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वीडियो गेम से मिलेगा बहादुर योद्धा का इतिहास
ब्यूरो /अमर उजाला, अंबाला
Updated Tue, 29 Mar 2016 01:06 AM IST
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सिख इतिहास के महान योद्धा बाबा बंदा सिंह बहादुर के संघर्ष को जहां बीस युवाओं की टीम ने वाीडियो गेम में उतारा है, वहीं इस गेम के जरिये युवा वर्ग अपने इतिहास के प्रति जागरूक होने के साथ-साथ अपनी संघर्षमयी संस्कृति के बारे में भी जानकारी ले सकेंगे। बाबा बंदा सिंह बहादुर कैसे एक संत से योद्धा बने और कैसे मुगल साम्राज्य की नींव हिलाई यह सब इस वीडियो गेम के जरिये युवाओं के सामने आएगा। इतना ही नहीं इस योद्धा के संघर्ष में युवा भी शामिल हो सकेंगे।
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इस तरह से चलेगी यह गेम
इस वीडियो गेम की खासियत यह है कि गेम पूरी तरह से बाबा बंदा बहादुर शहीद के संघर्ष की गाथा को ध्यान में रखकर बनाई गई है। इस गेम की शुरुआत नादेड़ साहिब से की गई है। वीडियो गेम में वह पांच सिखों के साथ जुल्म के खिलाफ अपना संघर्ष शुरू करते हैं। उसके उपरांत श्रद्धालुओं को गेम में कई पड़ाव पार करने होंगे, जिन्हें नांदेड से लेकर समाना, संधौरा से लेकर सरहिंद के बीच की लड़ाई पर तैयार किए गए है। ऐसे में हर पड़ाव पार करने पर श्रद्धालुओं को बाबा बंदा बहादुर की लड़ाई से जुड़ी हर जानकारी दी जाएगी। इस वीडियो के पड़ाव पार करने के लिए बाद ही वह फतेह कर सकते हैं।
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ऐसे तैयार हुई वीडियो गेम
सिख डायरी के संचालक सतवंत सिंह ने बताया कि वीडियो गेम को मुख्य उद्देश्य युवाओं को सिख इतिहास के बहादुर योद्धाओं को संघर्ष से जुड़ी हर जानकारी देना है। इस गेम को तैयार करने से पहले शहीद बंदा सिह बहादर जी के संघर्ष की कहानी पर खोज की गई थी। इसे करीबन छह माह के समय में तैयार किया गया है, जबकि इस गेम में तैयार करने में बबली सिंह (शमारू), इनइट कॉल टैक्नॉलजी, डायरेक्टर धनप्रीत सिंह बेवली, एसोसिएट साहिब गुप्ता, अमित, राकेश सिंह, श्रेया कोछर, रचना नेगी, नीरज सिंह, गौरव सिंह, नवीन, म्यूजिक दविंद्र पाल, बानी, श्वेय, प्रिंस आदि बीस युवाओं की सहायता से तैयार किया गया है।
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ये है बाबा बंदा सिंह बहादुर
बाबा बंदा सिंह बहादुर का जन्म 27 अक्तूबर 1670 में जम्मू के रजौरी में हुआ। बाबा सिंह बहादुर का नाम माधो सिंह था। एक घटना के बाद वे संन्यासी होकर नादेड़ में अपना जीवन व्यतीत करने लगे। ऐसे में उनकी मुलाकात गोदावरी नदी के पास गुरु गोबिंद सिंह से हुई और वह उसके सच का ज्ञान प्राप्त कर गुरु के सिख बन गए। इसके बाद वह माधो दास से बंदा सिंह बन गए। जब उन्हें गुरु गोबिंद सिंह
के परिवार की कुर्बानियों का पता लगा तो उन्होंने छोटे साहिबजादियों की कुर्बानी का बदला लेनी की ठान ली। बंदा सिंह बहादुर के आज्ञा मांगने पर गुरु गोबिंद ने पांच तीर दे दिए और पांच सिखों के साथ सरहिंद जाने की आज्ञा दी। इसके बाद विभिन्न लड़ाइयों में जुल्म का खात्मा का उन्होंने वजीरखान को मारकर सरहिंद फतह किया।
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इस तरह से चलेगी यह गेम
इस वीडियो गेम की खासियत यह है कि गेम पूरी तरह से बाबा बंदा बहादुर शहीद के संघर्ष की गाथा को ध्यान में रखकर बनाई गई है। इस गेम की शुरुआत नादेड़ साहिब से की गई है। वीडियो गेम में वह पांच सिखों के साथ जुल्म के खिलाफ अपना संघर्ष शुरू करते हैं। उसके उपरांत श्रद्धालुओं को गेम में कई पड़ाव पार करने होंगे, जिन्हें नांदेड से लेकर समाना, संधौरा से लेकर सरहिंद के बीच की लड़ाई पर तैयार किए गए है। ऐसे में हर पड़ाव पार करने पर श्रद्धालुओं को बाबा बंदा बहादुर की लड़ाई से जुड़ी हर जानकारी दी जाएगी। इस वीडियो के पड़ाव पार करने के लिए बाद ही वह फतेह कर सकते हैं।
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ऐसे तैयार हुई वीडियो गेम
सिख डायरी के संचालक सतवंत सिंह ने बताया कि वीडियो गेम को मुख्य उद्देश्य युवाओं को सिख इतिहास के बहादुर योद्धाओं को संघर्ष से जुड़ी हर जानकारी देना है। इस गेम को तैयार करने से पहले शहीद बंदा सिह बहादर जी के संघर्ष की कहानी पर खोज की गई थी। इसे करीबन छह माह के समय में तैयार किया गया है, जबकि इस गेम में तैयार करने में बबली सिंह (शमारू), इनइट कॉल टैक्नॉलजी, डायरेक्टर धनप्रीत सिंह बेवली, एसोसिएट साहिब गुप्ता, अमित, राकेश सिंह, श्रेया कोछर, रचना नेगी, नीरज सिंह, गौरव सिंह, नवीन, म्यूजिक दविंद्र पाल, बानी, श्वेय, प्रिंस आदि बीस युवाओं की सहायता से तैयार किया गया है।
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ये है बाबा बंदा सिंह बहादुर
बाबा बंदा सिंह बहादुर का जन्म 27 अक्तूबर 1670 में जम्मू के रजौरी में हुआ। बाबा सिंह बहादुर का नाम माधो सिंह था। एक घटना के बाद वे संन्यासी होकर नादेड़ में अपना जीवन व्यतीत करने लगे। ऐसे में उनकी मुलाकात गोदावरी नदी के पास गुरु गोबिंद सिंह से हुई और वह उसके सच का ज्ञान प्राप्त कर गुरु के सिख बन गए। इसके बाद वह माधो दास से बंदा सिंह बन गए। जब उन्हें गुरु गोबिंद सिंह
के परिवार की कुर्बानियों का पता लगा तो उन्होंने छोटे साहिबजादियों की कुर्बानी का बदला लेनी की ठान ली। बंदा सिंह बहादुर के आज्ञा मांगने पर गुरु गोबिंद ने पांच तीर दे दिए और पांच सिखों के साथ सरहिंद जाने की आज्ञा दी। इसके बाद विभिन्न लड़ाइयों में जुल्म का खात्मा का उन्होंने वजीरखान को मारकर सरहिंद फतह किया।