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Chandigarh-Haryana News: प्रोबेशन अवधि में ईमानदारी संदिग्ध, सिविल जज की बर्खास्तगी बरकरार
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मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली कमेटी ने की थी सेवा समाप्त करने की सिफारिश
कमेटी की सिफारिश और बर्खास्तगी के आदेश को दी गई थी हाईकोर्ट में चुनौती
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रोबेशन अवधि के दौरान ईमानदारी संदिग्ध पाए जाने और ज्यादा शिकायतों के चलते हरियाणा के एक सिविल जज की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है।
मुख्य न्यायाधीश शील नागू और जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता के खराब प्रदर्शन, आचरण और व्यवहार के आधार पर संदिग्ध ईमानदारी सहित प्रतिकूल टिप्पणियों के बावजूद सेवा में बनाए रखा गया, तो एक असामान्य स्थिति उत्पन्न होगी। यह ईमानदारी की उस अवधारणा के लिए हानिकारक होगी जिस पर पूरी न्यायिक प्रणाली टिकी हुई है। तत्कालीन जज अंकुर लाल ने 2012 में पारित सिफारिशों को रद्द करने की मांग की थी, जिसके तहत उच्च न्यायालय ने प्रवेश स्तर पर सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर उनकी प्रोबेशन के दौरान सेवाओं को समाप्त करने की सिफारिश की थी। याची को 2008 में दो साल की प्रोबेशन पर हरियाणा सिविल सेवा (न्यायिक शाखा) में सिविल जज के रूप में नियुक्त किया गया था। याची के मूल्यांकन के दौरान याचिकाकर्ता के विरुद्ध प्राप्त कुछ शिकायतों पर गौर किया गया। प्रशासनिक समिति ने 2012 में याचिकाकर्ता की प्रोबेशन अवधि को छह महीने के लिए बढ़ाने की सिफारिश की थी, क्योंकि 2010-11 की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में कहा गया था कि याचिकाकर्ता की ईमानदारी संदिग्ध है।
फिरोजपुर झिरका बार एसोसिएशन से एक गुमनाम शिकायत प्राप्त हुई थी, जिसे तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने संबंधित प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा था। याचिकाकर्ता उस समय भिवानी में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर तैनात था की सेवाओं को समाप्त करने की सिफारिश की गई। याची के वकील ने कहा कि दो वर्ष की प्रोबेशन व एक वर्ष की विस्तारित अवधि पूरी होने के बाद याचिकाकर्ता को स्थायी माना जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि स्थायी माने जाने की अवधारणा अराजकता पैदा करेगी, जिसे सेवा न्यायशास्त्र में बहुत पहले ही त्याग दिया गया है। तीन वर्ष की प्रोबेशन अवधि पूरी करने मात्र से स्थायी होने का अधिकार नहीं मिल जाता, जब तक कि कैडर में स्थायी रिक्ति न हो। प्रोबेशन पूरी होने पर, राज्यपाल हाईकोर्ट की सिफारिश पर स्थायी होने का आदेश जारी करते हैं। कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी के आदेश को चुनौती देते समय किसी विशेष प्राधिकारी के खिलाफ कोई दुर्भावना का आरोप नहीं लगाया गया था।
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कमेटी की सिफारिश और बर्खास्तगी के आदेश को दी गई थी हाईकोर्ट में चुनौती
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रोबेशन अवधि के दौरान ईमानदारी संदिग्ध पाए जाने और ज्यादा शिकायतों के चलते हरियाणा के एक सिविल जज की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है।
मुख्य न्यायाधीश शील नागू और जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता के खराब प्रदर्शन, आचरण और व्यवहार के आधार पर संदिग्ध ईमानदारी सहित प्रतिकूल टिप्पणियों के बावजूद सेवा में बनाए रखा गया, तो एक असामान्य स्थिति उत्पन्न होगी। यह ईमानदारी की उस अवधारणा के लिए हानिकारक होगी जिस पर पूरी न्यायिक प्रणाली टिकी हुई है। तत्कालीन जज अंकुर लाल ने 2012 में पारित सिफारिशों को रद्द करने की मांग की थी, जिसके तहत उच्च न्यायालय ने प्रवेश स्तर पर सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर उनकी प्रोबेशन के दौरान सेवाओं को समाप्त करने की सिफारिश की थी। याची को 2008 में दो साल की प्रोबेशन पर हरियाणा सिविल सेवा (न्यायिक शाखा) में सिविल जज के रूप में नियुक्त किया गया था। याची के मूल्यांकन के दौरान याचिकाकर्ता के विरुद्ध प्राप्त कुछ शिकायतों पर गौर किया गया। प्रशासनिक समिति ने 2012 में याचिकाकर्ता की प्रोबेशन अवधि को छह महीने के लिए बढ़ाने की सिफारिश की थी, क्योंकि 2010-11 की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में कहा गया था कि याचिकाकर्ता की ईमानदारी संदिग्ध है।
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फिरोजपुर झिरका बार एसोसिएशन से एक गुमनाम शिकायत प्राप्त हुई थी, जिसे तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने संबंधित प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा था। याचिकाकर्ता उस समय भिवानी में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर तैनात था की सेवाओं को समाप्त करने की सिफारिश की गई। याची के वकील ने कहा कि दो वर्ष की प्रोबेशन व एक वर्ष की विस्तारित अवधि पूरी होने के बाद याचिकाकर्ता को स्थायी माना जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि स्थायी माने जाने की अवधारणा अराजकता पैदा करेगी, जिसे सेवा न्यायशास्त्र में बहुत पहले ही त्याग दिया गया है। तीन वर्ष की प्रोबेशन अवधि पूरी करने मात्र से स्थायी होने का अधिकार नहीं मिल जाता, जब तक कि कैडर में स्थायी रिक्ति न हो। प्रोबेशन पूरी होने पर, राज्यपाल हाईकोर्ट की सिफारिश पर स्थायी होने का आदेश जारी करते हैं। कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी के आदेश को चुनौती देते समय किसी विशेष प्राधिकारी के खिलाफ कोई दुर्भावना का आरोप नहीं लगाया गया था।
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