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एशिया की बेस्ट गोलकीपर नौकरी को खा रही धक्के
सिरसा/गजेंद्र कुमार सिंह
Updated Fri, 04 Oct 2013 11:30 PM IST
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पिछले सप्ताह मलयेशिया में धाक जमाकर एशिया कप हॉकी टूर्नामेंट में बेस्ट गोलकीपर का खिताब पाने वाली सविता पूनिया एक अदद नौकरी के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।
कई अंतर्राष्ट्रीय योग्यता होने के बावजूद अब तक सविता को एक छोटी सी नौकरी भी नहीं मिली है। एक ओर तो सरकार द्वारा खेलों को बढ़ावा देने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वहीं सविता जैसी खिलाड़ी अपना हक पाने के लिए भटक रही हैं। गांव जोधकां निवासी सविता ने वर्ष 2011-12 के भीम अवार्ड के लिए भी आवेदन किया हुआ है।
मलयेशिया में 21 से 27 सितंबर तक हुए आठवें सीनियर महिला एशिया कप हॉकी में भारतीय टीम ने कांस्य पदक हासिल किया। इसी प्रतियोगिता में 23 वर्षीय सविता पूनिया को बेहतरीन प्रदर्शन के आधार पर एशिया का सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर चुना गया है। सविता रविवार को अपने गांव जोधकां लौटी और परिजनों के साथ प्रतियोगिता की यादें ताजा कर रही हैं। उसके पिता महेंद्र सिंह फार्मासिस्ट ने बताया कि बेटी ने मेडल तो ढेरों इकट्ठा कर लिए हैं, लेकिन अभी तक नौकरी नहीं मिली है।
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यूं चला सविता का सफर
सविता के प्रशिक्षक आजाद सिंह मलिक उसकी उपलब्धि से बेहद खुश हैं। सविता की प्रतिभा को सबसे पहले पीटीआई कृष्ण कंबोज ने पहचाना और हॉकी खेलने के लिए प्रेरित किया। सविता ने सिरसा के महाराजा अग्रसेन स्कूल में प्रशिक्षक सुंदर सिंह खरब से हॉकी के गुर सीखे और उन्हाेंने ही उसे गोलकीपर के बनने के लिए प्रेरित किया। वर्ष 2008 में जूनियर एशिया कप में देश के लिए खेलते हुए कांस्य पदक हासिल किया और देखते ही देखते सीनियर टीम की खिलाड़ी बन गई। एशिया कप में सविता ने चीन, मलयेशिया, हांगकांग, जापान और कोरिया आदि टीमों के गोल दागने के कई प्रयास विफल किए, जिस वजह से टीम कांस्य पदक जीतने में कामयाब रही।
नौकरी के केवल आश्वासन ही मिले
राजकीय कालेज हिसार की बीए फाइनल की छात्रा सविता कहती है कि उसने बीते वर्ष ओलंपिक के लिए क्वालीफाई सीरीज में भी भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया था। उसका मानना है कि खिलाड़ियों को रोजगार देकर खेलों को बढ़ावा दिया जा सकता है। जब तक खिलाड़ी को रोजगार न मिले तब तक उसका पूरा ध्यान खेल में नहीं लग पाता, जिसका प्रभाव प्रदर्शन पर पड़ता है। सविता ने कहा कि अगर उसे नौकरी मिल जाए तो वह और अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। अभी तक वह परिजनों पर आश्रित है। एक साधारण परिवार के लिए खिलाड़ी का खर्च उठाना काफी मुश्किल होता है। उसने बताया कि नौकरी के लिए उपलब्धियों का हवाला देते हुए सरकार के पास कई बार आवेदन किया, पर कोई जबाव नहीं मिला।
सविता की उपलब्धियां
- दक्षिण अफ्रीका में जून 2006 में आयोजित चार देशों की स्पार कप प्रतियोगिता में कांस्य पदक
- कजाख रसिया में वर्ष 2009 में आयोजित प्रथम महिला चैलेंज्ड चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक
- अमेरिका में वर्ष 2009 में आयोजित अंडर-21 जूनियर वर्ल्ड कप में देश का प्रतिनिधित्व किया
- बैंकाक में वर्ष 2008 में आयोजित सातवें एशियाकप में रजत पदक जीता
- जर्मनी में वर्ष 2010 में आयोजित चार देशों की प्रतियोगिता में कांस्य पदक पर कब्जा जमाया
- अर्जेंटाइना में वर्ष 2011 में आयोजित चार देशों की प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता
- दिल्ली में फरवरी, 2013 में आयोजित वर्ल्ड लीग-राउंड-2 में स्वर्ण पदक जीता
- मलयेशिया में सितंबर, 2013 में आयोजित एशिया कप में कांस्य पदक हासिल किया
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कई अंतर्राष्ट्रीय योग्यता होने के बावजूद अब तक सविता को एक छोटी सी नौकरी भी नहीं मिली है। एक ओर तो सरकार द्वारा खेलों को बढ़ावा देने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वहीं सविता जैसी खिलाड़ी अपना हक पाने के लिए भटक रही हैं। गांव जोधकां निवासी सविता ने वर्ष 2011-12 के भीम अवार्ड के लिए भी आवेदन किया हुआ है।
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मलयेशिया में 21 से 27 सितंबर तक हुए आठवें सीनियर महिला एशिया कप हॉकी में भारतीय टीम ने कांस्य पदक हासिल किया। इसी प्रतियोगिता में 23 वर्षीय सविता पूनिया को बेहतरीन प्रदर्शन के आधार पर एशिया का सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर चुना गया है। सविता रविवार को अपने गांव जोधकां लौटी और परिजनों के साथ प्रतियोगिता की यादें ताजा कर रही हैं। उसके पिता महेंद्र सिंह फार्मासिस्ट ने बताया कि बेटी ने मेडल तो ढेरों इकट्ठा कर लिए हैं, लेकिन अभी तक नौकरी नहीं मिली है।
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यूं चला सविता का सफर
सविता के प्रशिक्षक आजाद सिंह मलिक उसकी उपलब्धि से बेहद खुश हैं। सविता की प्रतिभा को सबसे पहले पीटीआई कृष्ण कंबोज ने पहचाना और हॉकी खेलने के लिए प्रेरित किया। सविता ने सिरसा के महाराजा अग्रसेन स्कूल में प्रशिक्षक सुंदर सिंह खरब से हॉकी के गुर सीखे और उन्हाेंने ही उसे गोलकीपर के बनने के लिए प्रेरित किया। वर्ष 2008 में जूनियर एशिया कप में देश के लिए खेलते हुए कांस्य पदक हासिल किया और देखते ही देखते सीनियर टीम की खिलाड़ी बन गई। एशिया कप में सविता ने चीन, मलयेशिया, हांगकांग, जापान और कोरिया आदि टीमों के गोल दागने के कई प्रयास विफल किए, जिस वजह से टीम कांस्य पदक जीतने में कामयाब रही।
नौकरी के केवल आश्वासन ही मिले
राजकीय कालेज हिसार की बीए फाइनल की छात्रा सविता कहती है कि उसने बीते वर्ष ओलंपिक के लिए क्वालीफाई सीरीज में भी भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया था। उसका मानना है कि खिलाड़ियों को रोजगार देकर खेलों को बढ़ावा दिया जा सकता है। जब तक खिलाड़ी को रोजगार न मिले तब तक उसका पूरा ध्यान खेल में नहीं लग पाता, जिसका प्रभाव प्रदर्शन पर पड़ता है। सविता ने कहा कि अगर उसे नौकरी मिल जाए तो वह और अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। अभी तक वह परिजनों पर आश्रित है। एक साधारण परिवार के लिए खिलाड़ी का खर्च उठाना काफी मुश्किल होता है। उसने बताया कि नौकरी के लिए उपलब्धियों का हवाला देते हुए सरकार के पास कई बार आवेदन किया, पर कोई जबाव नहीं मिला।
सविता की उपलब्धियां
- दक्षिण अफ्रीका में जून 2006 में आयोजित चार देशों की स्पार कप प्रतियोगिता में कांस्य पदक
- कजाख रसिया में वर्ष 2009 में आयोजित प्रथम महिला चैलेंज्ड चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक
- अमेरिका में वर्ष 2009 में आयोजित अंडर-21 जूनियर वर्ल्ड कप में देश का प्रतिनिधित्व किया
- बैंकाक में वर्ष 2008 में आयोजित सातवें एशियाकप में रजत पदक जीता
- जर्मनी में वर्ष 2010 में आयोजित चार देशों की प्रतियोगिता में कांस्य पदक पर कब्जा जमाया
- अर्जेंटाइना में वर्ष 2011 में आयोजित चार देशों की प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता
- दिल्ली में फरवरी, 2013 में आयोजित वर्ल्ड लीग-राउंड-2 में स्वर्ण पदक जीता
- मलयेशिया में सितंबर, 2013 में आयोजित एशिया कप में कांस्य पदक हासिल किया