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जब चोर ने पकड़े महाराज के पांव, और छोड़ दी चोरी
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अंबाला सिटी। सिटी के सेक्टर सात स्थित श्री नीलकंठ महादेव मंदिर में चल रहे सवा करोड़ ओम नम: शिवाय मंत्र जाप में प्रतिदिन की तरह बुधवार को 100 परिवारों के सदस्यों ने भाग लिया। सुबह करीब छह बजे पंडित भगवती प्रसाद शास्त्री ने भगवान भोलेनाथ जी के दरबार में विधिवत तरीके से पूजा अर्चना करवाई। इस दौरान पंडित भगवती प्रसाद शास्त्री ने उपस्थित भक्तों को शिव भक्त और चोर की कहानी सुनाई। उन्होंने कहा कि एक संत महाराज भगवान शिव के बड़े भक्त थे। सभी से प्रेम करते थे और हर समय नम: शिवाय के जाप करने में लगे रहते थे।
संत महाराज ने अपने शिष्यों के साथ एक छोटी सी कुटिया में रहते थे। महाराज के पास सिर्फ एक कंबल था। वो कंबल उन्हें उनके श्रद्धालुओं ने भेंट किया था। जिसको वह प्रेम से इस्तेमाल करते थे। एक रात एक चोर संत महाराज की कुटिया में दबे पांव प्रवेश कर कंबल चुराकर ले गया। कुछ दिनों बाद एक दिन संत महाराज बाजार से गुजर रहे थे। उन्होंने वहां फटे पुराने कपड़ों में एक व्यक्ति को उनका कंबल एक दुकानदार को बेचते हुए दिखाई दिया तो संत वहां रुक गए। दुकानदार को उस गरीब के फटे पुराने कपडे़ देखकर उस पर शक हुआ। वह बोला कि भाई यह कंबल कहीं चोरी का तो नहीं।
प्रमाण के तौर पर अगर कोई सज्जन व्यक्ति आकर गवाही दे तभी मैं यह कंबल खरीदूंगा, वरना नहीं। संत महाराज पास में ही खड़े होकर मन ही मन में ओम नम: शिवाय का जाप कर रहे थे। सब कुछ सुनने के बाद वह संत दुकानदार से बोले कि मैं इसकी गवाही देता हूं और मैं स्वयं प्रमाण हूं। तुम यह कंबल खरीद लो और इसे इसके हक के पैसे दे दो। दुकानदार को यह आश्वासन देकर संत महाराज जी बाहर चले आए। बाहर आते ही उनके शिष्यों ने उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। इस पर संत महाराज ने कहा कि यह बेचारा बहुत ही निर्धन व गरीब व्यक्ति है। निर्धनता व जरूरत के कारण ही इसने ऐसा कार्य किया है। हमें गरीबों की सदैव मदद करनी चाहिए। संत जी के ऐसे वचन सुनकर वह चोर उनके पांव में गिर पड़ा और उसने संत जी से वादा किया कि अब वह कभी भी चोरी नहीं करेगा।
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इस कहानी से हमें यह सीखने को मिला कि जीवन में कोई निर्णय लेने से पहले दोनों तरफ की परिस्थितियों को सही से जान लेना व समझ लेना चाहिए। कार्यक्रम के समापन पर सभी भक्तों ने भगवान भोलेनाथ जी की आरती की व प्रसाद ग्रहण किया।
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संत महाराज ने अपने शिष्यों के साथ एक छोटी सी कुटिया में रहते थे। महाराज के पास सिर्फ एक कंबल था। वो कंबल उन्हें उनके श्रद्धालुओं ने भेंट किया था। जिसको वह प्रेम से इस्तेमाल करते थे। एक रात एक चोर संत महाराज की कुटिया में दबे पांव प्रवेश कर कंबल चुराकर ले गया। कुछ दिनों बाद एक दिन संत महाराज बाजार से गुजर रहे थे। उन्होंने वहां फटे पुराने कपड़ों में एक व्यक्ति को उनका कंबल एक दुकानदार को बेचते हुए दिखाई दिया तो संत वहां रुक गए। दुकानदार को उस गरीब के फटे पुराने कपडे़ देखकर उस पर शक हुआ। वह बोला कि भाई यह कंबल कहीं चोरी का तो नहीं।
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प्रमाण के तौर पर अगर कोई सज्जन व्यक्ति आकर गवाही दे तभी मैं यह कंबल खरीदूंगा, वरना नहीं। संत महाराज पास में ही खड़े होकर मन ही मन में ओम नम: शिवाय का जाप कर रहे थे। सब कुछ सुनने के बाद वह संत दुकानदार से बोले कि मैं इसकी गवाही देता हूं और मैं स्वयं प्रमाण हूं। तुम यह कंबल खरीद लो और इसे इसके हक के पैसे दे दो। दुकानदार को यह आश्वासन देकर संत महाराज जी बाहर चले आए। बाहर आते ही उनके शिष्यों ने उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। इस पर संत महाराज ने कहा कि यह बेचारा बहुत ही निर्धन व गरीब व्यक्ति है। निर्धनता व जरूरत के कारण ही इसने ऐसा कार्य किया है। हमें गरीबों की सदैव मदद करनी चाहिए। संत जी के ऐसे वचन सुनकर वह चोर उनके पांव में गिर पड़ा और उसने संत जी से वादा किया कि अब वह कभी भी चोरी नहीं करेगा।
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इस कहानी से हमें यह सीखने को मिला कि जीवन में कोई निर्णय लेने से पहले दोनों तरफ की परिस्थितियों को सही से जान लेना व समझ लेना चाहिए। कार्यक्रम के समापन पर सभी भक्तों ने भगवान भोलेनाथ जी की आरती की व प्रसाद ग्रहण किया।