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Ambala News: छावनी में चाय के अड्डों पर राजनीति का चकल्लस...
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अंबाला। छावनी जितना पुराना शहर है उससे कहीं ज्यादा अपने अंदर अलग-अलग रंग समाए है। यहां का जायका, यहां के लोग सभी निराले हैं। ऐसा ही एक रंग है अंबाला छावनी की सबसे सुंदर निकलसन रोड का। जहां पर सुबह आप गुजरते हैं तो जगह-जगह शहर के सभ्रांत लोग सैर के बाद छोटे-छोटे समूहों पर कई स्थानों पर चाय के अड्डों पर गप्पे लड़ाते नजर आते हैं।
आपसी सौहार्द बनाते हुए यहां क्षेत्र के विकास की बातें होती हैं तो एक-दूसरे का सुख-दुख भी यहां लोग बांटते दिखते हैं। मगर इन दिनों इन चाय के अड्डों पर राजनीति की चर्चा है। कौन सा उम्मीदवार मजबूत है कौन से उम्मीदवार में कमी है ऐसी डिबेट भी यहां दिखाई देती हैं। अंत में सभी एक दूसरे से गले मिलते हुए अपने घर को निकल जाते हैं।
जाति-धर्म देखकर वोट नहीं देंगे
एक ऐसे ही अड्डे पर चाय की चुस्कियों के बीच लोग कहते हैं कि अंबाला लोकसभा के पढ़े-लिखे और सूझवान मतदाताओं की जुबान पर एक ही बात है कि अब जाति और धर्म देखकर नहीं बल्कि व्यवहार और विकास के नाम पर वोट दिया जाएगा। ऐसी चर्चा रोज सप्लाई चौक से लेकर सदर बाजार तक दोस्तों के साथ अलग-अलग झुंड में बैठे लोग रोजाना कर रहे हैं। वहीं लोग एक पुरानी फिल्म का गाना भी गुनगुना रहे हैं कि ये पब्लिक है सब जानती है जोकि चुनावी माहौल में बिल्कुल सटीक बैठ रहा है। सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि राजनीतिक दल जब सत्ता में थे तो उन्होंने अंबाला में कितना और कहां-कहां विकास करवाया। वहीं केंद्र सरकारी की योजनाओं का लाभ क्या प्रत्येक ऐसे व्यक्ति तक पहुंचा, जिसके लिए योजनाएं शुरु की गई थी।
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ऑनलाइन व्यवस्थाएं होने से बढ़ीं दिक्कतें
चाय पर चर्चा के दौरान अंबाला सिटी निवासी मनीष आनंद, गौरव गर्ग, नीतेश कुमर, मनीष बत्रा, नितेश और पूर्व फौजी ओमप्रकाश बताते हैं कि इस सरकार में काफी काम हुआ। खासकर छावनी की सड़कें और चौक-चौराहों का सुंदरीकरण। बिजली और पानी की व्यवस्थाओं में भी सुधार हुआ। हालांकि ऑनलाइन काम होने से आमजन को कुछ परेशानी भी झेलनी पड़ी है। प्रॉपर्टी आईडी का मुद्दा ही सबसे बड़ा है। जिस कंपनी ने ड्रोन से सर्वे करवाकर रिपोर्ट तैयार की थी, वो स्थानीय लोगों के गले की फांस बन गई। कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के बजाय उसे क्लीन चिट दे दी गई। वहीं परिवार पहचान पत्र में बढ़ी आय से लोगों की पेंशन और अन्य सुविधाएं बंद हो गई, पीले राशन कार्ड से नाम भी कट गए।
विपक्ष के पास प्रधानमंत्री का चेहरा नहीं
दूसरी तरफ नौकरी पेशा और अंबाला के प्रमुख व्यापारी तरुण दुआ, राजकुमार डांग, कैलाश अग्रवाल, श्रीकांत शर्मा, राकेश शर्मा, लक्ष्मण दास चोपड़ा, सुभाष जैन और संजय शर्मा ने बताते हैं कि अभी विपक्ष के पास नीति है और न चेहरा। वो किसे प्रधानमंत्री का उम्मीदवार समझते हैं। उसकी जानकारी आज तक साझा नहीं की गई। जबकि सत्ता पक्ष के पास अभी संगठन है और प्रधानमंत्री पद के लिए चेहरा। फिर श्री राम मंदिर के निर्माण ने लोगों पर अमिट छाप छोड़ी है। हालांकि कोरोना काल के दौरान लोगों के व्यापार ठप हो गए। काले धन को रोकने के लिए भारतीय करंसी में ही बदलाव कर दिया गया। वहीं जीएसटी में भी बदलाव से कहीं न कहीं आमजन पर असर जरूर पड़ा है। हालांकि ऑनलाइन प्रक्रिया जटिल तो है, लेकिन इससे भ्रष्टाचार पर कुछ लगाम लगी है। वहीं अतुल शर्मा ने बताया कि बदलाव प्रकृति का नियम है और इस बार देश में बदलाव की लहर चल रही है। अपने प्रत्याशी को जांच परखकर ही चुनना चाहिए।
