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ममता की छांव ने बच्चों को दिखाई राह
अंबाला ब्यूरो/ अमर उजाला
Updated Sun, 08 May 2016 01:04 AM IST
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मां की महिमा का बखान
- फोटो : अमर उजाला
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इनका उद्देश्य, इनका लक्ष्य और जिंदगी की आखिरी तमन्ना यही है कि इनके बच्चे कामयाब होकर न केवल स्वावलंबी बनें, बल्कि अपनी कामयाबी का फायदा देश और समाज को भी पहुंचाएं। इसलिए ये माताएं सब कुछ भूलाकर अपने बच्चों को कामयाब बनाने में जुटी हुई हैं। इन माताओं का कहना है कि उनका संघर्ष तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक उनके बच्चे देश के सच्चे नागरिक बनकर अपनी कामयाबी से देश और समाज का नाम रोशन करें।
जन्म नहीं दिया फिर भी एक किन्नर हैं सात बेटियों की मां
मेरा संबंध एक ऐसे समाज से है, जिसे देखने का नजरिया ही कुछ अलग है। नैनीताल में जन्म लिया तो किसी ने भी सोचा नहीं था कि मेरे साथ कुछ ऐसा होगा। कुछ साल बीते और एक दिन ऐसा भी आया जब किन्नर समाज के साथ ही मुझे जीना था। परिवार से भी अलग हो गई, लेकिन एक मां की टीस सदा ही मेरे दिल में रही। खैर बचपन गुजरा, बड़ी हुई, तो देखा कि समाज में बेटियों को किस नजर से देखा जाता है और एक तरह से उसे बोझ ही समझा जाता है। मैंने भी ठान लिया कि मैं एक मां का फर्ज अवश्य निभाऊंगी और इसी को देखते हुए मैंने पांच बेटियों को पाला।
इनमें से कुछ लावारिस हालत में मिलीं, जिनको पूरी कानूनी प्रक्रिया के बाद अपनाया तो कुछ ने अपनी आर्थिक स्थिति डांवांडोल देखकर अपनी बेटी को मेरी गोद में डाल दी। पांच बेटियों की मां बनी तो अहसास हुआ कि बेशक मैंने इनको जन्म नहीं दिया, लेकिन इनकी जिम्मेदारी बड़ी है। पांचों बेटियों की शादी करवाई और आज वे अपने ससुराल में सुखी हैं। अभी भी दो बेटियां मेरे पास हैं और इनकी जिम्मेदारी भी मेरे ऊपर ही है। यह दोनों ही अभी शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। प्रशासन ने भी इनकी सेवाओं को देखते हुए सम्मानित किया है।
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- महंत पारो शर्मा, अंबाला कैंट
बेटी को फलक तक ले जाना ही जीवन का उद्देश्य
मैं एक स्कूल में अकाउंटेंट की पद पर कार्यरत हूं। जॉब नेचर ऐसी है कि अनावश्यक छुट्टियां नहीं मिल पातीं और काम को लंबित भी नहीं छोड़ा जा सकता। उसके बाद घर की पूरी जिम्मेदारी है। ऐसे माहौल में एक बात को सोच ली थी कि चाहे जितनी भी जिम्मेवारियां क्यों न हों, बेटी को फलक तक पहुंचाकर ही रहूंगी। शुरुआत मैंने कर दी है और मेरी बेटी ने मेरा साथ देना भी शुरू कर दिया है। मेरी बेटी आज नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर स्केटिंग, रोल स्केटिंग चैंपियन है और अब पिछले तीन साल से इनलाइन हॉकी की नेशनल टीम का भी सदस्य रहकर एक जूनियर वर्ल्ड कप भी खेल चुकी है।
