फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Bhiwani News ›   samwad, programme, girls

अपराध करने में चंद मिनट, सजा में देरी क्यों?

Thu, 05 Dec 2019 11:33 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Thu, 05 Dec 2019 11:33 PM IST
विज्ञापन
samwad, programme, girls
50 फोटो सीबीएलयू परिसर में अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में महिला सुरक्षा को लेकर अपनी बात रखती छा? - फोटो : Bhiwani
लड़का और लड़की एक समान का केवल नारा ही है, इसे धरातल पर आज तक लोग अपनी सोच में नहीं उतार पाए हैं। निर्भया के आरोपियों को आज तक सजा नहीं मिली है, ये कानून में ढिलाई और लचीलेपन का ही नतीजा है। अपराध करने में तो बीमार मानसिकता के लोगों को चंद मिनट लगता है, लेकिन इन्हें सजा दिलाने में इतनी देरी क्यों? ये सवाल उन महिलाओं की जुबां पर है, जो हर रोज अपने आपको घर से बाहर निकलते समय असुरक्षित महसूस कर रही हैं। बचपन से ही बच्चों को भाई-बहन और मां-मौसी के रिश्तों की सीख दी जाती है, लेकिन दूसरों की बहन-बेटियों के प्रति भी वहीं भाव रखें, ये सीख शायद नहीं दी जाती। अगर हर मां-बाप अपने बच्चों को अपने नजदीकी रिश्तों के आदर और सत्कार का भाव सिखाते हैं तो उन्हें हर महिला के प्रति ये सम्मान देने के लिए बच्चों में अच्छे संस्कार डालने होंगे। यह कहना था चौ. बंसीलाल विश्वविद्यालय की छात्राओं और शिक्षिकाओं का। वे अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में अपनी बेबाक राय रखने के साथ-साथ कानून और सामाजिक व्यवस्था पर ही बड़ा सवाल भी उठा रही थी।
विज्ञापन

बेटियों की सुरक्षा की बात तो हर कोई करता है, मगर बेटियां आज समाज में कितनी सुरक्षित है यह भी किसी से छिपा नहीं है। घर से बाहर निकलते ही लड़कियों के लिए चुनौतियां सिर उठा लेती हैं। मां-बाप भी बेटियों पर ही सभ्यता और संस्कारों का दबाव बनाते हैं, जबकि बेटों पर इस तरह की बंदिशें ही शायद लगाई जाती हों। जब तक हमारी सोच में बेटा और बेटी समान नहीं होंगे, तब तक लड़कियों की समानता की बात करना बेमानी होगा।
विज्ञापन

- खुशबू, छात्रा।
अपराध करने के बावजूद भी अपराधी खुलेआम घूमते हैं, जिससे हर किसी को असुरक्षा का अहसास होता है। जब तक कानून सख्त नहीं होगा और अपराधी को उसके अपराध की उतनी ही सख्त सजा नहीं मिलेगी, तब तक बेटियों के लिए सुरक्षित माहौल नहीं बनेगा। शिक्षा में भी जरूरी बदलाव होना चाहिए, ताकि हम संस्कारों का ना केवल ढिंढोरा पीटते रहे, बल्कि इसे अपने व्यक्तिगत जीवन में भी उतारें। बेटियों की सुरक्षा के लिए भी कानून में जरूरी बदलाव किए जाएं।
विज्ञापन
विज्ञापन

- डिम्पी, छात्रा।
निर्भया के दोषियों को अब तक सजा नहीं मिल पाई है, इससे ना केवल उस पीड़ित परिवार का मनोबल टूट रहा है, जिसने अपनी बेटी खोई है। बल्कि देश की हर उस बेटी को भी असुरक्षा का अहसास हो रहा है, जो पढ़ाई या फिर काम के लिए घर से बाहर जाती है। हमारी न्याय प्रणाली को चाहिए कि ऐसे अपराधियों पर बेवजह के मुकदमेबाजी चलाने की बजाए आरोप सिद्ध करने के लिए बिना देरी सुनवाई कर जल्द से जल्द उन्हें सजा के अंजाम तक पहुंचाना चाहिए।
- ज्योति, छात्रा।
महिलाओं की इज्जत से खेलने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाना चाहिए। इसके लिए कम से कम फांसी की सजा निर्धारित की जाए। सबसे जरूरी तो लड़का और लड़कियों के प्रति नजरिए में बदलाव बहुत जरूरी है। इसी के साथ शिक्षा व्यवस्था में भी बदलाव लाना चाहिए। सामूहिक रेप और फिर निर्मम हत्या जैसे घिनौने अपराध के लिए समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। उसके लिए तो सिर्फ और सिर्फ मौत की सजा ही जरूरी है।
- मनीषा, सीबीएलयू छात्रा।
महिला सुरक्षा के लिए सरकारें कड़े कदम उठाए। महिलाओं को कार्य क्षेत्र के अलावा सार्वजनिक स्थलों पर भी रोजाना ही अनेक ऐसी समस्याएं झेलनी पड़ती हैं जो उनके लिए अशोभनीय ही नहीं बल्कि असुरक्षित होने का भी अहसास कराती है। इस तरह की घटनाओं पर विराम लगाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था का प्रबंध किया जाए और कानून में भी जरूरी बदलाव हों। इसी के साथ शिक्षा में भी नैतिक मूल्यों पर बल दिया जाए, ताकि देश की युवा पीढ़ी संस्कारित और सभ्य नागरिक के तौर पर देश की तरक्की में अपना योगदान दें। अपराधियों को भी जल्द सजा मिले, जिससे दूसरों को भी सबक मिले।

-प्रियंका, सीबीएलयू अनुशासन अधिकारी।
महिला अपराधों की रोकथाम के लिए कानून व शिक्षा प्रणाली में बदलाव बहुत जरूरी है। इसी के साथ सीबीएलयू में भी टीचिंग स्टाफ द्वारा लड़कों की कार्यशालाएं लगाई जाएंगी। जिसमें लड़कों को लड़कियों के प्रति सद्भाव व आदर रखने और आपसी रिश्तों की मर्यादा की बेहतर समझ सिखाई जाएगी। पुरुष प्रधान देश में आज भी पुरुषों को पूरी आजादी है, जबकि महिलाओं पर बंदिशों का बोझ लाद दिया जाता है। जब तक महिला और पुरुष में समानता को आचार और व्यवहार में लागू नहीं किया जाएगा, तब तक सभ्य समाज की नींव नहीं रखी जाएगी।
- डॉ. आस्था पूनिया महिला प्राध्यापक।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed