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Bhiwani News: सरकंडे से बना मटेरियल करेगा इंडस्ट्रियल वाटर को साफ
Thu, 16 May 2024 01:50 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
Updated Thu, 16 May 2024 01:50 AM IST
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चौ. बंसीलाल विश्वविद्यालय में पेटेंट प्रमाण पत्र को कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी को सौंपते प्रो.
भिवानी। चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय शिक्षा एवं अनुसंधान के क्षेत्र में राष्ट्रीय एवं अंतर राष्ट्रीय स्तर पर नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। इसी कड़ी में विश्वविद्यालय ने एक नया पेटेंट अपने नाम पंजीकृत करवाकर इंटेलैक्चुअल प्रॉपर्टी की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। विश्वविद्यालय के केमिस्ट्री विभाग के प्रो. सुरेंद्र कौशिक व उनकी पीएचडी की छात्रा रही डॉ. अरुणा ने एवं उनकी रिसर्च टीम ने लैब में सरकंडे की लकड़ी से एक ऐसा मटेरियल तैयार किया था, जो उद्योगों में डाई के कारण खराब हुए पानी को साफ करने में पूर्णतया सक्षम साबित हुआ था।
अक्तूबर 2022 में इस रिसर्च के पेटेंट के लिए पेटेंट कार्यालय भारत सरकार को पंजीकृत करने के लिए आवेदन किया गया था। इसके बाद सभी परीक्षणों में खरा उतरने के बाद इस रिसर्च के लिए भारत सरकार द्वारा 6 मई 2024 को पेटेंट प्रमाण पत्र जारी किया गया, जो कि 20 अक्तूबर 2022 से बीस साल की अवधि के लिए अनुदत्त किया गया।
प्रो. सुरेंद्र कौशिक ने बताया कि इस पर उन्होंने 2019 से काम शुरू किया था। इसमें उनको अक्तूबर 2022 में सफलता मिली। डॉ. अरुणा विश्वविद्यालय के केमिस्ट्री विभाग की व उनकी पहली पीएचडी शोधार्थी हैं। डॉ. अरुणा इन दिनों डीआरडीओ में वैज्ञानिक के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं।
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प्रो. कौशिक ने बताया कि इस पेटेंट के वाणिज्यीकरण के लिए उनके द्वारा इसके विभिन्न पहलुओं पर विचार किया जा रहा है। बहुत जल्द ही यह उत्पाद बाजार में बिकने के लिए उपलब्ध हो सकता है। यूनिवर्सिटी की केमिस्ट्री लैब में इस खोज का एक प्रारूप बनाया गया है। इसके आधार पर विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार के खराब पानी को सरकंडे से बने पदार्थ की मदद से साफ करके दिखाया जाता है।
सरकंडा एक उष्णकटीबंधीय बारहमासी प्राकृतिक पौधा है, जो कि अपने आप उगता है और यह मुख्य रूप से मरुस्थलीय क्षेत्र में पाया जाता है। इसकी लंबाई छह फुट तक होती है। इसमें चिकनी बनावट वाली लंबी, संकरी पत्तियां व छोटे फूल हरे-सफेद रंग के होते हैं। इस बड़ी उपलब्धि पर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी, कुलसचिव डॉ. ऋतु सिंह, डायरेक्टर रिसर्च प्रो. संजीव कुमार,डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. डीके मदान ने प्रो. कौशिक और उनकी रिसर्च टीम को बधाई दी है।
यूनिवर्सिटी की केमिस्ट्री लैब में इस खोज का एक प्रारूप बनाया गया है। इसके आधार पर विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार के खराब पानी को सरकंडे से बने पदार्थ की मदद से साफ करके दिखाया जाता है। लैब में विद्यार्थियों को नई नई खोज करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
-प्रो. दीप्ति धर्माणी, कुलपति
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अक्तूबर 2022 में इस रिसर्च के पेटेंट के लिए पेटेंट कार्यालय भारत सरकार को पंजीकृत करने के लिए आवेदन किया गया था। इसके बाद सभी परीक्षणों में खरा उतरने के बाद इस रिसर्च के लिए भारत सरकार द्वारा 6 मई 2024 को पेटेंट प्रमाण पत्र जारी किया गया, जो कि 20 अक्तूबर 2022 से बीस साल की अवधि के लिए अनुदत्त किया गया।
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प्रो. सुरेंद्र कौशिक ने बताया कि इस पर उन्होंने 2019 से काम शुरू किया था। इसमें उनको अक्तूबर 2022 में सफलता मिली। डॉ. अरुणा विश्वविद्यालय के केमिस्ट्री विभाग की व उनकी पहली पीएचडी शोधार्थी हैं। डॉ. अरुणा इन दिनों डीआरडीओ में वैज्ञानिक के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं।
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प्रो. कौशिक ने बताया कि इस पेटेंट के वाणिज्यीकरण के लिए उनके द्वारा इसके विभिन्न पहलुओं पर विचार किया जा रहा है। बहुत जल्द ही यह उत्पाद बाजार में बिकने के लिए उपलब्ध हो सकता है। यूनिवर्सिटी की केमिस्ट्री लैब में इस खोज का एक प्रारूप बनाया गया है। इसके आधार पर विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार के खराब पानी को सरकंडे से बने पदार्थ की मदद से साफ करके दिखाया जाता है।
सरकंडा एक उष्णकटीबंधीय बारहमासी प्राकृतिक पौधा है, जो कि अपने आप उगता है और यह मुख्य रूप से मरुस्थलीय क्षेत्र में पाया जाता है। इसकी लंबाई छह फुट तक होती है। इसमें चिकनी बनावट वाली लंबी, संकरी पत्तियां व छोटे फूल हरे-सफेद रंग के होते हैं। इस बड़ी उपलब्धि पर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी, कुलसचिव डॉ. ऋतु सिंह, डायरेक्टर रिसर्च प्रो. संजीव कुमार,डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. डीके मदान ने प्रो. कौशिक और उनकी रिसर्च टीम को बधाई दी है।
यूनिवर्सिटी की केमिस्ट्री लैब में इस खोज का एक प्रारूप बनाया गया है। इसके आधार पर विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार के खराब पानी को सरकंडे से बने पदार्थ की मदद से साफ करके दिखाया जाता है। लैब में विद्यार्थियों को नई नई खोज करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
-प्रो. दीप्ति धर्माणी, कुलपति