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राष्ट्रीय खेल दिवस: हरियाणा की रगों में जुनून रवां, इनसे खेल जवां....पढ़ें वेटरन खिलाड़ियों के जोश की कहानी
Sat, 30 Aug 2025 01:32 PM IST
निवेदिता वर्मा
सुमित मलिक, अमर उजाला, चंडीगढ़
सुमित मलिक, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sat, 30 Aug 2025 01:32 PM IST
सार
वेटरन खिलाड़ी कहते हैं कि फिटनेस सिर्फ जिम या सप्लीमेंट्स से नहीं आती, बल्कि संतुलित आहार, अनुशासन और सकारात्मक सोच से भी पाई जा सकती है। खेल छोड़ने को लेकर पूछो तो कहते हैं-खेल छोड़ने से उम्र भारी लगने लगती है और खेलते रहने से जिंदगी हल्की हो जाती है। खेल दिवस पर हरियाणा के कुछ वेटरन खिलाड़ियों की कहानियां...
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दादी रामबाई, डॉ. आरके सांगवान और अमर सिंह
- फोटो : फाइल
विस्तार
देश हर साल 29 अगस्त को मेजर ध्यानचंद के जन्मदिवस को राष्ट्रीय खेल दिवस के ताैर पर मनाता है। हॉकी के जादूगर की यादें आज भी दिलों में ताजा हैं। ध्यानचंद ने दिखाया था कि जुनून उम्र से बड़ा होता है। खेल मैदान में वही जवान है जिसके इरादे जवान हैं। इसी जज्बे को आज भी हमारे वेटरन खिलाड़ी जी रहे हैं। ये वो चेहरे हैं जो खेल को छोड़ना नहीं जानते। उम्र उनके लिए सिर्फ कैलेंडर
पर तारीख है। कोई 85 का है तो कोई 103 का, लेकिन मैदान में उनका जोश किसी युवा से कम नहीं। उम्र के इस पड़ाव में भी इनके दिन अब भी खेल से ही शुरू होते हैं। सुबह का पहला साथी उनकी फिटनेस है और डाइट दूसरा कोच। मैदान उनका स्थायी साथी है।
इन सभी का मानना है कि खेलना ही असली जवानी है। शरीर बूढ़ा हो सकता है, लेकिन खेलते रहने का हौसला कभी बूढ़ा नहीं होता। इनके लिए खेल कोई करियर या सरकारी नाैकरी पाने का अवसर नहीं, बल्कि जीवनशैली है। ये सभी खिलाड़ी आज के युवाओं के लिए जीती-जागती प्रेरणा हैं।
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रामबाई : 108 की जवान धाविका
चार साल में जीते 150 से ज्यादा मेडल, 7 अंतरराष्ट्रीय, दौड़ और शॉटपुट की चैंपियन, देसी खुराक और अनुशासन से मैदान में अब भी फिट जज्बा हो तो उम्र सिर्फ एक आंकड़ा है। चरखी दादरी के कादमा
गांव की वयोवृद्ध खिलाड़ी रामबाई इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। 104 साल की उम्र में खेल मैदान में कदम रखा और अब 108 की उम्र में भी पदक जीत रही हैं। चार साल में ही 150 से ज्यादा पदक। इनमें 7 अंतरराष्ट्रीय पदक भी शामिल। यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब उनकी दोहती शर्मिला ने खेल में उतरने का आग्रह किया। पहली ही राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में पांच पदक जीतकर उन्होंने साबित कर दिया- जिंदगी में खेल अब भी बाकी है। फिर तो मैदान उनकी दिनचर्या बन गया। 100 मीटर दौड़। 3000 मीटर पैदल चाल। शॉटपुट। हर इवेंट में दमखम दिखाया। सबसे वरिष्ठ प्रतिभागी होने के बावजूद हर बार मेडल जीतना उनकी आदत बन गई। रामबाई खेल ही नहीं, खेलों की परंपरा भी आगे बढ़ा रही हैं। बेटी संतरा देवी और दोहती शर्मिला भी अंतरराष्ट्रीय एथलीट हैं। दोनों ने 100 से अधिक पदक जीते हैं। यानी तीन पीढ़ियों में खेल का जुनून रगों में दौड़ रहा है।
सी खुराक, जबरदस्त फिटनेस
रामबाई की जवानी का असली राज उनकी देसी खुराक है। रोजाना सुबह-शाम आधा किलो दूध। साथ में घी, दही, चूरमा और मिसी रोटी। इसके अलावा खेतों में पैदल चलना उनकी आदत है। यही उनका जिम है, यही उनका फिटनेस मंत्र। उनकी कहानी सिर्फ मेडल की नहीं है... यह संदेश है कि फिटनेस सप्लीमेंट्स से नहीं, अनुशासन और खेल से आती है।
धर्मचंद : सख्त दिनचर्या, मजबूत इच्छाशक्ति से 89 की उम्र में भी जमा रहे धाक
बिजली निगम से सेवानिवृत्त 89 वर्षीय धर्मचंद शर्मा अब भी ट्रैक पर दौड़ते हैं। 52 साल से उनका अभ्यास जारी है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय एथलीट भीम सिंह घनघस से प्रेरणा ली और उनको मास्टर एथलीट बना दिया। पहली बार हिसार के जाट कॉलेज के ट्रैक पर चारों स्पर्धाओं-5000, 10000, 1500 और 400 मीटर में उन्होंने स्वर्ण पदक जीते। इसके बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदकों की झड़ी लगा दी। वर्ष 1991-92 में राज्यपाल भी उनको सम्मानित कर चुके हैं। वे 1968 में बिजली निगम में खेल कोटे से भर्ती हुए थे। 1998 में फोरमैन पद से सेवानिवृत्त हो गए। उनका दिन सुबह दो बजे शुरू होता है। नहाकर भजन-कीर्तन और गीता पाठ करते हैं। योग, प्राणायाम और ओम का जाप उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। सुबह सात बजे पश्चिमी यमुना नहर की पटरी पर पहुंचकर रोजाना 10 किलोमीटर दौड़ते हैं।
खुश रहना ही सेहत का राज
संतुलित आहार और खुश रहना ही असली सेहत है। वह कभी मांसाहारी भोजन नहीं करते। उनका विश्वास है कि खुशनुमा मिजाज से ही विल पावर बढ़ती है।
युवाओं को नसीहत
युवाओं से कहते हैं कि मोबाइल से दूरी रखें। अभिभावकों के साथ समय बिताएं। खेलों से जुड़ें। खेल इंसान की असली पूंजी है।
महावीर सिंह : रिकाॅर्ड में भी महा वीर
73 वर्षीय मास्टर एथलीट महावीर सिंह ने फिटनेस और जज्बे के दम पर देश-विदेश में पहचान बनाई है। 1972 में खेलों की शुरुआत कबड्डी और कुश्ती से की। इसके बाद एथलेटिक्स में खुद को साबित किया और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते। 1974 में हरियाणा पुलिस में भर्ती हुए और मधुबन पुलिस लैब में फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ भी रहे। वर्ष 2010 में सब-इंस्पेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए। रिटायर होने के बाद 2015 में करनाल के मास्टर एथलीट धर्मचंद शर्मा के साथ मिलकर मास्टर्स एथलेटिक्स एसोसिएशन बनाई। इस मंच से जिलेभर के खिलाड़ियों को जोड़ा। वे अब उनको सिखा भी रहे हैं। महावीर ने हर्डल रेस, रिले रेस और ट्रिपल जंप में स्वर्ण पदक अपने नाम किए। 100 मीटर हर्डल रेस 22 सेकेंड में पूरा करने का उनका रिकॉर्ड रहा है। ट्रिपल जंप में 7.50 मीटर की छलांग लगाकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनाई। मलेशिया और सिंगापुर में कई पदक जीत चुके हैं। महावीर का कहना है कि जुनून और अनुशासन ही लंबी उम्र तक फिट रहने का राज है। खेल इंसान को न सिर्फ मजबूत बनाते हैं बल्कि जीवन में नई ऊर्जा भी भरते हैं।
दिनचर्या भी प्रेरणादायी
महावीर की दिनचर्या भी प्रेरणादायी है। वह रोज सुबह चार बजे उठते हैं और पांच बजे कर्ण स्टेडियम पहुंचकर पांच किलोमीटर दौड़ते हैं। गुनगुना पानी और दूध से दिन की शुरुआत करते हैं। संतुलित आहार, अंकुरित चने, फल, दाल और मिक्स अनाज की रोटी उनके खानपान का हिस्सा है।
