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प्रभु कृपा बिना श्रीमद्भागवत सुनना संभव नहीं : रघुनंदन
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अंबाला। छावनी के गोबिंद नगर स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर में 50वें स्वर्णिम वार्षिकोत्सव के अवसर श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन का आयोजन किया। इस मौके पर वैदिक बटुक रघुनंदन महाराज ने ईश्वर के ही स्वरूप वेद भगवान का उच्चारण किया।
उन्होंने बताया कि जब तक भगवान की कृपा न हो, तब तक श्रीमद्भागवत ज्ञान कथा यज्ञ को सुना नहीं जा सकता। भगवान की कृपा और स्मरण हमेशा बना रहे यही प्रार्थना है। हम सब का भाग्य उदय हुआ है, तभी हम भगवान नाम का स्मरण एवं कीर्तन कर रहे हैं। महाराज ने बताया कि भक्ति के लिए भगवान कई रूप धरकर आते हैं और धर्म का नाश करते हैं।
ठाकुर की मर्जी के बिना हम एक सांस भी अतिरिक्त नहीं ले सकते। जीव का स्वभाव है, वह भगवान को जल्दी भूल जाता है और जब हम चारों तरफ से घिर जाते हैं, तभी गोविंद याद आते हैं। महाराज ने सुग्रीव, द्रोपदी, रावण, कंस, हिरण्यकश्यप, गजराज-मगर प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को समझाया। उन्होंने बताया कि जो शरणागत हो जाते हैं, उनका भगवान उद्धार करते हैं। समुद्र मंथन पर चर्चा करते हुए महाराज ने व्यास पीठ से आग्रह किया कि किसी भौतिक वस्तु को मांगने की जगह केवल भगवान को ही मांग लो, जिससे आपका जीवन भवसागर से पार हो जाएगा।
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इससे पहले पारिवारिक संबंधों को लेकर शिक्षा दी कि मां-बाप बच्चों के सामने न लड़े और दादा-दादी का अपमान न करें। वामन अवतार, भगवान श्रीराम जन्म एवं श्री कृष्णा भगवान का जन्म कार्यक्रम की विशेषता रही। कथा में सभा के प्रधान दिनेश बहल, सचिव रमेश धीमान, नीता खेड़ा, ओम प्रकाश शर्मा, सतीश दुआ, जंग बहादुर उप्पल, सुरेंद्र सिंगला और लक्ष्मी मौजूद रहे।
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उन्होंने बताया कि जब तक भगवान की कृपा न हो, तब तक श्रीमद्भागवत ज्ञान कथा यज्ञ को सुना नहीं जा सकता। भगवान की कृपा और स्मरण हमेशा बना रहे यही प्रार्थना है। हम सब का भाग्य उदय हुआ है, तभी हम भगवान नाम का स्मरण एवं कीर्तन कर रहे हैं। महाराज ने बताया कि भक्ति के लिए भगवान कई रूप धरकर आते हैं और धर्म का नाश करते हैं।
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ठाकुर की मर्जी के बिना हम एक सांस भी अतिरिक्त नहीं ले सकते। जीव का स्वभाव है, वह भगवान को जल्दी भूल जाता है और जब हम चारों तरफ से घिर जाते हैं, तभी गोविंद याद आते हैं। महाराज ने सुग्रीव, द्रोपदी, रावण, कंस, हिरण्यकश्यप, गजराज-मगर प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को समझाया। उन्होंने बताया कि जो शरणागत हो जाते हैं, उनका भगवान उद्धार करते हैं। समुद्र मंथन पर चर्चा करते हुए महाराज ने व्यास पीठ से आग्रह किया कि किसी भौतिक वस्तु को मांगने की जगह केवल भगवान को ही मांग लो, जिससे आपका जीवन भवसागर से पार हो जाएगा।
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इससे पहले पारिवारिक संबंधों को लेकर शिक्षा दी कि मां-बाप बच्चों के सामने न लड़े और दादा-दादी का अपमान न करें। वामन अवतार, भगवान श्रीराम जन्म एवं श्री कृष्णा भगवान का जन्म कार्यक्रम की विशेषता रही। कथा में सभा के प्रधान दिनेश बहल, सचिव रमेश धीमान, नीता खेड़ा, ओम प्रकाश शर्मा, सतीश दुआ, जंग बहादुर उप्पल, सुरेंद्र सिंगला और लक्ष्मी मौजूद रहे।