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Ambala News: कब्रिस्तान के मालिकाना हक का केस वापस लिया
Tue, 30 Sep 2025 01:12 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला
संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला
Updated Tue, 30 Sep 2025 01:12 AM IST
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माई सिटी रिपोर्टर
अंबाला सिटी। छावनी में स्थित संरक्षित ब्रिटिशकालीन ईसाई कब्रिस्तान के मालिकाना हक के लिए सोमवार को सिविल जज जूनियर डिविजन डॉ. सुषमा शर्मा की कोर्ट में सुनवाई हुई। इस मामले में अचानक से शिकायतकर्ता ने केस वापस ले लिया।
मामले में पक्षकार दि अंबाला सीमेट्री समिति के महासचिव व कोषाध्यक्ष पातरस मुंडू ने बताया कि इस मामले में पूर्व की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने शिकायतकर्ता को मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज पेश करने को कहा था। वह पिछली कुछ सुनवाई से आ नहीं रहे थे, ऐसे में सोमवार को जब सुनवाई हुई तो शिकायतकर्ता की तरफ से उनके अधिवक्ता पेश हुए, इसके बाद कोर्ट ने 2:30 बजे का समय देते हुए शिकायतकर्ता को पेश करने के लिए कहा, इसके बाद शिकायतकर्ता भी पहुंच गए। कोर्ट में सुनवाई होती इससे पहले ही शिकायतकर्ता शौकत भट्टी ने केस वापस ले लिया।
पातरस मुंडू ने बताया कि मौजूदा समय में इस कब्रिस्तान की मालिक भारत सरकार है और ब्रिटिश उच्चायोग पर इसकी देखरेख का जिम्मा रहेगा।
कब्रिस्तान को लेकर यह था विवाद : अमृतसर डायसन ट्रस्ट की ओर से एक वर्ष पहले बिशप शौकत भट्टी ने केस दर्ज कराया था। इसमें जमीन के मालिकाना हक के लिए आपत्ति जताई थी। यह मामला आठ अप्रैल वर्ष 2024 में शुरू हुआ था, जिसमें ब्रिटिश उप उच्चायोग चंडीगढ़, एसीएस हरियाणा, डीसी अंबाला, एसडीएम अंबाला और विभिन्न चर्चों के पदाधिकारियों को पार्टी बनाया गया था। देश छोड़ने के बाद ब्रिटिश सरकार ने कब्रिस्तान की देखरेख की जिम्मेदारी दि अंबाला सीमेट्री कमेटी को दी थी। जिसमें छह कैथोलिक चर्चों के पास्टर शामिल हैं। 20 एकड़ में फैले इस कब्रिस्तान को संरक्षित स्मारकों में जगह दी गई है। इससे पहले इस मामले में हाईकोर्ट ने फैसला भी दिया था।
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प्रथम विश्व युद्ध के अंग्रेजों की यहां हैं कब्रें : कब्रिस्तान का अधिभोग अधिकार और प्रबंधन ब्रिटिश उच्चायोग के पास है। यहां प्रथम विश्व युद्ध में मरने वाले लोगों की 66 कब्रें हैं। युद्ध सैनिकों की कब्रें राष्ट्रमंडल युद्ध कब्र आयोग के संरक्षण में आती हैं। खास बात है कि इसे एक सैन्य कब्रिस्तान के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि ब्रिटिश काल में भारतीय सेना में सेवा करने वाले सैनिकों की याद में कई कब्रें और स्मारक बनाए गए हैं। यहां मिली कब्रें यूरोपीय वास्तुकला में हैं। यहां 10 हजार के करीब कब्रें हैं।
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अंबाला सिटी। छावनी में स्थित संरक्षित ब्रिटिशकालीन ईसाई कब्रिस्तान के मालिकाना हक के लिए सोमवार को सिविल जज जूनियर डिविजन डॉ. सुषमा शर्मा की कोर्ट में सुनवाई हुई। इस मामले में अचानक से शिकायतकर्ता ने केस वापस ले लिया।
मामले में पक्षकार दि अंबाला सीमेट्री समिति के महासचिव व कोषाध्यक्ष पातरस मुंडू ने बताया कि इस मामले में पूर्व की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने शिकायतकर्ता को मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज पेश करने को कहा था। वह पिछली कुछ सुनवाई से आ नहीं रहे थे, ऐसे में सोमवार को जब सुनवाई हुई तो शिकायतकर्ता की तरफ से उनके अधिवक्ता पेश हुए, इसके बाद कोर्ट ने 2:30 बजे का समय देते हुए शिकायतकर्ता को पेश करने के लिए कहा, इसके बाद शिकायतकर्ता भी पहुंच गए। कोर्ट में सुनवाई होती इससे पहले ही शिकायतकर्ता शौकत भट्टी ने केस वापस ले लिया।
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पातरस मुंडू ने बताया कि मौजूदा समय में इस कब्रिस्तान की मालिक भारत सरकार है और ब्रिटिश उच्चायोग पर इसकी देखरेख का जिम्मा रहेगा।
कब्रिस्तान को लेकर यह था विवाद : अमृतसर डायसन ट्रस्ट की ओर से एक वर्ष पहले बिशप शौकत भट्टी ने केस दर्ज कराया था। इसमें जमीन के मालिकाना हक के लिए आपत्ति जताई थी। यह मामला आठ अप्रैल वर्ष 2024 में शुरू हुआ था, जिसमें ब्रिटिश उप उच्चायोग चंडीगढ़, एसीएस हरियाणा, डीसी अंबाला, एसडीएम अंबाला और विभिन्न चर्चों के पदाधिकारियों को पार्टी बनाया गया था। देश छोड़ने के बाद ब्रिटिश सरकार ने कब्रिस्तान की देखरेख की जिम्मेदारी दि अंबाला सीमेट्री कमेटी को दी थी। जिसमें छह कैथोलिक चर्चों के पास्टर शामिल हैं। 20 एकड़ में फैले इस कब्रिस्तान को संरक्षित स्मारकों में जगह दी गई है। इससे पहले इस मामले में हाईकोर्ट ने फैसला भी दिया था।
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प्रथम विश्व युद्ध के अंग्रेजों की यहां हैं कब्रें : कब्रिस्तान का अधिभोग अधिकार और प्रबंधन ब्रिटिश उच्चायोग के पास है। यहां प्रथम विश्व युद्ध में मरने वाले लोगों की 66 कब्रें हैं। युद्ध सैनिकों की कब्रें राष्ट्रमंडल युद्ध कब्र आयोग के संरक्षण में आती हैं। खास बात है कि इसे एक सैन्य कब्रिस्तान के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि ब्रिटिश काल में भारतीय सेना में सेवा करने वाले सैनिकों की याद में कई कब्रें और स्मारक बनाए गए हैं। यहां मिली कब्रें यूरोपीय वास्तुकला में हैं। यहां 10 हजार के करीब कब्रें हैं।