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मनुष्य में संयम, सदाचार और संस्कार होने जरूरी : स्वामी सच्चिदानंद
Fri, 21 Jun 2024 10:03 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
Updated Fri, 21 Jun 2024 10:03 PM IST
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आर्य हिंदी संस्कृत गुरुकुल चरखी दादरी में योगाभ्यास करते विद्यार्थी।
चरखी दादरी। आर्यवीर दल की ओर से शहर स्थित आर्य हिंदी संस्कृत महाविद्यालय गुरुकुल में जिला स्तरीय व्यायाम प्रशिक्षण एवं चरित्र निर्माण संस्कार शिविर के तीसरे दिन सभी शिविरार्थियों को विभिन्न योगासनों का अभ्यास करवाया गया। इसमें संस्थान संचालक आचार्य प्रवीण योगी का मार्गदर्शन और आर्यवीर दल जिला संचालक स्वामी सच्चिदानंद का सानिध्य रहा।
व्यायाम शिक्षक राहुल आर्य और रोहित शास्त्री ने आर्यवीरों को योगाभ्यास कराते हुए इनके लाभ और सावधानियों से भी अवगत करवाया। स्वामी सच्चिदानंद ने कहा कि योगाभ्यास से मनुष्य में स्थिरता, अनुशासन व सदाचार का जन्म होता है। सदाचार मनुष्य का आभूषण है। जब हम किसी के गुणों की तारीफ करते हैं तो उसमें उस व्यक्ति का अच्छा व्यवहार और आचरण शामिल होता है और यही गुण उसे अन्य लोगों से अलग दिखाता है।
उन्होंने कहा कि कि संयम, सदाचार संस्कार से व्यक्ति का व्यक्तित्व निखरता है। जो संयम में रहता है वह अपनी इंद्रियों को वश में रखता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य स्नान करने, हार पहनने और चंदन का लेप करने के बाद बाहर से सुशोभित होता है, लेकिन संयम, सदाचार और संस्कार से मानव से महामानव, पुरुष से पुरुषोत्तम बनता है।
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उन्होंने कहा कि दानव से देव वही बनता है जो कामवासना को अपने वश में रखता है और निरंतर अपनी आदतों में सुधार करने से हमारे व्यक्तित्व और जीवन भी सुधर जाता है। इस दौरान रितेश शास्त्री, सुरेंद्र आर्य, पुनीत, महीपाल आर्य, संजीव, जितेंद्र, मुकुल, चिराग आदि मौजूद रहे।
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व्यायाम शिक्षक राहुल आर्य और रोहित शास्त्री ने आर्यवीरों को योगाभ्यास कराते हुए इनके लाभ और सावधानियों से भी अवगत करवाया। स्वामी सच्चिदानंद ने कहा कि योगाभ्यास से मनुष्य में स्थिरता, अनुशासन व सदाचार का जन्म होता है। सदाचार मनुष्य का आभूषण है। जब हम किसी के गुणों की तारीफ करते हैं तो उसमें उस व्यक्ति का अच्छा व्यवहार और आचरण शामिल होता है और यही गुण उसे अन्य लोगों से अलग दिखाता है।
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उन्होंने कहा कि कि संयम, सदाचार संस्कार से व्यक्ति का व्यक्तित्व निखरता है। जो संयम में रहता है वह अपनी इंद्रियों को वश में रखता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य स्नान करने, हार पहनने और चंदन का लेप करने के बाद बाहर से सुशोभित होता है, लेकिन संयम, सदाचार और संस्कार से मानव से महामानव, पुरुष से पुरुषोत्तम बनता है।
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उन्होंने कहा कि दानव से देव वही बनता है जो कामवासना को अपने वश में रखता है और निरंतर अपनी आदतों में सुधार करने से हमारे व्यक्तित्व और जीवन भी सुधर जाता है। इस दौरान रितेश शास्त्री, सुरेंद्र आर्य, पुनीत, महीपाल आर्य, संजीव, जितेंद्र, मुकुल, चिराग आदि मौजूद रहे।