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Hindi News ›   Haryana ›   Chandigarh-Haryana News ›   Cannot order payment on 55-year-old claim on grounds of sympathy: High Court, Court News, Haryana News

सहानुभूति के आधार पर 55 साल पुराने दावे पर भुगतान का आदेश नहीं दे सकते: हाईकोर्ट

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-बीएसएफ के सिपाही की याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने की टिप्पणी
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-सेवा समाप्त होने के 55 साल बाद किया था पीएफ व अन्य लाभ का दावा
अमर उजाला ब्यूरो

चंडीगढ़। सेवा समाप्त होने के 55 वर्ष बाद भविष्य निधि (पीएफ) और अन्य लंबित लाभों की मांग को लेकर याचिका दाखिल करने वाले बीएसएफ के पूर्व जवान को झटका देते हुए हाईकोर्ट ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल सहानुभूति या भावनात्मक आधार पर सरकार को किसी भी प्रकार का भुगतान करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। प्रत्येक वित्तीय दावा दस्तावेजी साक्ष्य और समयबद्धता की मांग करता है।

जस्टिस विनोद एस भारद्वाज की एकल पीठ के समक्ष सीमा सुरक्षा बल के पूर्व सिपाही जींद निवासी जय नारायण की याचिका सुनवाई के लिए पहुंची थी। याचिकाकर्ता ने 10 अक्टूबर 2023 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी भविष्य निधि और अन्य सेवा लाभों की मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि इतने पुराने रिकाॅर्ड अब उपलब्ध नहीं हैं। याची ने बताया कि 1965 में उसे पंजाब आर्म्ड पुलिस की 50वीं बटालियन में सिपाही के रूप में 115 रुपये प्रतिमाह वेतन पर नियुक्त किया गया था। 1 अप्रैल 1968 को यह बटालियन बीएसएफ की 31वीं बटालियन में मिला दी गई और इसी के साथ वह बीएसएफ के सिपाही बन गए। 7 मई 1969 को जय नारायण को दो अन्य जवानों के साथ किकर आब्जर्वेशन पोस्ट पर ड्यूटी सौंपी गई थी, जहां उन्होंने तीन संदिग्धों को पाकिस्तान से भारतीय सीमा में प्रवेश करते देखा। मुठभेड़ में उन्होंने आत्मरक्षा में गोली चलाई, जिसमें एक व्यक्ति मारा गया। इसपर उनके खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया लेकिन 28 नवंबर 1970 को कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। उसकी कुल सेवा 21 अगस्त 1965 से 28 नवम्बर 1970 तक की थी। जय नारायण का कहना है कि बरी होने के बाद भी उसे सेवा में दोबारा नियुक्त नहीं किया गया और न ही उन्हें उनकी जमा पीएफ की राशि या बकाया वेतन दिया गया। उन्होंने अक्टूबर 2020 में एक मांग पत्र सौंपा था, जिसके जवाब में जुलाई 2021 में बीएसएफ ने कहा कि रिकार्ड 50 साल पुराना है और अब दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। इस जवाब से असंतुष्ट होकर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। परंतु कोर्ट ने यह मानते हुए कि याचिका बेहद देरी से दायर की गई और रिकार्ड नष्ट हो चुके हैं, याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि सरकारी सेवा मामलों में वित्तीय दावों की पुष्टि के लिए आवश्यक दस्तावेजों और समय की महत्ता है।
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