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लोहारू किले के अवशेषों को संरिक्षत क्षेत्र के रूप में घोषित किया
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25 फोटो ऐतिहासिक लोहारू किला।
- फोटो : Bhiwani
लोहारू। हरियाणा सरकार के पुरातत्व और संग्रहालय विभाग की ओर से हाल ही में एक पत्र जारी हुआ है। इस पत्र पर लोहारू किले को प्राचीन और ऐतिहासिक संस्मारक को संरक्षित स्मारक के रूप में और पुरातत्वीय स्थलों और अवशेषों को संरक्षित क्षेत्र के रूप में घोषित किया है। लोहारू किले को संरक्षित स्मारक करने से क्षेत्र को बड़ी सौगात मिली है। इससे क्षेत्र में पर्यटन स्थल भी बन सकेंगे।
लोहारू का किला ठाकुर अर्जुन सिंह ने 1570 ई. में बनाया था। राव शेखा ने मूलरूप में शेखावती को 33 ठिकानों में विभाजित किया था, जिनमें लोहारू किला 33वां था। यहा तक एक छोटा सा गांव था, जहां कच्चा और मिट्टी का किला था और 1800 ई. तक ऐसा ही रहा। निर्माण के वर्षों बाद लोहारू का किला वास्तुकला का एक दिलचस्प मिश्रण था।
ये था संघर्ष का काल :
लोहारू किले पर 2 बड़े युद्ध हुए हैं। इसमें पहला युद्ध वर्ष 1671 में ठाकुर मदन सिंह और हिसार के मुगल गवर्नर के बीच में भूमि राजस्व पर लड़ा गया था। दूसरा युद्ध खेतड़ी के ठाकुर कीर्त सिंह और राजा भोपाल सिंह के बीच हुआ था, जिन्होंने दावा किया कि लोहारू खेतड़ी का हिस्सा है। राजा भोपाल सिंह लोहारू किले के बाहर लड़ाई में मारे गए थे और उनके सम्मान में एक चट्टी का निर्माण उस स्थान पर किया गया था, जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया था, जो कि किले से लगभग एक किमी दूर स्थित है।
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फिर परगना अलवर राज्य में पारित हुआ और बाद में फिरोजपुर झिरका के राज्य के तहत परगना बन गया, जिस पर 1803 में नवाब अहमद बख्श खान ने शासन किया था। इस वर्ष से पक्का निर्माण मिट्टी का किला और गांव शुरू हो गया। यह किला 1971 के बाद से लोहारू के नवाबों के हाथों में था, जब स्वर्गीय नवाब अमीनुद्दीन अहमद खान ने इसे हरियाणा सरकार को बेच दिया था। चूंकि ये इमारतें निर्जन थीं, इसलिए पूर्व-विंग का हिस्सा होने के कारण सभी उत्तर-विंग ढह गए थे। केवल किले के दक्षिण-पंख (फारुख मंजिल वाले) जीवित हैं, और वह भी बहुत ही जीर्ण अवस्था में चला गया।
वास्तुकला का दिलचस्प मिश्रण शामिल
निर्माण के वर्षों में लोहारू किला वास्तुकला का एक दिलचस्प मिश्रण शामिल करने के लिए आया था। किले के दक्षिण-विंग में दीवान-ए-खास और शीश महल या द रूम ऑफ मिरर्स हैं, जिसमें मुगल/राजपूत शैली का विवरण है। दक्षिण विंग के मध्य भाग में एक बड़े विक्टोरियन स्टाइल के दर्शक कक्ष और बैंक्वेट हॉल थे। दक्षिण-विंग के दाहिने हिस्से में रसोई के साथ जाना महल भी शामिल था। दक्षिण-विंग के बाईं ओर विशुद्ध रूप से मुगल वास्तुकला थी। पूर्व-विंग को दिल्ली हवेली शैली में निष्पादित किया गया था, जो उस समय बहुत फैशनेबल माना जाता था और शेखावाटी हवेल से अलग था।
