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छोटा सा गांव रामगढ़ माजरा पेश करता है समाजसेवा की अनूठी मिसाल
ब्यूरो/अंबाला/अमर उजाला
Updated Mon, 26 Sep 2016 12:34 AM IST
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जानकारी देते ग्रामीण।
- फोटो : अमर उजाला
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अंबाला कैंट के गांव रामगढ़ माजरा जहां आज भाईचारे की एक खास मिसाल है। ये पूरा गांव एक ही व्यक्ति की संतान है। करीबन सवा दो सौ साल पुराना छोटा सा ये गांव अपना एक रोचक इतिहास रखता है। इसे लेकर आज भी ग्रामीण फख्र महसूस करते हैं। ज्वाइंट पंजाब के लालड़ू के गांव बुड्डनपुर से डारी गौत्र के नत्था राम कंबोज यहां अंबाला शिफ्ट हो गए थे और यहां सैन्य क्षेत्र के दूसरे छोर पर आकर बस गए। उसके बाद उन्हीं का कुनबा यहां रहने लगा और अंग्रेजों की एमईएस विंग में काम करने लगा, जबकि कुछ लोग खेतीबाड़ी में जुट गए।
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धीरे-धीरे कुनबा बढ़ने लगा तो अंग्रेजों ने इसे शरीफपुर रामगढ़ का नाम दिया। लेकिन बाद में ये रामगढ़ माजरा बन गया। आज इस गांव में सवा सौ के करीब मकान हैं और बाइस सौ के करीब आबादी है। सभी परिवार एक ही गोत्र और जाति के हैं और सभी बड़ों को तो चाचा, ताऊ, बुआ कहकर और हमउम्र को भाई और बहन कहकर बुलाते हैं।
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100 साल से चल रही सेवाभाव की परंपरा
गांव के सरदार मेवा सिंह, सरदार प्रीतम सिंह, चरणजीत सिंह, गुरपाल सिंह माजरा, तरसेम सिंह, भूपिंद्र सिंह, गुरविंद्र सिंह, मोहन सिंह, परमिंद्र सिंह, कमलजीत सिंह, हरविंद्र सिंह, तरसेम, अमरजीत सिंह, जगदीश सिंह बिल्लू, बलदेव सिंह, सरदारा सिंह, मेवा सिंह, रविंद्र सिंह, मंजीत कौर, कुलविंद्र कौर, कुलवंत कौर, सुखदेव कौर, अमरजीत कौर ने बताया कि उनकी गांव की एक अनोखी परंपरा है, जो सौ साल से ज्यादा समय से चल रही है। ये पूरा गांव हर साल अपनी सालाना कमाई का 20 फीसदी जनसेवा के काम में लगाता है।
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उन्होंने बताया कि गर्मियों और सर्दियों यानी साला में दो बार दो दिन पूरे गांव के कमाने वाले लोगों से सालाना कमाई का 10-10 फीसदी हिस्सा इकट्ठा किया जाता है। कुछ लोग नगदी देते हैं, तो कुछ अनाज, सब्जियों व अन्य खाद्य पदार्थों के रूप में। गांव से बाहर बस चुके लोग भी इस परंपरा को निभाते हुए बाकायदा निर्धारित किए गए दोनों दिन गांव में पहुंचकर अपनी कमाई का हिस्सा देते हैं।
गांव से बिहाकर जा चुकी बेटियों को बाकायदा सम्मान के साथ निमंत्रण भेजकर गांव में इस अवसर पर बुलाया जाता है। उसके बाद पूरा गांव एकत्र होकर अपनी सालाना कमाई का 10 व 10 कुल 20 फीसदी हिस्सा लेकर ऐतिहासिक पंजोखरा साहिब गुरुद्वारे पहुंचता है। वहां नगदी और खाद्य सामग्री यहां चलने वाले अटूट लंगर के लिए दान दे दिया जाता है। लोगों ने बताया कि यही परंपरा उनका गर्व है और उनकी गांव की बरकत हैं।
इन समस्याओं का चाहते हैं समाधान
ग्रामीणों ने बताया कि उनके गांव में कोई बस सेवा नहीं है। साथ ही बब्याल क्षेत्र में जाने वाला रास्ता भी बेहद कच्चा व जर्जर है। गांव के स्कूल में एक जर्जर भवन है, जो बच्चों के लिए खतरा है। पर्याप्त मात्रा में स्ट्रीट लाइटें नहीं है और सफाई भी नियमित नहीं हो रही है। न ही यहां सीवेज व्यवस्था है और न ही पानी स्टोरेज के लिए बड़ी टंकी। लोगों के अनुसार उक्त समस्याएं प्राथमिकता पर हल होनी चाहिए। ग्रामीणों ने गांव में खेल के मैदान व कम्युनिटी हाल की भी मांग की। गांव के जनप्रतिनिधि जरनैल सिंह माजरा कहते हैं कि वे गांव की समस्याओं को लेकर पूरी तरह संजीदा है और इसके निपटान के लिए प्रयासरत है।