सोहन सिंह संधू : जंग से खेल के मैदान तक परचम
भानोखेड़ी गांव के 70 वर्षीय सोहन सिंह संधू 1967 में फौज में भर्ती हुए थे। उन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में हिस्सा लिया और देश को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई। मास्टर खेलों में अब तक वे 10 पदक जीत चुके हैं, जिनमें तीन स्वर्ण शामिल हैं। ये पदक उन्होंने सिंगापुर, गोवा व पंजाब के पठानकोट में हुई प्रतियोगिताओं में जीते।
हाल ही में उन्होंने यमुनानगर में आयोजित 6वीं हरियाणा राज्य मास्टर्स गेम्स एथलेटिक्स में हिस्सा लिया और 100 मीटर दौड़, लंबी कूद और शॉटपुट तीनों स्पर्धाओं में पहला स्थान हासिल किया। सोहन सिंह का कहना है कि सेना ने मुझे अनुशासन और खेल का जज्बा सिखाया। नौकरी के दौरान वे अक्सर अंबाला कैंट से अपने गांव तक दौड़कर आते-जाते थे। वे बच्चों के शारीरिक विकास को लेकर भी गंभीर हैं। उन्होंने गांव में बच्चों के लिए खेल का मैदान तैयार कराया है और साल में एक बार प्रतियोगिताएं भी करवाते हैं।
अनुशासित दिनचर्या
संयमित दिनचर्या और फिटनेस पर ध्यान देना ही उनकी सफलता का राज है। रोज सुबह तीन बजे वह गुरुद्वारा साहिब में पाठ करने जाते हैं। इसके बाद बच्चों को खेल-कूद की जानकारी देते हैं और खुद भी कसरत व दौड़ लगाते हैं। खानपान में वह दूध, दही, घी और हरी सब्जियां शामिल करते हैं।
डॉ. आरके सांगवान : उम्र 86, पदक 75 ...नहीं कोई थकान
उम्र बढ़ने पर लोग सहारा ढूंढते हैं लेकिन हिसार के डॉ. आरके सांगवान ने उम्र को मात दी है। 86 की उम्र में भी वह मैदान पर दौड़ते हैं। पदक जीतते हैं और साबित करते हैं कि असली जवानी खेलते रहने में है। नवदीप कॉलोनी निवासी डॉ. सांगवान अब तक 75 से ज्यादा पदक जीत चुके हैं। स्वीमिंग हो या एथलेटिक्स, उनका जलवा हर जगह देखने को मिलता है। रिले रेस, पांच किलोमीटर वॉक और स्टीपल चेज में उनका नाम सबसे ऊपर आता है। खेल से उनका रिश्ता पुराना है। बीते 20 साल से मास्टर्स चैंपियनशिप में लगातार हिस्सा ले रहे हैं। उम्र चाहे कितनी भी बढ़ी हो, मैदान में उनका दमखम युवाओं जैसा ही नजर आता है। दर्शक दंग रह जाते हैं। डॉ. सांगवान पेशे से प्रोफेसर रहे। एचएयू से रिटायर होने के बाद भी खेल छोड़ना मंजूर नहीं किया। अब खेल ही उनकी पहचान है। डॉ. सांगवान कहते हैं कि उम्र थकाती नहीं। सोच थकाती है। खेलते रहो तो जिंदगी जवां रहती है।
अनुशासन ही ताकत
सांगवान रोज सुबह पांच बजे उठते हैं। नियमित अभ्यास करते हैं। उनका कहना है-फिटनेस का राज सिर्फ अभ्यास और अनुशासन है।
देसी खुराक ही फिटनेस का राज
उनकी थाली में दूध, बादाम और गूंद के लड्डू जरूर होते हैं। यही उनकी असली ताकत है। यही वजह है कि इस उम्र में भी वे फिट हैं।
अमर सिंह : युवाओं की रफ्तार को मात
उम्र रुकावट नहीं है। जज्बा हो तो हर कदम दौड़ बन जाता है। यह कहावत हर दिन साबित कर रहे हैं आजाद नगर के रहने वाले 85 साल के अमर सिंह। सेना से हवलदार पद से रिटायर हुए पर खेल से रिश्ता कभी टूटा नहीं। आज मैदान उनकी जिंदगी बन चुका है और दौड़ उनका जुनून। अब तक 40 से ज्यादा पदक जीत चुके हैं। राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक। हर बार मैदान पर उतरे और जीतकर लौटे। रोज सुबह डेढ़ घंटे अभ्यास करते हैं। घर के पास बना फार्म ही उनका अखाड़ा है। पसीना उनकी दवा है। मैदान उनका साथी। सात साल पहले मास्टर्स चैंपियनशिप में उतरे। पहला ही कदम जीत की तरफ बढ़ा, तब से लगातार मेडल जीत रहे हैं। 100 मीटर। 200 मीटर। 5 किलोमीटर वॉक। हर इवेंट में उनका दमखम देखते ही बनता है। युवाओं की रफ्तार को मात देते हैं। अब उनकी नजरें एशिया चैंपियनशिप पर हैं। 5 से 9 नवंबर तक चेन्नई में मुकाबला होगा। अमर सिंह कहते हैं कि तैयारी पूरी है, मैदान मेरी उम्र बताएगा।