लोहारू किला को संस्मारक के संरक्षित स्मारक के रूप में घोषित करने की फिलहाल कोई सूचना नहीं है। इस संबंध में संबंधित अधिकारी से सूचना प्राप्त की जाएगी।
- जगदीश चंद्र, एसडीएम लोहारू।
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लोहारू का किला ठाकुर अर्जुन सिंह ने 1570 ई. में बनाया था। राव शेखा ने मूलरूप में शेखावती को 33 ठिकानों में विभाजित किया था, जिनमें लोहारू किला 33वां था। यहा तक एक छोटा सा गांव था, जहां कच्चा और मिट्टी का किला था और 1800 ई. तक ऐसा ही रहा। निर्माण के वर्षों बाद लोहारू का किला वास्तुकला का एक दिलचस्प मिश्रण था।
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ये था संघर्ष का काल :
लोहारू किले पर 2 बड़े युद्ध हुए हैं। इसमें पहला युद्ध वर्ष 1671 में ठाकुर मदन सिंह और हिसार के मुगल गवर्नर के बीच में भूमि राजस्व पर लड़ा गया था। दूसरा युद्ध खेतड़ी के ठाकुर कीर्त सिंह और राजा भोपाल सिंह के बीच हुआ था, जिन्होंने दावा किया कि लोहारू खेतड़ी का हिस्सा है। राजा भोपाल सिंह लोहारू किले के बाहर लड़ाई में मारे गए थे और उनके सम्मान में एक चट्टी का निर्माण उस स्थान पर किया गया था, जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया था, जो कि किले से लगभग एक किमी दूर स्थित है।
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फिर परगना अलवर राज्य में पारित हुआ और बाद में फिरोजपुर झिरका के राज्य के तहत परगना बन गया, जिस पर 1803 में नवाब अहमद बख्श खान ने शासन किया था। इस वर्ष से पक्का निर्माण मिट्टी का किला और गांव शुरू हो गया। यह किला 1971 के बाद से लोहारू के नवाबों के हाथों में था, जब स्वर्गीय नवाब अमीनुद्दीन अहमद खान ने इसे हरियाणा सरकार को बेच दिया था। चूंकि ये इमारतें निर्जन थीं, इसलिए पूर्व-विंग का हिस्सा होने के कारण सभी उत्तर-विंग ढह गए थे। केवल किले के दक्षिण-पंख (फारुख मंजिल वाले) जीवित हैं, और वह भी बहुत ही जीर्ण अवस्था में चला गया।
वास्तुकला का दिलचस्प मिश्रण शामिल
निर्माण के वर्षों में लोहारू किला वास्तुकला का एक दिलचस्प मिश्रण शामिल करने के लिए आया था। किले के दक्षिण-विंग में दीवान-ए-खास और शीश महल या द रूम ऑफ मिरर्स हैं, जिसमें मुगल/राजपूत शैली का विवरण है। दक्षिण विंग के मध्य भाग में एक बड़े विक्टोरियन स्टाइल के दर्शक कक्ष और बैंक्वेट हॉल थे। दक्षिण-विंग के दाहिने हिस्से में रसोई के साथ जाना महल भी शामिल था। दक्षिण-विंग के बाईं ओर विशुद्ध रूप से मुगल वास्तुकला थी। पूर्व-विंग को दिल्ली हवेली शैली में निष्पादित किया गया था, जो उस समय बहुत फैशनेबल माना जाता था और शेखावाटी हवेल से अलग था।
लोहारू किला को संस्मारक के संरक्षित स्मारक के रूप में घोषित करने की फिलहाल कोई सूचना नहीं है। इस संबंध में संबंधित अधिकारी से सूचना प्राप्त की जाएगी।
- जगदीश चंद्र, एसडीएम लोहारू।

24 फोटो ऐतिहासिक लोहारू किला- फोटो : Bhiwani