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Ambala News: किसानों की अचूक थी रणनीति, चार स्तरीय दल संभाल रहा था मोर्चा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 07 Dec 2024 01:57 AM IST
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The strategy of the farmers was infallible, a four-tier group was handling the front
वैभव शर्मा
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अंबाला। करीब 10 माह पहले 13 फरवरी को किसान शंभू बॉर्डर पर पहुंचे थे तो उस समय किसान नेताओं की रणनीति अधिक नहीं दिखाई दे रही है। सभी में एक जोश था और उद्देश्य एक कि बैरिकेडिंग तोड़ देनी हैं। जोकि पूरा नहीं हो सका और 10 महीने तक किसानों को मोर्चा लगाकर मौसम से लेकर हर परेशानी को झेलना पड़ा।
यहां तक कि सरकार से वार्ता भी रुक गई। मगर इस बार किसान नेताओं की रणनीति धरातल पर दिखाई दी। सबसे पहले तो 101 जत्थेबंदियों में बुजुर्ग, दिव्यांग से लेकर युवाओं को भी शामिल किया। इसमें कुछ युवा ऐसे थे जो प्रशासन की तैयारियों को फेल कर सकते थे। इन जत्थेबंदियों को आगे बढ़ने में मदद करने के लिए चार स्तरीय दल की तैनाती की गई थी।
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दलों ने इस प्रकार निभाई जिम्मेदारी

पहले युवाओं ने बैरिकेड हटाया, फिर कुछ अन्य ने उसे रास्ते से हटाया। इसके बाद सभी ने मिलकर कंटीले तार हटाए। पीछे का एक दल ताराें को पीछे तक ले गया ताकि रास्ता साफ हो सके। इसी प्रकार किसान जब पक्के बैरिकेडिंग तक पहुंच गए और आगे नहीं बढ़ पा रहे थे तो पीछे से एक दल के सदस्यों ने बैरिकेडिंग बांधने को लगी कड़ियों को निकालकर कुछ युवा किसानों को दिया। बचाव कार्य में एक अलग दल जुटा हुआ था तो एक दल सूचनाओं को लाने ले जाने का काम कर रहा था। इस प्रकार से पूरा आंदोलन एक विशेष रणनीति पर आगे बढ़ता दिखा।
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युवा आक्रोशित हुए तो ट्रैक्टर लाने पर मंत्रणा

जब युवा किसान आक्रोशित हुए तो उन्होंने पुलिस की बैरिकेडिंग की जालियां हटाने को ट्रैक्टर लाने की बात कही। हालांकि किसान नेताओं ने मौके पर ही मना कर दिया कि उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से ही आगे बढ़ना होगा। जोर आजमाइश कर के ही जालियों को हटाने का निर्णय लिया गया।
इसके साथ ही पिछली बार सभी आक्रोशित किसान एक साथ पुलिस से टकराने पहुंच गए थे इस बार कई मीटर पहले ही तारबंदी कर किसानों को रोक लिया गया था। जहां पर किसान मजदूर मोर्चा के सदस्य पहरा दे रहे थे। सिर्फ मीडिया और चयनित किसानों को ही आगे जाने की अनुमति थी।

जब आंसू गैस के गोले चले तो आक्रोशित किसान नारे लगाकर आगे बढ़ने लगे ताे किसान नेताओं ने रोक लिया। ऐसे में भीड़ से आंदोलन को बचाने की रणनीति भी यहां दिखाई दी। इसके साथ ही जब किसान घायल होने लगे और कामयाबी नहीं मिली तो वापस जाने के फैसले को भी रणनीति के तहत किसान नेताओं ने लिया।
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