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ज्ञान दीपक तो मणि है भगवान की भक्ति : संत रामानंद
Tue, 20 Oct 2026 02:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला
संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला
Updated Tue, 20 Oct 2026 02:57 AM IST
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श्री सत शरणम योग अभ्यास आश्रम में सत्संग करते संत गुरु रामानंद महाराज। प्रवक्ता
अंबाला। श्री सत शरणम योग अभ्यास आश्रम में आयोजित सत्संग के दौरान संत गुरु रामानंद महाराज ने ज्ञान और भक्ति की महिमा पर प्रकाश डाला। उन्होंने रामचरितमानस के प्रसंगों का हवाला देते हुए कहा कि ज्ञान दीपक के समान है, जबकि भगवान की भक्ति मणि के समान है।
उन्होंने समझाया कि ज्ञान प्राप्त करना और उसके अनुरूप जीवन जीना एक कठिन साधना है, जबकि भगवान की भक्ति का मार्ग बेहद सहज, सुखदायी और कल्याणकारी है। दीपक को प्रकाश देने के लिए जैसे तेल और बत्ती की आवश्यकता होती है, वैसे ही भक्ति रूपी मणि स्वयं प्रकाशमान रहती है। जिस प्रकार प्रकाश के आगे अंधकार नहीं टिकता, उसी प्रकार हृदय में सच्ची भक्ति जागृत होने पर अज्ञान और मोह का प्रभाव समाप्त हो जाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य काम, क्रोध, लोभ और अहंकार के कारण अशांति भोगता है। भगवान के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण ही मन को निर्मल बनाते हैं। भक्ति का वास्तविक अर्थ केवल पूजा-पाठ करना नहीं, बल्कि अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए हर कर्म को भगवान को समर्पित करना है। जो व्यक्ति इस लोक और परलोक में सुख चाहता है, उसे भगवान की शिक्षाओं को अपनाना चाहिए। संवाद
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उन्होंने समझाया कि ज्ञान प्राप्त करना और उसके अनुरूप जीवन जीना एक कठिन साधना है, जबकि भगवान की भक्ति का मार्ग बेहद सहज, सुखदायी और कल्याणकारी है। दीपक को प्रकाश देने के लिए जैसे तेल और बत्ती की आवश्यकता होती है, वैसे ही भक्ति रूपी मणि स्वयं प्रकाशमान रहती है। जिस प्रकार प्रकाश के आगे अंधकार नहीं टिकता, उसी प्रकार हृदय में सच्ची भक्ति जागृत होने पर अज्ञान और मोह का प्रभाव समाप्त हो जाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य काम, क्रोध, लोभ और अहंकार के कारण अशांति भोगता है। भगवान के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण ही मन को निर्मल बनाते हैं। भक्ति का वास्तविक अर्थ केवल पूजा-पाठ करना नहीं, बल्कि अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए हर कर्म को भगवान को समर्पित करना है। जो व्यक्ति इस लोक और परलोक में सुख चाहता है, उसे भगवान की शिक्षाओं को अपनाना चाहिए। संवाद
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