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Bhiwani News: सर्दी में दुधारू पशुओं का रखें विशेष ध्यान, लंपी बीमारी का बढ़ता है खतरा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 06 Jan 2026 11:36 PM IST
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Pay special attention to dairy animals during winter, as the risk of lumpy disease increases.
तोशाम। पशुपालन एवं डेयरिंग विभाग के उपमंडल अधिकारी डॉ. सुनील शर्मा ने पशु पालकों को सर्दी के मौसम में दुधारू पशुओं सहित अन्य पशुओं की विशेष देखभाल करने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि सर्दियों में दुधारू गायों में लंपी बीमारी की आशंका बढ़ जाती है ऐसे में समय रहते बचाव के उपाय अपनाना जरूरी है।
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डॉ. सुनील शर्मा ने बताया कि सर्दी के मौसम में पशुओं को ठंड से बचाने के लिए उनके बाड़ों को हवा रोधी बनाया जाए। पुआल या सूखी बिछावन का प्रयोग करें और जूट के बोरे या कंबल पहनाएं। पशुओं को गुनगुना पानी पिलाएं और पौष्टिक आहार दें। नमी और ठंडी जमीन से बचाव के लिए उचित प्रबंध करें तथा पशु चिकित्सक की सलाह से समय पर टीकाकरण और डीवॉर्मिंग कराएं ताकि पशु स्वस्थ और ऊर्जावान बने रहें।
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उन्होंने बताया कि दुधारू पशुओं को नरम और हरा चारा तथा पर्याप्त पानी देना चाहिए। पशु बाड़ों में जहां से ठंडी हवा प्रवेश करती हो उसे बंद करें और जूट के बोरे या तिरपाल का प्रयोग करें। बाड़े का फर्श ऊंचा और सूखा रखें तथा उस पर पर्याप्त सूखी घास या बिछावन डालें ताकि पशु ठंडी जमीन के संपर्क में न आएं। धूप निकलने पर पशुओं को खुली धूप में रखें इससे उन्हें गर्मी मिलेगी और रक्त संचार भी बेहतर रहेगा।
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डॉ. शर्मा ने कहा कि खान-पान और पानी का विशेष ध्यान रखें तथा पशुओं को गुनगुना पानी ही पिलाएं जिससे पाचन ठीक रहता है। सरसों का तेल भी लाभकारी होता है। सर्दी-जुकाम की स्थिति में गर्म सरसों के तेल की दो-दो बूंद नाक में डालने से आराम मिल सकता है लेकिन यह कार्य चिकित्सक की सलाह से ही करें। उन्होंने बताया कि अजवाइन का धुआं देना भी सर्दी-जुकाम में एक कारगर देसी उपाय है। इन सावधानियों से पशु सर्दियों में स्वस्थ और सुरक्षित रह सकते हैं।

गायों में लंपी स्किन एक वायरल बीमारी : डॉ. शर्मा
उपमंडल पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुनील शर्मा ने बताया कि गायों में लंपी स्किन डिजीज एक वायरल बीमारी है जिसे लंपी चर्म रोग भी कहा जाता है। यह पॉक्स वायरस के कारण होती है जो गायों और भैंसों को संक्रमित करता है और पशु पालकों को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाता है। इसके बचाव के लिए टीकाकरण, साफ-सफाई और संक्रमित पशुओं को अलग रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि इसका कोई सीधा इलाज नहीं है इसलिए रोकथाम के लिए टीकाकरण ही सबसे प्रभावी उपाय है।


लंपी स्किन बीमारी के लक्षण
इस बीमारी में पशु के पूरे शरीर पर 0.5 सेमी से 5 सेमी तक की कठोर और चपटी गांठें बन जाती हैं जो बाद में घावों का रूप ले सकती हैं। इसके अलावा तेज बुखार, आंख और नाक से पानी आना, भूख न लगना, पैरों और थनों में सूजन, सांस लेने में परेशानी, दूध उत्पादन में कमी और गर्भपात तक की समस्या हो सकती है। डॉ. शर्मा ने बताया कि यह बीमारी मनुष्यों में नहीं फैलती लेकिन पशुओं के लिए बेहद हानिकारक है। बचाव के लिए पशुपालन विभाग द्वारा लगाए जाने वाले टीके अवश्य लगवाएं। पशुओं के बाड़ों और आसपास स्वच्छता बनाए रखें और संक्रमित पशुओं को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग करें। उन्होंने बताया कि कीट नियंत्रण भी बहुत जरूरी है क्योंकि मच्छर और मक्खियां वायरस फैलाने का काम करती हैं। पशुओं को पोषक आहार, मिनरल मिश्रण और पौष्टिक चारा दें ताकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रहे। घरेलू उपाय सहायक हो सकते हैं जैसे नीम, बबूल और पीपल की छाल का काढ़ा पिलाना या नीम की पत्तियों का धुआं करना लेकिन किसी भी उपचार से पहले पशु चिकित्सक की सलाह लेना जरूरी है।
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