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Charkhi Dadri News: श्रीकृष्ण जन्म कथा सुनकर भावविभोर हो गए श्रद्धालु
Sat, 13 Sep 2025 01:16 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
Updated Sat, 13 Sep 2025 01:16 AM IST
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चरखी दादरी। पुराना बस स्टैंड क्षेत्र में आयोजित श्रीकृष्ण लीला में शुक्रवार को भगवान श्रीकृष्ण जन्म कथा का मंचन हुआ। वृंदावन से पधारे आचार्य मुकेशचंद्र तिवारी से वृत्तांत सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गए।
मंचन के दौरान कलाकारों की ओर से दर्शाया गया कि देवकी की पहली संतान को वासुदेव कंस के पास ले जाते हैं। आकाशवाणी का स्मरण करते हुए कंस कहता है कि देवकी की आठवीं संतान ही उसका काल बनेगी। इस पर वह पहली संतान को जीवनदान देकर वासुदेव को वापस लौटा देता है।
इस प्रसंग के बाद देवर्षि नारद कंस को समझाते हैं कि वह अपनी काल शक्ति को बचाकर भूल कर रहा है। नारद की प्रेरणा से कंस एक-एक कर देवकी की छह संतानों की हत्या कर देता है, जबकि सातवीं संतान को देवताओं की योगमाया रोहिणी के गर्भ में पहुंचा देती है। इसके बाद मंचन में भगवान विष्णु प्रकट होकर वासुदेव-देवकी को बताते हैं कि उन्होंने पिछले जन्म में कठोर तपस्या कर उन्हें पुत्र रूप में पाने की इच्छा व्यक्त की थी। उसी तपस्या के फलस्वरूप अब श्रीकृष्ण के रूप में उनके घर जन्म लेंगे। कथा के अनुसार कारागार में श्रीकृष्ण का दिव्य जन्म होता है, जिसके साथ ही समस्त पहरेदार निद्रा में लीन हो जाते हैं और वासुदेव बालक कृष्ण को गोकुल में नंद बाबा और यशोदा माता के घर छोड़ आते हैं।
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इस दौरान प्रधान फूलचंद सोनी, रामविलास जांगड़ा, महावीर कौशिक, नरेश मित्तल, संजीव मराठा, कर्मवीर जांगड़ा, वेदपाल जाखड़, जयभगवान मस्ताना, ब्रह्मानंद व ओमप्रकाश सैनी आदि मौजूद रहे।
गोकुल में उत्साह और उल्लास का बना माहौल
यशोदा माता के यहां कन्या का जन्म होता है जिसे वासुदेव कारागार में वापस ले आते हैं। जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिलता है तो वह कन्या को मारने का प्रयास करता है। तभी वह कन्या अष्टभुजा रूप में प्रकट होकर आकाश में चली जाती है और कंस को चेतावनी देती है कि उसका काल तो पहले ही गोकुल में जन्म ले चुका है। इस समाचार से व्याकुल कंस अपने गुप्तचरों को गोकुल में खोजबीन का आदेश देता है। दूसरी ओर गोकुल में नंद बाबा के घर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर उत्साह और उल्लास का वातावरण छा जाता है।
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मंचन के दौरान कलाकारों की ओर से दर्शाया गया कि देवकी की पहली संतान को वासुदेव कंस के पास ले जाते हैं। आकाशवाणी का स्मरण करते हुए कंस कहता है कि देवकी की आठवीं संतान ही उसका काल बनेगी। इस पर वह पहली संतान को जीवनदान देकर वासुदेव को वापस लौटा देता है।
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इस प्रसंग के बाद देवर्षि नारद कंस को समझाते हैं कि वह अपनी काल शक्ति को बचाकर भूल कर रहा है। नारद की प्रेरणा से कंस एक-एक कर देवकी की छह संतानों की हत्या कर देता है, जबकि सातवीं संतान को देवताओं की योगमाया रोहिणी के गर्भ में पहुंचा देती है। इसके बाद मंचन में भगवान विष्णु प्रकट होकर वासुदेव-देवकी को बताते हैं कि उन्होंने पिछले जन्म में कठोर तपस्या कर उन्हें पुत्र रूप में पाने की इच्छा व्यक्त की थी। उसी तपस्या के फलस्वरूप अब श्रीकृष्ण के रूप में उनके घर जन्म लेंगे। कथा के अनुसार कारागार में श्रीकृष्ण का दिव्य जन्म होता है, जिसके साथ ही समस्त पहरेदार निद्रा में लीन हो जाते हैं और वासुदेव बालक कृष्ण को गोकुल में नंद बाबा और यशोदा माता के घर छोड़ आते हैं।
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इस दौरान प्रधान फूलचंद सोनी, रामविलास जांगड़ा, महावीर कौशिक, नरेश मित्तल, संजीव मराठा, कर्मवीर जांगड़ा, वेदपाल जाखड़, जयभगवान मस्ताना, ब्रह्मानंद व ओमप्रकाश सैनी आदि मौजूद रहे।
गोकुल में उत्साह और उल्लास का बना माहौल
यशोदा माता के यहां कन्या का जन्म होता है जिसे वासुदेव कारागार में वापस ले आते हैं। जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिलता है तो वह कन्या को मारने का प्रयास करता है। तभी वह कन्या अष्टभुजा रूप में प्रकट होकर आकाश में चली जाती है और कंस को चेतावनी देती है कि उसका काल तो पहले ही गोकुल में जन्म ले चुका है। इस समाचार से व्याकुल कंस अपने गुप्तचरों को गोकुल में खोजबीन का आदेश देता है। दूसरी ओर गोकुल में नंद बाबा के घर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर उत्साह और उल्लास का वातावरण छा जाता है।