छह साल की उम्र में जब वह केजी में थी, तब मेरी बेटी जया का पहला कांस्य पदक आया था, लेकिन आज तीस गोल्ड समेत उसके पास साठ मेडल व अन्य ट्राफी पुरस्कार है। कर्नाटक के बेलगांव में 50 घंटे लगातार स्केटिंग करने वाली टीम का हिस्सा रहते हुए मेरी बेटी जया के नाम वर्ल्ड रिकार्ड भी है, जबकि पिछले दिनों उसे हरियाणा सरकार ने भी सम्मानित किया है। लेकिन ये मुकाम यही नहीं थम गया है, खेल के साथ-साथ मेरी बेटी एक कामयाब डाक्टर भी बनना चाहती है। लिहाजा बारहवीं मेडिकल की पढ़ाई भी कर रही है। जब तक मेरी बेटी कामयाबी होकर समाज और देश के लिए कुछ नहीं करती, तब तक मैं चैन से नहीं बैठूंगी। इसमें मुझे अपने पति लोकेश दत्त मेहता व अन्य परिजनों का भी पूरा सहयोग मिलता है।
- ज्योति दत्त मेहता, अकाउंटेंट
दादी ने संभाला मां-बाप का बीड़ा
मेरे बेटे और बहू की आठ साल पहले मौत हो गई थी। एक बार फिर से मां का फर्ज निभाना था और मैंने खुद को इसके लिए तैयार कर लिया। एक बेटा (पोता) और एक बेटी (पोती) मेरी गोद में थे। कभी इनको देखती तो कभी अपने बेटे और बहू के बारे में सोचती। सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि अब दादी बनकर तो सभी अपने पोते-पोतियों का ध्यान रखते हैं, लेकिन अब एक मां बनकर अपने पोते और पोती का जीवन आगे बढ़ाना है। हालात उस वक्त और भी बिगड़े, जब यह पता चला कि पोते को भी एक ऐसी बीमारी है, जिसका इलाज आसान नहीं है।
अब इसका इलाज चंडीगढ़ पीजीआई से चल रहा है। उम्र के अंतिम पड़ाव पर आज किसी तरह से दोनों बच्चों के साथ जीवन की गाड़ी खींच रहीं हूं। एक कभी कोई मदद कर जाता है, तो कभी कोई। अभी तक पोते के इलाज के अलावा कुछ सहायता खास नहीं मिली है, लेकिन अभी भी हिम्मत नहीं हारी है और जिंदगी की यह जंग जारी है। देखती हूं कि मेरी जद्दोजहद इस जंग में जीतेगी या फिर बच्चों की किस्मत, लेकिन एक बार फिर से मां के फर्ज ने कदमों में तेजी तो लाई है। उम्मीद अभी बाकी है कि बच्चे अपने जीवन में कोई न कोई मुकाम अवश्य हासिल करेंगे।
- कांता देवी, बब्याल
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जन्म नहीं दिया फिर भी एक किन्नर हैं सात बेटियों की मां
मेरा संबंध एक ऐसे समाज से है, जिसे देखने का नजरिया ही कुछ अलग है। नैनीताल में जन्म लिया तो किसी ने भी सोचा नहीं था कि मेरे साथ कुछ ऐसा होगा। कुछ साल बीते और एक दिन ऐसा भी आया जब किन्नर समाज के साथ ही मुझे जीना था। परिवार से भी अलग हो गई, लेकिन एक मां की टीस सदा ही मेरे दिल में रही। खैर बचपन गुजरा, बड़ी हुई, तो देखा कि समाज में बेटियों को किस नजर से देखा जाता है और एक तरह से उसे बोझ ही समझा जाता है। मैंने भी ठान लिया कि मैं एक मां का फर्ज अवश्य निभाऊंगी और इसी को देखते हुए मैंने पांच बेटियों को पाला।
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इनमें से कुछ लावारिस हालत में मिलीं, जिनको पूरी कानूनी प्रक्रिया के बाद अपनाया तो कुछ ने अपनी आर्थिक स्थिति डांवांडोल देखकर अपनी बेटी को मेरी गोद में डाल दी। पांच बेटियों की मां बनी तो अहसास हुआ कि बेशक मैंने इनको जन्म नहीं दिया, लेकिन इनकी जिम्मेदारी बड़ी है। पांचों बेटियों की शादी करवाई और आज वे अपने ससुराल में सुखी हैं। अभी भी दो बेटियां मेरे पास हैं और इनकी जिम्मेदारी भी मेरे ऊपर ही है। यह दोनों ही अभी शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। प्रशासन ने भी इनकी सेवाओं को देखते हुए सम्मानित किया है।
