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Hindi News ›   Haryana ›   Chandigarh-Haryana News ›   Medical reimbursement cannot be denied on the pretext of financial crisis : High Court

आर्थिक संकट के बहाने चिकित्सा प्रतिपूर्ति से नहीं किया जा सकता इन्कार : हाईकोर्ट

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- हरियाणा पुलिस हाउसिंग काॅर्पोरेशन के सेवानिवृत्त कर्मचारियों की याचिका मंजूर की
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- सभी विवादित आदेशों को मनमाना, तर्कहीन व कानून के खिलाफ बताते हुए किया रद्द अमर उजाला ब्यूरो



चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसले में स्पष्ट किया कि कोई भी सार्वजनिक निगम आर्थिक संकट का बहाना बनाकर अपने सेवानिवृत्त कर्मचारियों को चिकित्सा प्रतिपूर्ति देने से इन्कार नहीं कर सकता है। कोर्ट ने ऐसे सभी विवादित आदेशों को मनमाना, तर्कहीन और कानून के विपरीत बताते हुए रद्द कर दिया है।



जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने अपने निर्णय में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हम इस तथ्य से आंख नहीं मूंद सकते है कि किसी सार्वजनिक निकाय ने कर्मचारियों की सेवाएं उनके जीवन के युवावस्था और सबसे उत्पादक वर्षों में लीं। ऐसे में सेवानिवृत्ति के बाद जब उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ती हैं और चिकित्सा देखभाल की सबसे अधिक जरूरत होती है, उन्हें मेडिकल प्रतिपूर्ति से वंचित करना पूरी तरह से मनमाना और अनुचित है।
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यह फैसला उन याचिकाओं पर आया जिनमें हरियाणा और अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ दिशानिर्देश जारी करने की मांग की गई थी ताकि हरियाणा पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को चिकित्सा प्रतिपूर्ति का लाभ दिया जा सके।
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हरियाणा पुलिस हाउसिंग काॅर्पोरेशन के सेवानिवृत्त कर्मचारियों गुरुचरण व अन्य ने दलील रखी कि निगम अपने वर्तमान कर्मचारियों को यह सुविधा दे रहा है, लेकिन सेवानिवृत्त कर्मचारियों को इससे वंचित कर रहा है जबकि ऐसा भेदभाव किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट की ही एक डिवीजन बेंच यह स्पष्ट कर चुकी है कि जब सेवा में लगे कर्मचारियों को मेडिकल सुविधा दी जा रही हो तो रिटायर्ड कर्मचारियों को इससे अलग नहीं किया जा सकता। इस निर्णय के खिलाफ दायर सरकार की विशेष अनुमति याचिका भी पहले ही खारिज हो चुकी है।


कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं और सरकार ने ऐसा रिकार्ड या नियम प्रस्तुत नहीं किया जिससे साबित हो सके कि चिकित्सा प्रतिपूर्ति का लाभ उनके रिटायरमेंट से पहले बदला या समाप्त किया गया था। वर्ष 2010 के 27 जून और 8 जुलाई के वे आदेश, जिनमें सिर्फ आर्थिक अक्षमता का हवाला देकर मेडिकल प्रतिपूर्ति से मना किया गया, न सिर्फ अस्थिर हैं बल्कि विधि के स्थापित सिद्धांतों के भी विपरीत हैं।


ऐसे में निगम के कर्मचारियों को कमजोर वर्ग में डालकर उनके साथ भेदभाव करना संवैधानिक रूप से अस्वीकृत है। हाईकोर्ट ने सभी आपत्तिजनक आदेशों को रद्द कर दिया और निगम को निर्देश दिया कि लागू नियमों और कानून के अनुसार सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पात्र चिकित्सा प्रतिपूर्ति की राशि जारी की जाए।
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