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हाईकोर्ट का अहम फैसला: जमानत में स्थानीय जमानती की अनिवार्यता मूल अधिकारों पर आघात, एफआईआर खारिज
Wed, 17 Sep 2025 08:33 PM IST
चण्डीगढ़-हरियाणा ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: चण्डीगढ़-हरियाणा ब्यूरो
Updated Wed, 17 Sep 2025 08:33 PM IST
सार
जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि स्थानीय जमानती की अनिवार्यता जमानत के अधिकार को अप्रभावी बना देती है और ऐसे व्यक्ति को सिर्फ उसके रहने की जगह के कारण अलग ढंग से ट्रीट करती है।
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा कि जमानत की शर्त के रूप में लोकल श्योरिटी (स्थानीय जमानती) की अनिवार्यता व्यक्ति के मूल अधिकारों पर सीधा आघात है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह शर्त बाहर के राज्यों के लोगों के साथ केवल उनके निवास स्थान के आधार पर भेदभाव करती है और न्याय की राह में अनुचित अड़चन पैदा करती है।
जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि स्थानीय जमानती की अनिवार्यता जमानत के अधिकार को अप्रभावी बना देती है और ऐसे व्यक्ति को सिर्फ उसके रहने की जगह के कारण अलग ढंग से ट्रीट करती है। अदालत ने टिप्पणी की कि स्थानीय जमानती की मांग एक न्यायिक विसंगति है जिसे खत्म किया जाना चाहिए। इस प्रथा के चलते अक्सर आरोपी अजनबी जमानती का सहारा लेते हैं जो न्याय के उद्देश्य को ही कमजोर कर देता है।
कोर्ट ने कहा कि यह न्याय का उपहास है क्योंकि जमानती का असली मकसद आरोपी की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करना होता है। यह आदेश उस मामले में आया जिसमें गुरुग्राम (हरियाणा) में कोलकाता के दो आरोपियों पर विभिन्न आरोपों के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी। आरोप था कि उन्होंने जमानत के लिए अपने वकील की ओर से स्थानीय लोगों को श्योरिटी बनाया जिनके दस्तावेज कथित तौर पर फर्जी पाए गए।
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अदालत ने कहा कि केस रिकॉर्ड में किसी भी प्रकार की आपराधिक मंशा सिद्ध नहीं होती है। साथ ही कोई सबूत यह नहीं दर्शाता कि आरोपियों ने साजिश या लाभ उठाने की नीयत से यह किया। हाईकोर्ट ने दोहराया कि न्यायालय को केवल सिद्धांतों की व्याख्या में नहीं उलझना चाहिए बल्कि समाज की व्यावहारिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर फैसले देने चाहिए।
न्यायालय को कानून के शासन को बनाए रखने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि न्याय प्रासंगिक और समाज की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप रहे। इन तथ्यों के मद्देनजर हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपियों को किसी प्रकार का अनुचित लाभ नहीं मिला है और ट्रायल कोर्ट ने भी उन पर सीधी आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली थी। इसलिए अदालत ने आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया।
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जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि स्थानीय जमानती की अनिवार्यता जमानत के अधिकार को अप्रभावी बना देती है और ऐसे व्यक्ति को सिर्फ उसके रहने की जगह के कारण अलग ढंग से ट्रीट करती है। अदालत ने टिप्पणी की कि स्थानीय जमानती की मांग एक न्यायिक विसंगति है जिसे खत्म किया जाना चाहिए। इस प्रथा के चलते अक्सर आरोपी अजनबी जमानती का सहारा लेते हैं जो न्याय के उद्देश्य को ही कमजोर कर देता है।
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कोर्ट ने कहा कि यह न्याय का उपहास है क्योंकि जमानती का असली मकसद आरोपी की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करना होता है। यह आदेश उस मामले में आया जिसमें गुरुग्राम (हरियाणा) में कोलकाता के दो आरोपियों पर विभिन्न आरोपों के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी। आरोप था कि उन्होंने जमानत के लिए अपने वकील की ओर से स्थानीय लोगों को श्योरिटी बनाया जिनके दस्तावेज कथित तौर पर फर्जी पाए गए।
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अदालत ने कहा कि केस रिकॉर्ड में किसी भी प्रकार की आपराधिक मंशा सिद्ध नहीं होती है। साथ ही कोई सबूत यह नहीं दर्शाता कि आरोपियों ने साजिश या लाभ उठाने की नीयत से यह किया। हाईकोर्ट ने दोहराया कि न्यायालय को केवल सिद्धांतों की व्याख्या में नहीं उलझना चाहिए बल्कि समाज की व्यावहारिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर फैसले देने चाहिए।
न्यायालय को कानून के शासन को बनाए रखने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि न्याय प्रासंगिक और समाज की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप रहे। इन तथ्यों के मद्देनजर हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपियों को किसी प्रकार का अनुचित लाभ नहीं मिला है और ट्रायल कोर्ट ने भी उन पर सीधी आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली थी। इसलिए अदालत ने आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया।