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Bhiwani News: जिस कॉलेज से की बीटेक 41 साल बाद उसी में बने निदेशक, अब तैयार कर रहे भावी इंजीनियर

Tue, 18 Feb 2025 12:19 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी Updated Tue, 18 Feb 2025 12:19 AM IST
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Now preparing future engineers
डॉ. बीके बेहेरा।
संजय वर्मा
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भिवानी। जिस संस्थान की कक्षा में बैठकर कभी विद्यार्थी रहते हुए पढ़ाई कि आज उसी में निदेशक की कुर्सी पर बैठना किसी गौरवशाली क्षण का अनुभव करने से कम नहीं है। ओडिशा के कटक गांव में जमींदार के यहां जन्मे डॉ. बीके बेहेरा इसका ताजा उदाहरण है। जिन्होंने 41 बाद भिवानी के टीआईटीएस में निदेशक का पद संभाला है, जो 1983 के बैच में यहां से बीटेक पास आउट विद्यार्थी रहे थे।
वे दिल्ली के आईआईटी से यहां पर निदेशक का पदभार संभाल टेक्सटाइल में भावी इंजीनियर तैयार कर रहे हैं। डॉ. बीके बेहेरा ने वर्तमान में इंजीनियरिंग कॉलेजों की स्थिति पर भी चिंता जताते हुए कहा कि आज खंड स्तर पर इंजीनियरिंग कॉलेज तो खुल रहे हैं, जिससे दाखिला लेना आसान हो गया है, लेकिन इनके अंदर विद्यार्थियों को डिग्री तो थमा रहे हैं, लेकिन नॉलेज नहीं है। इससे फील्ड में उतरने के बाद उन्हें कई नई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। इसकी मुख्य वजह प्रोफेसर और ढांचागत सुविधाओं का अभाव है।
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विद्यालयी पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. बेहेरा ने 1979 में टेक्सटाइल इंजीनियरिंग की स्नातक डिग्री के लिए भिवानी की टेक्नोलॉजीकल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्सटाइल एंड साइंसेज (टीआईटीएस) में दाखिला लिया। उनके पिता की इच्छा थी कि बेटा टेक्सटाइल निर्माण में खुद का व्यवसाय शुरू करे। इसी उद्देश्य से 1983 में टेक्सटाइल इंजीनियरिंग में बीटेक की। इसके बाद आईआईटी दिल्ली में एमटेक और पीएचडी की।
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पिता की इच्छा का मान रखते हुए डॉ. बेहेरा ने इंडस्ट्रियल फाइनेंशियल कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया में तकनीकी प्रबंधक के रूप में कार्य किया और परियोजना मूल्यांकन एवं वित्त में विशेषज्ञता हासिल की। इसी दौरान डॉ. बेहरा ने अपने पिता को खो दिया। इसके बाद उनका रुझान व्यापार से शोध की ओर मुड़ गया। 1993 में वे आईआईटी दिल्ली के टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी विभाग में सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए और बाद में प्रोफेसर के तौर पर लगातार 32 सालों तक सेवाएं दीं।


25 शोध और 75 औद्योगिक परामर्श परियोजनाएं सहित कई उपलब्धियां की अपने नाम

आईआईटी दिल्ली में सेवारत रहते हुए डॉ. बीके बेहेरा ने 25 प्रायोजित शोध परियोजनाएं, 75 औद्योगिक परामर्श परियोजनाएं पूरी कीं। उनके 390 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हुए। 350 से अधिक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में व्याख्यान दिए। उन्होंने टेक्सटाइल संरचनात्मक यांत्रिकी, सॉफ्ट कंप्यूटिंग इन टेक्सटाइल्स और बुनाई तकनीक पर 15 पुस्तकों का लेखन किया। इसके अलावा 100 से अधिक पीएचडी एवं मास्टर शोध प्रबंधों का मार्गदर्शन किया। उनके नाम 14 पेटेंट दर्ज हैं।


विदेशों में विश्वविद्यालयों से भी डॉ. बेहेरा का रहा जुड़ाव
डॉ. बीके बेहेरा ने जापान के शिनशूमहा विश्वविद्यालय चेक गणराज्य के टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ लिबरेक, ब्राजील के साओ पाउलो विश्वविद्यालय और तुर्की के उसाक विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। वे टेक्सटाइल संस्थानों की गर्वनिंग काउंसिल के सदस्य हैं और पांच तकनीकी विश्वविद्यालयों के अध्यक्ष बोर्ड में शामिल हैं। वे तीन टेक्सटाइल कंपनियों के निदेशक मंडल में भी रह चुके हैं। कई भारतीय टेक्सटाइल उद्योगों के साथ परामर्शदाता के तौर पर भी जुड़े हैं।




देश में ही अच्छा खासा पैकेज भी मिल रहा
डॉ. बीके बेहेरा का कहना है कि अधिकांश इंजीनियर विदेशों में नौकरी करना पसंद करते हैं, लेकिन उनको समझना होगा कि अपने देश में भी बेहतर विकल्प हैं, यहां खुद का कारोबार खड़ा करने के साथ-साथ टेक्सटाइल और आईटी के इंजीनियर बेहतर ढंग से देश की प्रगति और उन्नति में सीधा योगदान दे सकते हैं। इसके लिए उन्हें देश में ही अच्छा खासा पैकेज भी मिल रहा है। टीआईटीएस के काफी इंजीनियर देश के प्रतिष्ठित उद्योगों और संस्थानों में कॅरिअर शुरू कर चुके हैं, जो अब उच्च पदों पर हैं।


घनश्यामदास बिड़ला ने 1943 में टीआईटीएस की नींव रखी थी। मैं यहां एक विद्यार्थी के तौर पर यहां से टेक्सटाइल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर अपने कॅरिअर की शुरुआत के लिए आगे बढ़ा। मैंने 41 सालों तक दूसरी जगहों पर सेवाएं देने के बाद यहां अक्तूबर 2024 में निदेशक के तौर पर जिम्मेदारी संभाली। मैं यहां की कक्षाओं के अंदर आज भी वो पल महसूस करता हूं, जो कभी मैंने यहां विद्यार्थी जीवन में बिताए थे। मुझे अब यहां खुद टेक्सटाइल इंजीनियर तैयार करने का सौभाग्य मिला है, ये मेरे लिए गर्व की बात है। इंजीनियर बनना आसान हैं, लेकिन नॉलेज लेना बहुत मुश्किल काम है। आज देश में टेक्सटाइल कॉलेजों की संख्या तो बढ़ी हैं, लेकिन काबिल इंजीनियर घट गए हैं। -डॉ. बीके बेहेरा, निदेशक, टीआईटीएस भिवानी।
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