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भिवानी जिले में 70 फीसदी भूमिगत पानी मनुष्य और फसलों की सेहत के लिए खराब

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 22 Mar 2022 01:00 AM IST
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70% underground water in Bhiwani district is bad for the health of humans and crops
नई अनाजमंडी स्थित लैब में मिट्टी की जांच करते हुए लैब टेक्नीशियन सुमित। संवाद - फोटो : Bhiwani
संजय वर्मा
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भिवानी। भिवानी के पानी का स्वाद पीने में नमकीन हो गया है। साथ ही सेहत के लिए भी हानिकारक हो गया है। सरकारी लैब की जांच में ये तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार जिले का 70 फीसदी भूमिगत जल पीने लायक तो दूर खेतीबाड़ी में इस्तेमाल लायक भी नहीं बचा है।
वहीं, 30 फीसदी भूमिगत पानी ही कृषि में इस्तेमाल लायक बचा है। जिले के लोहारू, बहल और सिवानी तो पहले ही डार्क जोन में जा चुके हैं, जिनमें भूमिगत जल स्तर 350 फुट की गहराई तक जा चुका है। इसका इस्तेमाल न तो पीने में हो सकता है न ही उसका कृषि में प्रयोग संभव है। पानी के बेस्वाद होने का सीधा असर फसल चक्र पर भी पड़ा है, जिससे खेती के गणित के समीकरण भी बिगड़ गए हैं। आज विश्व जल दिवस है। जल संचय के लिए समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति और भी भयावह हो सकती है।
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भिवानी जिला पहले से ही मरुस्थली यानी बंजर धरा के दायरे में आ रहा है। राजस्थान से सटे होने की वजह से यहां रेतीली जमीन है। अगर जल संसाधनों की बात करें तो पीने के पानी के लिए नहरी पानी पर ही निर्भर होकर रह गए हैं। यमुना का पानी नहरों के जरिये यहां तक पहुंचता है, मगर नहरी पानी भी केवल लोगों की प्यास बुझाने तक ही सीमित है। कृषि में इसका ज्यादा इस्तेमाल किसान नहीं कर पा रहे हैं। भूमिगत जलस्तर के आंकड़े इतने खराब हैं कि उससे भूमि की सेहत भी लगातार बिगड़ रही है। भूमिगत जल की विद्युत चालकता बहुत ज्यादा है, जिससे इस पानी को किसान भी इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। यही वजह है कि लैब पहुंचने के बाद इस पानी को अनफिट करार दिया जा रहा है।
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इन क्षेत्रों व गांवों के पानी का बिगड़ गया सबसे अधिक स्वाद
भिवानी, तोशाम, लोहारू, सिवानी और कैरू के अलावा बहल क्षेत्र में भूमिगत जल की विद्युत चालकता जांच में बहुत ज्यादा दर्शायी जा रही है। इनमें भिवानी में 2560 विद्युत चालकता बनी है, जबकि तोशाम में 670, कैरू में 3420, देवराला गांव में 1867, बवानीखेड़ा में 5123, धनाना गांव में 42800 विद्युत चालकता पानी में आ रही है, जो बेहतद खराब स्थिति में है। इसी तरह डाडम में 753, तिगड़ाना में 5240, गुजरानी में 2167, पैंतावास में 2390, आदमपुर में 568, लोहारू के सोंहासड़ा में 1310, बहल के कासनी खुर्द में 8250, ढिगावा जाटान में 3715, उमरावास में 13420 ईसी तक दर्शाया जा रहा है। बहल शहर के भूमिगत पानी में 1192 ईसी आ रही है।
सेम से प्रभावित कृषिमंत्री के गांव में हालत बेहद खराब
सेम की समस्या से जूझ रहे गांव भी भूमिगत पानी की गुणवत्ता खोते जा रहे हैं। इनमें कृषि मंत्री जेपी दलाल के पैतृक गांव घुसकानी की हालत बेहद खराब है। सेम से प्रभावित मिताथल, गुजरानी, घुसकानी, तिगड़ाना व धनाना सहित आसपास के गांवों में चवा तोड़ने यानी भूमिगत जलस्तर में सुधार लाने के लिए सरकार ने योजना चलाई है, जिसमें सरकारी खर्च पर किसानों के खेतों में सौर ऊर्जा संचालित बोरवेल लगाए जा रहे हैं, जिनसे भूमिगत पानी का दोहन कर उसे ड्रेन में डाला जा रहा है, ताकि ऊपर आ रहे जलस्तर को संतुलित किया जा सके और किसानों को खेती लायक पानी मिल सके। इन गांवों में भूमिगत जल भी पीने लायक नहीं बचा है।
यह है इस्तेमाल लायक पानी का पैमाना
सामान्य तौर पर नहरी पानी में 500 से 700 ईसी (विद्युत चालकता) को सही माना जाता है, जबकि भूमिगत पानी में 1500 से 2000 ईसी तक सही माना जा रहा है। रेतीली भूमि के भूमिगत जल में तीन से साढ़े तीन हजार ईसी तक काम चल सकता है। इससे अधिक ईसी दर्शाये जाने पर पानी का खेती में इस्तेमाल भी घातक हैं, क्योंकि अधिक पानी में विद्युत चालकता की वजह से फसल पकने से पहले ही झुलसकर नष्ट हो जाती है। (संवाद)

30 फीसदी पानी ही कृषि में इस्तेमाल योग्य
भिवानी जिले में 70 फीसदी भूमिगत जलस्तर खराब हो चुका है, जबकि 30 फीसदी भूमिगत जल ही कृषि में इस्तेमाल योग्य है। नहरी पानी पीने और खेती में इस्तेमाल के लिए बेहतर है। अधिकतर किसान भूमिगत जल पर ही निर्भर हैं। जिले के तीन ब्लॉक तो डेंजर जोन में शामिल हैं, जिनमें पानी की स्थिति बेहद खराब है। भूमिगत जल स्तर सुधार के लिए सरकार की कई योजनाएं हैं, जिनसे सकारात्मक परिणाम आने की उम्मीद है।
-राजू मेहरा, जूनियर सांइटिफिक असिस्टेंट, मिट्टी पानी जांच परीक्षण लैब भिवानी।
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