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50 साल तक भूमि मालिक का नाम राजस्व रिकाॅर्ड में नहीं चढ़ाना निंदनीय : हाईकोर्ट
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-हाईकोर्ट ने इस बताया प्रशासनिक लापरवाही का दुर्लभ उदाहरण
-भूमि मालिक होते हुए भी आधी सदी तक रहा अपने अधिकार से वंचित
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। राजस्व रिकॉर्ड में भूमि मालिक का नाम 50 वर्ष तक नहीं चढ़ाने पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के अधिकारियों की कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा, प्रशासनिक लापरवाही का यह दुर्लभ उदाहरण है। एक व्यक्ति की जमीन का मामला आधी सदी तक अधर में लटका रहा और वह अपने अधिकार से वंचित रहा। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों ने 50 साल से अधिक समय तक कोई फैसला नहीं लिया जिससे न केवल प्रशासनिक प्रणाली की नाकामी उजागर होती है बल्कि इससे नागरिकों के अधिकारों पर भी आघात होता है।
मामला यमुनानगर की 100 कनाल जमीन से जुड़ा है जो पहले राज्य सरकार की थी। 1953 के पंजाब सिक्योरिटी आफ लैंड टेन्योर एक्ट के तहत किसान नानक को आवंटित कर दी गई थी। नानक ने यह जमीन 1973 में 500 रुपये देकर खरीद ली थी लेकिन राजस्व रिकाॅर्ड में उसके मालिकाना हक की प्रविष्टि कभी दर्ज नहीं की गई। सरकार और अन्य पक्षों ने गलत राजस्व रिकाॅर्ड के आधार पर इस जमीन की नीलामी की कोशिश की जिसके खिलाफ नानक ने स्वामित्व की घोषणा और अवैध कब्जे से सुरक्षा की मांग करते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जस्टिस वीरेंद्र अग्रवाल ने राज्य की 28 साल पुरानी अपील का निपटारा करते हुए कहा कि राजस्व विभाग ने आधी सदी तक कोई निर्णय नहीं लिया। संबंधित अधिकारियों ने बिक्री की पुष्टि करने में असफलता दिखाई जबकि नानक अपने जीवनकाल में निर्णय की प्रतीक्षा करते-करते गुजर गये। कोर्ट ने कहा कि 1953 के कानून के तहत बड़े जमींदारों की अधिशेष भूमि योग्य किरायेदारों को दी जानी थी। नानक ऐसे ही एक पात्र किरायेदार थे और उन्होंने निर्धारित राशि जमा कर दी थी। राज्य सरकार का यह तर्क कि मामला हरियाणा सीलिंग आन लैंड होल्डिंग एक्ट 1972 के तहत आता है, कोर्ट ने खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि नानक इस भूमि के पूर्ण स्वामी बन चुके थे, इसलिए सरकार को भूमि पर कोई दावा या कब्जे का अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अब इस जमीन पर दावा केवल नानक के प्राकृतिक वारिसों का होगा।
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-भूमि मालिक होते हुए भी आधी सदी तक रहा अपने अधिकार से वंचित
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। राजस्व रिकॉर्ड में भूमि मालिक का नाम 50 वर्ष तक नहीं चढ़ाने पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के अधिकारियों की कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा, प्रशासनिक लापरवाही का यह दुर्लभ उदाहरण है। एक व्यक्ति की जमीन का मामला आधी सदी तक अधर में लटका रहा और वह अपने अधिकार से वंचित रहा। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों ने 50 साल से अधिक समय तक कोई फैसला नहीं लिया जिससे न केवल प्रशासनिक प्रणाली की नाकामी उजागर होती है बल्कि इससे नागरिकों के अधिकारों पर भी आघात होता है।
मामला यमुनानगर की 100 कनाल जमीन से जुड़ा है जो पहले राज्य सरकार की थी। 1953 के पंजाब सिक्योरिटी आफ लैंड टेन्योर एक्ट के तहत किसान नानक को आवंटित कर दी गई थी। नानक ने यह जमीन 1973 में 500 रुपये देकर खरीद ली थी लेकिन राजस्व रिकाॅर्ड में उसके मालिकाना हक की प्रविष्टि कभी दर्ज नहीं की गई। सरकार और अन्य पक्षों ने गलत राजस्व रिकाॅर्ड के आधार पर इस जमीन की नीलामी की कोशिश की जिसके खिलाफ नानक ने स्वामित्व की घोषणा और अवैध कब्जे से सुरक्षा की मांग करते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जस्टिस वीरेंद्र अग्रवाल ने राज्य की 28 साल पुरानी अपील का निपटारा करते हुए कहा कि राजस्व विभाग ने आधी सदी तक कोई निर्णय नहीं लिया। संबंधित अधिकारियों ने बिक्री की पुष्टि करने में असफलता दिखाई जबकि नानक अपने जीवनकाल में निर्णय की प्रतीक्षा करते-करते गुजर गये। कोर्ट ने कहा कि 1953 के कानून के तहत बड़े जमींदारों की अधिशेष भूमि योग्य किरायेदारों को दी जानी थी। नानक ऐसे ही एक पात्र किरायेदार थे और उन्होंने निर्धारित राशि जमा कर दी थी। राज्य सरकार का यह तर्क कि मामला हरियाणा सीलिंग आन लैंड होल्डिंग एक्ट 1972 के तहत आता है, कोर्ट ने खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि नानक इस भूमि के पूर्ण स्वामी बन चुके थे, इसलिए सरकार को भूमि पर कोई दावा या कब्जे का अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अब इस जमीन पर दावा केवल नानक के प्राकृतिक वारिसों का होगा।
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