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आपसी सौहार्द बनाते हुए यहां क्षेत्र के विकास की बातें होती हैं तो एक-दूसरे का सुख-दुख भी यहां लोग बांटते दिखते हैं। मगर इन दिनों इन चाय के अड्डों पर राजनीति की चर्चा है। कौन सा उम्मीदवार मजबूत है कौन से उम्मीदवार में कमी है ऐसी डिबेट भी यहां दिखाई देती हैं। अंत में सभी एक दूसरे से गले मिलते हुए अपने घर को निकल जाते हैं।
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जाति-धर्म देखकर वोट नहीं देंगे
एक ऐसे ही अड्डे पर चाय की चुस्कियों के बीच लोग कहते हैं कि अंबाला लोकसभा के पढ़े-लिखे और सूझवान मतदाताओं की जुबान पर एक ही बात है कि अब जाति और धर्म देखकर नहीं बल्कि व्यवहार और विकास के नाम पर वोट दिया जाएगा। ऐसी चर्चा रोज सप्लाई चौक से लेकर सदर बाजार तक दोस्तों के साथ अलग-अलग झुंड में बैठे लोग रोजाना कर रहे हैं। वहीं लोग एक पुरानी फिल्म का गाना भी गुनगुना रहे हैं कि ये पब्लिक है सब जानती है जोकि चुनावी माहौल में बिल्कुल सटीक बैठ रहा है। सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि राजनीतिक दल जब सत्ता में थे तो उन्होंने अंबाला में कितना और कहां-कहां विकास करवाया। वहीं केंद्र सरकारी की योजनाओं का लाभ क्या प्रत्येक ऐसे व्यक्ति तक पहुंचा, जिसके लिए योजनाएं शुरु की गई थी।
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ऑनलाइन व्यवस्थाएं होने से बढ़ीं दिक्कतें
चाय पर चर्चा के दौरान अंबाला सिटी निवासी मनीष आनंद, गौरव गर्ग, नीतेश कुमर, मनीष बत्रा, नितेश और पूर्व फौजी ओमप्रकाश बताते हैं कि इस सरकार में काफी काम हुआ। खासकर छावनी की सड़कें और चौक-चौराहों का सुंदरीकरण। बिजली और पानी की व्यवस्थाओं में भी सुधार हुआ। हालांकि ऑनलाइन काम होने से आमजन को कुछ परेशानी भी झेलनी पड़ी है। प्रॉपर्टी आईडी का मुद्दा ही सबसे बड़ा है। जिस कंपनी ने ड्रोन से सर्वे करवाकर रिपोर्ट तैयार की थी, वो स्थानीय लोगों के गले की फांस बन गई। कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के बजाय उसे क्लीन चिट दे दी गई। वहीं परिवार पहचान पत्र में बढ़ी आय से लोगों की पेंशन और अन्य सुविधाएं बंद हो गई, पीले राशन कार्ड से नाम भी कट गए।
विपक्ष के पास प्रधानमंत्री का चेहरा नहीं
दूसरी तरफ नौकरी पेशा और अंबाला के प्रमुख व्यापारी तरुण दुआ, राजकुमार डांग, कैलाश अग्रवाल, श्रीकांत शर्मा, राकेश शर्मा, लक्ष्मण दास चोपड़ा, सुभाष जैन और संजय शर्मा ने बताते हैं कि अभी विपक्ष के पास नीति है और न चेहरा। वो किसे प्रधानमंत्री का उम्मीदवार समझते हैं। उसकी जानकारी आज तक साझा नहीं की गई। जबकि सत्ता पक्ष के पास अभी संगठन है और प्रधानमंत्री पद के लिए चेहरा। फिर श्री राम मंदिर के निर्माण ने लोगों पर अमिट छाप छोड़ी है। हालांकि कोरोना काल के दौरान लोगों के व्यापार ठप हो गए। काले धन को रोकने के लिए भारतीय करंसी में ही बदलाव कर दिया गया। वहीं जीएसटी में भी बदलाव से कहीं न कहीं आमजन पर असर जरूर पड़ा है। हालांकि ऑनलाइन प्रक्रिया जटिल तो है, लेकिन इससे भ्रष्टाचार पर कुछ लगाम लगी है। वहीं अतुल शर्मा ने बताया कि बदलाव प्रकृति का नियम है और इस बार देश में बदलाव की लहर चल रही है। अपने प्रत्याशी को जांच परखकर ही चुनना चाहिए।