साल हरियाणा सरकार राइट टू सर्विस (सेवा का अधिकार) कानून बनाने की जोर-शोर से चर्चा चली थी, मगर दबकर रह गई।
इसमें हर अफसर या कर्मचारी को तय समय में काम करना जरूरी होता है। अगर तय समय में काम न हुआ तो जुर्माना लगता है। अब दो अफसर मुख्य सचिव पीके चौधरी और अतिरिक्त मुख्य सचिव कृष्ण मोहन 31 दिसंबर को रिटायर हो जाएंगे।
अफसरशाही में सवाल गूंज रहा है कि कहीं जवाबदेही कानून बनाने के बाद इनमें से किसी अफसर को उसका मुखिया बनाकर एडजस्ट करने की योजना तो नहीं है।
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हरियाणा प्रदेश कांग्रेस की हर मीटिंग में कांग्रेस वर्कर यह मुद्दा उठाते रहे हैं।
मुख्यमंत्री समय-समय पर उन्हें कहते रहे हैं कि अगर कोई अफसर गौर न करे तो प्रस्ताव पारित कर प्रदेश कांग्रेस को भेजें।
साथ-साथ उन्हें (सीएम) भी बताएं। मगर अफसरों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
मुख्यमंत्री ने हर उपायुक्त-पुलिस अधीक्षक बैठक में अफसरों को साफ निर्देश दिए कि वे दफ्तरों में बैठकर हर रोज तय समय पर लोगों की दिक्कतें सुनें और समाधान करें।
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अगर किसी कारणवश वे दफ्तर में मौजूद न हों तो दूसरे अफसर की ड्यूटी लगाकर जाएं। मगर कई अफसर सरकारी दफ्तर में न बैठकर कोठी के कैंप कार्यालय से काम चलाते हैं।
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मुख्यमंत्री को ये शिकायतें मिलती रही हैं मगर कांग्रेस वर्करों के साथ-साथ हरियाणा के विपक्षी दलों के नेता भी आरोप लगाते रहे हैं कि प्रदेश की अफसरशाही बेलगाम हो गई है।
मुख्यमंत्री के निर्देशों की ये अफसर कितनी परवाह करते हैं उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गत 14 अक्तूबर को मुख्यमंत्री ने एक नवंबर तक क्लास तीन के रिक्त पदों को भरने के लिए आग्रह पत्र कर्मचारी चयन आयोग के पास पहुंच जाना चाहिए और मुख्य सचिव को उसकी जानकारी भेजी जाए।
एक नवंबर तक एक भी अफसर ने आग्रह पत्र नहीं भेजा और मुख्यमंत्री ने 2 नवंबर को बैठक में नाराजगी जताई।
अक्तूबर की बैठक में मुख्यमंत्री ने अफसरों से कहा था कि वे ही समय पर दफ्तर में नहीं पहुंचते हैं तो निचले अफसरों पर क्या असर पड़ेगा।
आखिरकार मुख्यमंत्री ने गोहाना रैली में सार्वजनिक तौर पर कहा कि अफसरों की जवाबदेही बनाने के लिए कानून बनाएंगे और काम न करने वाले अफसर को वे ठोकेंगे।
पिछले साल हरियाणा सरकार राइट टू सर्विस (सेवा का अधिकार) कानून बनाने की जोर-शोर से चर्चा चली थी, मगर दबकर रह गई।
इसमें हर अफसर या कर्मचारी को तय समय में काम करना जरूरी होता है। अगर तय समय में काम न हुआ तो जुर्माना लगता है। अब दो अफसर मुख्य सचिव पीके चौधरी और अतिरिक्त मुख्य सचिव कृष्ण मोहन 31 दिसंबर को रिटायर हो जाएंगे।
अफसरशाही में सवाल गूंज रहा है कि कहीं जवाबदेही कानून बनाने के बाद इनमें से किसी अफसर को उसका मुखिया बनाकर एडजस्ट करने की योजना तो नहीं है।