सेहत का राज : उनकी सेहत का राज साधारण जीवनशैली है। दूध, देसी खानपान और संतुलित डाइट। अनुशासन उनकी ताकत है।
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पर तारीख है। कोई 85 का है तो कोई 103 का, लेकिन मैदान में उनका जोश किसी युवा से कम नहीं। उम्र के इस पड़ाव में भी इनके दिन अब भी खेल से ही शुरू होते हैं। सुबह का पहला साथी उनकी फिटनेस है और डाइट दूसरा कोच। मैदान उनका स्थायी साथी है।
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इन सभी का मानना है कि खेलना ही असली जवानी है। शरीर बूढ़ा हो सकता है, लेकिन खेलते रहने का हौसला कभी बूढ़ा नहीं होता। इनके लिए खेल कोई करियर या सरकारी नाैकरी पाने का अवसर नहीं, बल्कि जीवनशैली है। ये सभी खिलाड़ी आज के युवाओं के लिए जीती-जागती प्रेरणा हैं।
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रामबाई : 108 की जवान धाविका
चार साल में जीते 150 से ज्यादा मेडल, 7 अंतरराष्ट्रीय, दौड़ और शॉटपुट की चैंपियन, देसी खुराक और अनुशासन से मैदान में अब भी फिट जज्बा हो तो उम्र सिर्फ एक आंकड़ा है। चरखी दादरी के कादमा
गांव की वयोवृद्ध खिलाड़ी रामबाई इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। 104 साल की उम्र में खेल मैदान में कदम रखा और अब 108 की उम्र में भी पदक जीत रही हैं। चार साल में ही 150 से ज्यादा पदक। इनमें 7 अंतरराष्ट्रीय पदक भी शामिल। यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब उनकी दोहती शर्मिला ने खेल में उतरने का आग्रह किया। पहली ही राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में पांच पदक जीतकर उन्होंने साबित कर दिया- जिंदगी में खेल अब भी बाकी है। फिर तो मैदान उनकी दिनचर्या बन गया। 100 मीटर दौड़। 3000 मीटर पैदल चाल। शॉटपुट। हर इवेंट में दमखम दिखाया। सबसे वरिष्ठ प्रतिभागी होने के बावजूद हर बार मेडल जीतना उनकी आदत बन गई। रामबाई खेल ही नहीं, खेलों की परंपरा भी आगे बढ़ा रही हैं। बेटी संतरा देवी और दोहती शर्मिला भी अंतरराष्ट्रीय एथलीट हैं। दोनों ने 100 से अधिक पदक जीते हैं। यानी तीन पीढ़ियों में खेल का जुनून रगों में दौड़ रहा है।
सी खुराक, जबरदस्त फिटनेस
रामबाई की जवानी का असली राज उनकी देसी खुराक है। रोजाना सुबह-शाम आधा किलो दूध। साथ में घी, दही, चूरमा और मिसी रोटी। इसके अलावा खेतों में पैदल चलना उनकी आदत है। यही उनका जिम है, यही उनका फिटनेस मंत्र। उनकी कहानी सिर्फ मेडल की नहीं है... यह संदेश है कि फिटनेस सप्लीमेंट्स से नहीं, अनुशासन और खेल से आती है।
धर्मचंद : सख्त दिनचर्या, मजबूत इच्छाशक्ति से 89 की उम्र में भी जमा रहे धाक
