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Hindi News ›   Haryana ›   Chandigarh-Haryana News ›   41579 offline admissions in 14000 government schools in the state

Chandigarh-Haryana News: पहचान बिन, योजनाएं छिन्न

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एक्सक्लूसिव: -
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सर्वशिक्षा अभियान

- प्रदेश के 14 हजार सरकारी स्कूलों में 41,579 ऑफलाइन दाखिले
- पीपीपी के बिना बच्चे छात्रवृत्ति, ट्रांसपोर्ट, ड्रेस व स्टेशनरी से वंचित

कुलदीप शुक्ला
चंडीगढ़। प्रदेशभर के 14 हजार 200 सरकारी स्कूलों में तकरीबन 41,579 बच्चों को केवल परिवार पहचान पत्र (पीपीपी) में नाम न होने के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा। बिना पहचान पत्र के इनके लिए सरकारी योजनाएं छिन्न हो चुकी हैं।


प्रदेश में बाल वाटिका से लेकर 12वीं कक्षा तक इस सत्र में प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कुल 22,15,073 विद्यार्थियों के दाखिले हुए हैं। इनमें से 21,73,494 ऑनलाइन और 41,579 ऑफलाइन दाखिले दर्ज किए गए। ऑफलाइन दाखिले वाले बच्चों को केवल किताबें और मिड-डे-मील का लाभ दिया जाता है। एससी, बीसी और बीपीएल श्रेणी के बच्चों को मिलने वाली छात्रवृत्ति, ट्रांसपोर्ट सुविधा, ड्रेस और स्टेशनरी की राशि उनके खातों तक नहीं पहुंच पाती क्योंकि इनके लिए आधारभूत शर्त पीपीपी में नाम जुड़ा होना अनिवार्य है।
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सबसे अधिक पानीपत में 4702, पंचकूला में 3312, सिरसा में 3123, करनाल में 3050, अंबाला में 2814, गुरुग्राम में 2474, सोनीपत में 2400, फतेहाबाद में 2227, कुरुक्षेत्र में 1828, भिवानी में 1612 ऑफलाइन दाखिले हुए हैं। इसके अलावा चरखीदादरी में 382, फरीदाबाद में 1150, हिसार में 1154, झज्जर में 1131, जींद में 1258, कैथल में 1396, महेंद्रगढ़ में 1409, नूहं में 244, पलवल में 1311, रेवाड़ी में 1466, रोहतक में 1429 और यमुनानगर में 1682 बच्चों के दाखिले ऑफलाइन किए गए हैं।
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शिक्षकों की मेहनत पर पानी, ड्रॉपआउट का भी कारण
सरकार ने शिक्षकों को बच्चों को ढूंढकर स्कूलों में दाखिला करवाने की जिम्मेदारी दी है ताकि ड्रॉपआउट के मामले कम हों लेकिन हकीकत यह है कि दाखिला होने के बावजूद जब बच्चों को ट्रांसपोर्ट या अन्य सुविधाएं नहीं मिलतीं तो वे धीरे-धीरे स्कूल जाना बंद कर देते हैं। यह सीधे तौर पर शिक्षकों की मेहनत पर पानी फेर देता है और ड्रॉपआउट बच्चों की संख्या बढ़ने का कारण बन जाता है।

सरकारी तंत्र पर सवाल
सर्वशिक्षा अभियान का उद्देश्य हर बच्चे को समान शिक्षा और सुविधाएं उपलब्ध कराना है लेकिन जब योजनाओं का लाभ केवल पीपीपी पर टिका हो तो मुफ्त शिक्षा का असली मतलब अधूरा रह जाता है। सवाल उठता है कि यदि बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंच पाएंगे तो मुफ्त शिक्षा का क्या अर्थ रह जाएगा?

समाधान
दाखिला नंबर के आधार पर अस्थायी सुविधाएं उपलब्ध कराए सरकार: शर्मा
राजकीय प्राथमिक शिक्षक संघ हरियाणा के राज्य महासचिव राजेश शर्मा का कहना है कि ऑफलाइन बच्चों में ज्यादातर बाहर के राज्यों के आए परिवारों के बच्चे शामिल हैं। या तो सरकार को पीपीपी की अनिवार्यता खत्म करनी चाहिए या फिर दाखिला नंबर के आधार पर अस्थायी रूप से ट्रांसपोर्ट और अन्य सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए। उनके अनुसार, जब तक बच्चों का नाम पीपीपी में जुड़ नहीं जाता तब तक इस अंतरिम व्यवस्था से नौनिहालों को योजनाओं से वंचित होने से बचाया जा सकता है। राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, बरवाला से रिटायर्ड लेक्चरर चमन लाल कौशिक ने बताया कि सरकारी तंत्र की यह कठोरता सीधे बच्चों के भविष्य पर असर डाल रही है। मुफ्त शिक्षा का वादा तभी सार्थक होगा जब यह वास्तव में हर बच्चे तक बिना किसी शर्त के पहुंचे। वरना पीपीपी जैसी औपचारिकताएं शिक्षा का अधिकार बच्चों से छीनने का सबसे बड़ा कारण बन जाएंगी।


कोट -
मैंने कुछ माह पहले ही स्कूलों की जिम्मेदारी संभाली है। इस समस्या का हल निकालकर बच्चों तक सभी तरह की सरकारी सुविधाओं को पहुंचाया जाएगा। यही सरकार और शिक्षा विभाग का लक्ष्य है।

विनीत गर्ग, एसीएस, स्कूल शिक्षा विभाग, हरियाणा।
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