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Bhiwani News: टूटे मकानों के मलबे में दफन हो रहा तेरहवीं शताब्दी के डोभी तालाब का स्वर्णिम इतिहास, अब निशान भी नहीं बचें

Sat, 20 Sep 2025 01:11 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी Updated Sat, 20 Sep 2025 01:11 AM IST
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The golden history of the thirteenth-century Dobhi pond is being buried under the rubble of demolished houses, leaving no trace of it.
शहर के डोभी तालाब पर डाला गया मलबा।
भिवानी। धार्मिक नगरी छोटी काशी का प्रतीक रहे तेरहवीं सदी के डोभी तालाब का स्वर्णिम इतिहास अब टूटे मकानों के मलबे के नीचे दब चुका है। जिस तालाब से कभी शहरवासियों की प्यास बुझती थी, उसके चारों ओर अब अवैध कब्जों के टीले बन चुके हैं। नगर परिषद करीब ढाई करोड़ रुपये खर्च कर तालाब का नवीनीकरण कराने का दावा कर रही है लेकिन अवैध कब्जों को हटाए बिना यह दावा केवल कागजी ही साबित होगा और तालाब की प्राचीन भव्यता लौटाना मुश्किल नजर आ रहा है।
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ऐसे हुई थी डोभी तालाब पर भिवानी शहर की स्थापना
पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवों के चंद्रवंश में दिल्ली के अंतिम सम्राट अनंगपाल हुए। उनके भाई राजा विजयपाल ने हिसार रियासत के पास बवानीखेड़ा में राज्य स्थापित किया। उनके वंशज वीर गोगा सिंह के मौसा जाटू सिंह के प्रपौत्र नीमपाल सिंह ने चैत्र वदी पंचमी संवत 1433 (26 फरवरी 1376) को प्राकृतिक तालाब डोभी के किनारे भिवानी शहर की स्थापना की। राजपुरोहित पंडित किशोरीलाल कौशिक लाटा के सानिध्य में स्थापना विधिवत हुई। नीमपाल सिंह ने दानवीरों के सहयोग से तालाब को चुना, मिट्टी और ईंटों से पक्का कराया तथा इसके चारों ओर कुएं और बावड़ियां बनवाईं। यह तालाब कई शताब्दियों तक धार्मिक आस्था व शहरवासियों की प्यास बुझाने का मुख्य स्रोत रहा, पर अब यह गंदे जल और मलबे के नीचे दबा हुआ है।
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डोभी तालाब पर महाराजा नीमपाल सिंह के पौत्र लोहड़ पीर की मजार
भिवानी के संस्थापक महाराजा नीमपाल सिंह के पुत्र बाच्छु सिंह की संतान महीपाल उर्फ लोहड़ व जोनपाल सिंह थी। लोहड़ सिंह (जन्म 1466) की वीरता के चलते दिल्ली दरबार ने उन्हें सम्मान व बख्शीश दी। बाद में उन्होंने डोभी तालाब के किनारे सन्यास ले लिया और तपस्या में लीन हो गए। तब से वे लोहड़ पीर बाबा के नाम से विख्यात हैं। आज भी वहां स्थित लोहड़ पीर का मंदिर भिवानी की संस्कृति और आस्था से जुड़ा हुआ है।
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बरसाती पानी संग्रहण का भी बड़ा भंडार था डोभी तालाब
डोभी तालाब सदियों से बरसाती पानी संग्रहण का बड़ा प्राकृतिक भंडार रहा है। चारों ओर मंदिर व कुएं थे, जहां पूजा-अर्चना की घंटियां व पनिहारिनों के पानी भरने की आवाज से ‘भौण’ की मनोहर गूंज रहती थी। इसी कारण भिवानी को छोटी काशी कहा जाता रहा। अब कब्जों व मलबे के कारण तालाब सिकुड़ चुका है न पुराने कुएं बचे हैं, न बावड़ियों के अवशेष।
जयप्रकाश, क्षेत्रवासी


नगर परिषद को डोभी तालाब के नवीनीकरण से पहले अवैध कब्जों को मुक्त कराना चाहिए। बिना कब्जा हटवाए ढाई करोड़ रुपये खर्च कर पगडंडी-रेलिंग लगाने से तालाब की असली ऐतिहासिकता लौटेगी नहीं बल्कि यह प्रशासन की विफलता छिपाने जैसा होगा। प्रशासन व सरकार को इस धरोहर को कब्जा मुक्त कराने के निर्देश देने चाहिए।

बंटी शर्मा, क्षेत्रवासी


डोभी तालाब के नवीनीकरण कार्य के टेंडर कराकर वर्क ऑर्डर जारी कर काम शुरू करा दिया गया है। करीब ढाई करोड़ के बजट से तालाब को भव्य व नया स्वरूप दिया जाएगा। तालाब के चारों ओर पगडंडी बनाई जाएगी, लाल रंग के पत्थर में नक़्काशीदार जालियां लगेंगी और रेलिंग का काम भी किया जाएगा। एजेंसी को करीब आठ माह में यह काम पूरा करना होगा। फिलहाल तालाब से बारिश के पानी की निकासी का काम चल रहा है और आसपास के अवैध कब्जों को भी हटवाने का आश्वासन दिया गया है। -भवानी प्रताप सिंह, चेयरपर्सन प्रतिनिधि नगर परिषद भिवानी।
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