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- महंत पारो शर्मा, अंबाला कैंट
बेटी को फलक तक ले जाना ही जीवन का उद्देश्य
मैं एक स्कूल में अकाउंटेंट की पद पर कार्यरत हूं। जॉब नेचर ऐसी है कि अनावश्यक छुट्टियां नहीं मिल पातीं और काम को लंबित भी नहीं छोड़ा जा सकता। उसके बाद घर की पूरी जिम्मेदारी है। ऐसे माहौल में एक बात को सोच ली थी कि चाहे जितनी भी जिम्मेवारियां क्यों न हों, बेटी को फलक तक पहुंचाकर ही रहूंगी। शुरुआत मैंने कर दी है और मेरी बेटी ने मेरा साथ देना भी शुरू कर दिया है। मेरी बेटी आज नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर स्केटिंग, रोल स्केटिंग चैंपियन है और अब पिछले तीन साल से इनलाइन हॉकी की नेशनल टीम का भी सदस्य रहकर एक जूनियर वर्ल्ड कप भी खेल चुकी है।
छह साल की उम्र में जब वह केजी में थी, तब मेरी बेटी जया का पहला कांस्य पदक आया था, लेकिन आज तीस गोल्ड समेत उसके पास साठ मेडल व अन्य ट्राफी पुरस्कार है। कर्नाटक के बेलगांव में 50 घंटे लगातार स्केटिंग करने वाली टीम का हिस्सा रहते हुए मेरी बेटी जया के नाम वर्ल्ड रिकार्ड भी है, जबकि पिछले दिनों उसे हरियाणा सरकार ने भी सम्मानित किया है। लेकिन ये मुकाम यही नहीं थम गया है, खेल के साथ-साथ मेरी बेटी एक कामयाब डाक्टर भी बनना चाहती है। लिहाजा बारहवीं मेडिकल की पढ़ाई भी कर रही है। जब तक मेरी बेटी कामयाबी होकर समाज और देश के लिए कुछ नहीं करती, तब तक मैं चैन से नहीं बैठूंगी। इसमें मुझे अपने पति लोकेश दत्त मेहता व अन्य परिजनों का भी पूरा सहयोग मिलता है।
- ज्योति दत्त मेहता, अकाउंटेंट
दादी ने संभाला मां-बाप का बीड़ा
मेरे बेटे और बहू की आठ साल पहले मौत हो गई थी। एक बार फिर से मां का फर्ज निभाना था और मैंने खुद को इसके लिए तैयार कर लिया। एक बेटा (पोता) और एक बेटी (पोती) मेरी गोद में थे। कभी इनको देखती तो कभी अपने बेटे और बहू के बारे में सोचती। सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि अब दादी बनकर तो सभी अपने पोते-पोतियों का ध्यान रखते हैं, लेकिन अब एक मां बनकर अपने पोते और पोती का जीवन आगे बढ़ाना है। हालात उस वक्त और भी बिगड़े, जब यह पता चला कि पोते को भी एक ऐसी बीमारी है, जिसका इलाज आसान नहीं है।
अब इसका इलाज चंडीगढ़ पीजीआई से चल रहा है। उम्र के अंतिम पड़ाव पर आज किसी तरह से दोनों बच्चों के साथ जीवन की गाड़ी खींच रहीं हूं। एक कभी कोई मदद कर जाता है, तो कभी कोई। अभी तक पोते के इलाज के अलावा कुछ सहायता खास नहीं मिली है, लेकिन अभी भी हिम्मत नहीं हारी है और जिंदगी की यह जंग जारी है। देखती हूं कि मेरी जद्दोजहद इस जंग में जीतेगी या फिर बच्चों की किस्मत, लेकिन एक बार फिर से मां के फर्ज ने कदमों में तेजी तो लाई है। उम्मीद अभी बाकी है कि बच्चे अपने जीवन में कोई न कोई मुकाम अवश्य हासिल करेंगे।
- कांता देवी, बब्याल