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Chandigarh-Haryana News: बिना कारण अयोग्य ठहराया, युवक को 2.5 लाख मुआवजा दे नौसेना
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-कोर्ट ने कहा–पारदर्शिता और निष्पक्षता भर्ती प्रक्रिया का मूल आधार
-सात साल से याचिका थी विचाराधीन, कोर्ट ने माना याची को मुआवजे का पात्र
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भारतीय नौसेना भर्ती मामले में फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि किसी भी भर्ती एजेंसी को यह अधिकार नहीं है कि वह केवल अयोग्य लिखकर उम्मीदवारी को खारिज कर दे। अदालत ने कहा कि जब तक भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता नहीं बरती जाती और ठोस कारण सामने नहीं रखे जाते तब तक किसी भी उम्मीदवार की उम्मीदवारी खारिज करना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने भारतीय नौसेना को आदेश दिया कि वह युवक को 2.5 लाख रुपये मुआवजा दे।
दीपक सिंह ने 2018 में नौसेना में सीनियर सेकेंडरी रिक्रूट पद के लिए आवेदन किया था। लिखित परीक्षा पास करने के बाद वह शारीरिक फिटनेस टेस्ट में शामिल हुआ। इस टेस्ट में 1.6 किलोमीटर दौड़ सात मिनट में पूरी करनी थी, 20 स्क्वैट्स और 10 पुश-अप्स करने थे। दौड़ और स्क्वैट्स पूरे कर लिए थे लेकिन जैसे ही पुश-अप्स शुरू किए तो वहां मौजूद एक परीक्षक ने बिना कोई कारण बताए मैदान से बाहर जाने को कह दिया। याचिकाकर्ता ने लिखित स्पष्टीकरण मांगा और बाद में कई बार पत्राचार भी किया लेकिन किसी स्तर पर उसे कोई जवाब नहीं मिला। उम्मीदवारी खारिज कर दी गई। इसके बाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। नौसेना ने दलील दी कि उम्मीदवार को मानक नियमों के अनुसार अयोग्य घोषित किया गया था। हालांकि नौसेना न तो रिजल्ट शीट में और न ही अपने जवाब में यह बता पाई कि दीपक को किस आधार पर असफल करार दिया गया। अदालत ने माना कि जब कोई एजेंसी अपने निर्णय की नींव रखने वाले कारणों और दस्तावेजों को ही छिपा ले तो उसकी कार्यप्रणाली निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं कही जा सकती। कोर्ट ने कहा कि सात साल बीत जाने के बाद अब दीपक अधिकतम आयु सीमा पार कर चुका है और नौसेना भर्ती में शामिल होने का उसका हक खत्म हो गया है। ऐसे में उसे न्याय दिलाने का एकमात्र रास्ता मुआवजा ही है। कोर्ट ने नौसेना को आदेश दिया कि दीपक सिंह को 2,50,000 रुपये की एकमुश्त क्षतिपूर्ति दी जाए।
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-सात साल से याचिका थी विचाराधीन, कोर्ट ने माना याची को मुआवजे का पात्र
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भारतीय नौसेना भर्ती मामले में फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि किसी भी भर्ती एजेंसी को यह अधिकार नहीं है कि वह केवल अयोग्य लिखकर उम्मीदवारी को खारिज कर दे। अदालत ने कहा कि जब तक भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता नहीं बरती जाती और ठोस कारण सामने नहीं रखे जाते तब तक किसी भी उम्मीदवार की उम्मीदवारी खारिज करना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने भारतीय नौसेना को आदेश दिया कि वह युवक को 2.5 लाख रुपये मुआवजा दे।
दीपक सिंह ने 2018 में नौसेना में सीनियर सेकेंडरी रिक्रूट पद के लिए आवेदन किया था। लिखित परीक्षा पास करने के बाद वह शारीरिक फिटनेस टेस्ट में शामिल हुआ। इस टेस्ट में 1.6 किलोमीटर दौड़ सात मिनट में पूरी करनी थी, 20 स्क्वैट्स और 10 पुश-अप्स करने थे। दौड़ और स्क्वैट्स पूरे कर लिए थे लेकिन जैसे ही पुश-अप्स शुरू किए तो वहां मौजूद एक परीक्षक ने बिना कोई कारण बताए मैदान से बाहर जाने को कह दिया। याचिकाकर्ता ने लिखित स्पष्टीकरण मांगा और बाद में कई बार पत्राचार भी किया लेकिन किसी स्तर पर उसे कोई जवाब नहीं मिला। उम्मीदवारी खारिज कर दी गई। इसके बाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। नौसेना ने दलील दी कि उम्मीदवार को मानक नियमों के अनुसार अयोग्य घोषित किया गया था। हालांकि नौसेना न तो रिजल्ट शीट में और न ही अपने जवाब में यह बता पाई कि दीपक को किस आधार पर असफल करार दिया गया। अदालत ने माना कि जब कोई एजेंसी अपने निर्णय की नींव रखने वाले कारणों और दस्तावेजों को ही छिपा ले तो उसकी कार्यप्रणाली निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं कही जा सकती। कोर्ट ने कहा कि सात साल बीत जाने के बाद अब दीपक अधिकतम आयु सीमा पार कर चुका है और नौसेना भर्ती में शामिल होने का उसका हक खत्म हो गया है। ऐसे में उसे न्याय दिलाने का एकमात्र रास्ता मुआवजा ही है। कोर्ट ने नौसेना को आदेश दिया कि दीपक सिंह को 2,50,000 रुपये की एकमुश्त क्षतिपूर्ति दी जाए।
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