बिजली निगम से सेवानिवृत्त 89 वर्षीय धर्मचंद शर्मा अब भी ट्रैक पर दौड़ते हैं। 52 साल से उनका अभ्यास जारी है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय एथलीट भीम सिंह घनघस से प्रेरणा ली और उनको मास्टर एथलीट बना दिया। पहली बार हिसार के जाट कॉलेज के ट्रैक पर चारों स्पर्धाओं-5000, 10000, 1500 और 400 मीटर में उन्होंने स्वर्ण पदक जीते। इसके बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदकों की झड़ी लगा दी। वर्ष 1991-92 में राज्यपाल भी उनको सम्मानित कर चुके हैं। वे 1968 में बिजली निगम में खेल कोटे से भर्ती हुए थे। 1998 में फोरमैन पद से सेवानिवृत्त हो गए। उनका दिन सुबह दो बजे शुरू होता है। नहाकर भजन-कीर्तन और गीता पाठ करते हैं। योग, प्राणायाम और ओम का जाप उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। सुबह सात बजे पश्चिमी यमुना नहर की पटरी पर पहुंचकर रोजाना 10 किलोमीटर दौड़ते हैं।
खुश रहना ही सेहत का राज
संतुलित आहार और खुश रहना ही असली सेहत है। वह कभी मांसाहारी भोजन नहीं करते। उनका विश्वास है कि खुशनुमा मिजाज से ही विल पावर बढ़ती है।
युवाओं को नसीहत
युवाओं से कहते हैं कि मोबाइल से दूरी रखें। अभिभावकों के साथ समय बिताएं। खेलों से जुड़ें। खेल इंसान की असली पूंजी है।
महावीर सिंह : रिकाॅर्ड में भी महा वीर
73 वर्षीय मास्टर एथलीट महावीर सिंह ने फिटनेस और जज्बे के दम पर देश-विदेश में पहचान बनाई है। 1972 में खेलों की शुरुआत कबड्डी और कुश्ती से की। इसके बाद एथलेटिक्स में खुद को साबित किया और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते। 1974 में हरियाणा पुलिस में भर्ती हुए और मधुबन पुलिस लैब में फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ भी रहे। वर्ष 2010 में सब-इंस्पेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए। रिटायर होने के बाद 2015 में करनाल के मास्टर एथलीट धर्मचंद शर्मा के साथ मिलकर मास्टर्स एथलेटिक्स एसोसिएशन बनाई। इस मंच से जिलेभर के खिलाड़ियों को जोड़ा। वे अब उनको सिखा भी रहे हैं। महावीर ने हर्डल रेस, रिले रेस और ट्रिपल जंप में स्वर्ण पदक अपने नाम किए। 100 मीटर हर्डल रेस 22 सेकेंड में पूरा करने का उनका रिकॉर्ड रहा है। ट्रिपल जंप में 7.50 मीटर की छलांग लगाकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनाई। मलेशिया और सिंगापुर में कई पदक जीत चुके हैं। महावीर का कहना है कि जुनून और अनुशासन ही लंबी उम्र तक फिट रहने का राज है। खेल इंसान को न सिर्फ मजबूत बनाते हैं बल्कि जीवन में नई ऊर्जा भी भरते हैं।
दिनचर्या भी प्रेरणादायी
महावीर की दिनचर्या भी प्रेरणादायी है। वह रोज सुबह चार बजे उठते हैं और पांच बजे कर्ण स्टेडियम पहुंचकर पांच किलोमीटर दौड़ते हैं। गुनगुना पानी और दूध से दिन की शुरुआत करते हैं। संतुलित आहार, अंकुरित चने, फल, दाल और मिक्स अनाज की रोटी उनके खानपान का हिस्सा है।
सोहन सिंह संधू : जंग से खेल के मैदान तक परचम
भानोखेड़ी गांव के 70 वर्षीय सोहन सिंह संधू 1967 में फौज में भर्ती हुए थे। उन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में हिस्सा लिया और देश को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई। मास्टर खेलों में अब तक वे 10 पदक जीत चुके हैं, जिनमें तीन स्वर्ण शामिल हैं। ये पदक उन्होंने सिंगापुर, गोवा व पंजाब के पठानकोट में हुई प्रतियोगिताओं में जीते।
