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Bhiwani News: सांग महोत्सव में सुनाई सेठ ताराचंद के त्याग और धर्म की कहानी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 24 Jan 2026 01:32 AM IST
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The story of Seth Tarachand's sacrifice and religion was narrated at the Song Festival.
बापोड़ा में सांग का मंचन करते कलाकार।
भिवानी। गांव बापोड़ा में आयोजित सूर्य कवि पंडित लख्मीचंद जयंती महोत्सव के चौथे दिन शुक्रवार को सांग महोत्सव के मंच से सेठ ताराचंद के त्याग, संघर्ष और धर्म की प्रेरक कथा सुनाई गई। रिमझिम बारिश की बूंदों के बीच सांग सम्राट रामशरण अत्री और उनकी टोली ने सेठ ताराचंद सांग के दूसरे भाग का भावपूर्ण मंचन कर लोक संस्कृति और नैतिक मूल्यों का प्रभावशाली संदेश दिया।
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सांग के माध्यम से रामशरण अत्री ने बताया कि दिल्ली के प्रसिद्ध दानवीर सेठ ताराचंद कैसे अपने भाई की बातों में आकर धर्म-कर्म का मार्ग छोड़ देते हैं। इसके बाद उनके जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है और व्यापार में भारी घाटा उठाना पड़ता है। परिस्थितियां यहां तक बिगड़ जाती हैं कि सेठ ताराचंद को अपने पुत्र चंद्रगुप्त को हापुड़ के सेठ मनसा राम के पास गिरवी रखना पड़ता है।
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सांग में दर्शाया गया कि विपरीत हालातों के बावजूद सेठ ताराचंद ने हार नहीं मानी और दोबारा मेहनत शुरू की। लकड़ी बेचकर होने वाली आय का एक हिस्सा उन्होंने पुनः गौ-सेवा और धर्म कार्यों में लगाना आरंभ किया। उधर, पुत्र चंद्रगुप्त ने अपनी योग्यता और परिश्रम के बल पर सिंगल दीप (श्रीलंका) के व्यापार में अपार सफलता हासिल की और वहां के सेठ की बेटी से उसका विवाह हुआ। अंततः धर्म के मार्ग पर लौटने से सेठ ताराचंद के दिन फिरते हैं और पूरा परिवार फिर से हंसी-खुशी एक हो जाता है।
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सांगी रामशरण अत्री ने अपनी बुलंद आवाज में सूर्य कवि पंडित लख्मीचंद की कालजयी रागनियों को प्रस्तुत किया। विशेष रूप से मेरी आत्मा नू कहती फूलो-फलो सुहाग तेरा, लेन-देन में कसर ना छोड़ी आगे बेटी भाग तेरा और जहाज के माह बैठ सेठानी आई दिल्ली में, फिरे टोहवती मिले ननद का भाई दिल्ली में जैसी रागनियों पर श्रोता झूम उठे और जमकर वाहवाही की। हल्की बूंदाबांदी के बावजूद बड़ी संख्या में ग्रामीण सांग का आनंद लेने डटे रहे। कार्यक्रम के अंत में सूर्य कवि पंडित लख्मीचंद आयोजन समिति की ओर से मुख्य सांगी रामशरण अत्री को शॉल भेंट कर सम्मानित किया गया। आयोजन समिति के सदस्य विनोद प्रधान और मुकेश बापोड़ा ने कहा कि इस तरह के सांस्कृतिक आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ समाज में नैतिक मूल्यों का भी प्रसार करते हैं।
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