हाल ही में उन्होंने यमुनानगर में आयोजित 6वीं हरियाणा राज्य मास्टर्स गेम्स एथलेटिक्स में हिस्सा लिया और 100 मीटर दौड़, लंबी कूद और शॉटपुट तीनों स्पर्धाओं में पहला स्थान हासिल किया। सोहन सिंह का कहना है कि सेना ने मुझे अनुशासन और खेल का जज्बा सिखाया। नौकरी के दौरान वे अक्सर अंबाला कैंट से अपने गांव तक दौड़कर आते-जाते थे। वे बच्चों के शारीरिक विकास को लेकर भी गंभीर हैं। उन्होंने गांव में बच्चों के लिए खेल का मैदान तैयार कराया है और साल में एक बार प्रतियोगिताएं भी करवाते हैं।
अनुशासित दिनचर्या
संयमित दिनचर्या और फिटनेस पर ध्यान देना ही उनकी सफलता का राज है। रोज सुबह तीन बजे वह गुरुद्वारा साहिब में पाठ करने जाते हैं। इसके बाद बच्चों को खेल-कूद की जानकारी देते हैं और खुद भी कसरत व दौड़ लगाते हैं। खानपान में वह दूध, दही, घी और हरी सब्जियां शामिल करते हैं।
डॉ. आरके सांगवान : उम्र 86, पदक 75 ...नहीं कोई थकान
उम्र बढ़ने पर लोग सहारा ढूंढते हैं लेकिन हिसार के डॉ. आरके सांगवान ने उम्र को मात दी है। 86 की उम्र में भी वह मैदान पर दौड़ते हैं। पदक जीतते हैं और साबित करते हैं कि असली जवानी खेलते रहने में है। नवदीप कॉलोनी निवासी डॉ. सांगवान अब तक 75 से ज्यादा पदक जीत चुके हैं। स्वीमिंग हो या एथलेटिक्स, उनका जलवा हर जगह देखने को मिलता है। रिले रेस, पांच किलोमीटर वॉक और स्टीपल चेज में उनका नाम सबसे ऊपर आता है। खेल से उनका रिश्ता पुराना है। बीते 20 साल से मास्टर्स चैंपियनशिप में लगातार हिस्सा ले रहे हैं। उम्र चाहे कितनी भी बढ़ी हो, मैदान में उनका दमखम युवाओं जैसा ही नजर आता है। दर्शक दंग रह जाते हैं। डॉ. सांगवान पेशे से प्रोफेसर रहे। एचएयू से रिटायर होने के बाद भी खेल छोड़ना मंजूर नहीं किया। अब खेल ही उनकी पहचान है। डॉ. सांगवान कहते हैं कि उम्र थकाती नहीं। सोच थकाती है। खेलते रहो तो जिंदगी जवां रहती है।
अनुशासन ही ताकत
सांगवान रोज सुबह पांच बजे उठते हैं। नियमित अभ्यास करते हैं। उनका कहना है-फिटनेस का राज सिर्फ अभ्यास और अनुशासन है।
देसी खुराक ही फिटनेस का राज
उनकी थाली में दूध, बादाम और गूंद के लड्डू जरूर होते हैं। यही उनकी असली ताकत है। यही वजह है कि इस उम्र में भी वे फिट हैं।
अमर सिंह : युवाओं की रफ्तार को मात
उम्र रुकावट नहीं है। जज्बा हो तो हर कदम दौड़ बन जाता है। यह कहावत हर दिन साबित कर रहे हैं आजाद नगर के रहने वाले 85 साल के अमर सिंह। सेना से हवलदार पद से रिटायर हुए पर खेल से रिश्ता कभी टूटा नहीं। आज मैदान उनकी जिंदगी बन चुका है और दौड़ उनका जुनून। अब तक 40 से ज्यादा पदक जीत चुके हैं। राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक। हर बार मैदान पर उतरे और जीतकर लौटे। रोज सुबह डेढ़ घंटे अभ्यास करते हैं। घर के पास बना फार्म ही उनका अखाड़ा है। पसीना उनकी दवा है। मैदान उनका साथी। सात साल पहले मास्टर्स चैंपियनशिप में उतरे। पहला ही कदम जीत की तरफ बढ़ा, तब से लगातार मेडल जीत रहे हैं। 100 मीटर। 200 मीटर। 5 किलोमीटर वॉक। हर इवेंट में उनका दमखम देखते ही बनता है। युवाओं की रफ्तार को मात देते हैं। अब उनकी नजरें एशिया चैंपियनशिप पर हैं। 5 से 9 नवंबर तक चेन्नई में मुकाबला होगा। अमर सिंह कहते हैं कि तैयारी पूरी है, मैदान मेरी उम्र बताएगा।
सेहत का राज : उनकी सेहत का राज साधारण जीवनशैली है। दूध, देसी खानपान और संतुलित डाइट। अनुशासन उनकी ताकत है।