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Ambala News: घंटों तक रील देखना खतरनाक, पड़ सकता है दिल का दौरा
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जिला मानसिक स्वास्थ्य के नोडल अधिकारी डॉ राजेंद्र राय। संवाद
सुखबीर सिंह
अंबाला सिटी। सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल करने से न केवल याददाश्त पर असर हो रहा, बल्कि हम जो लक्ष्य निर्धारित करते उसे भी हासिल नहीं कर पा रहें हैं। इससे विद्यार्थी अधिक प्रभावित हो रहे हैं।
कई घंटों तक सोशल मीडिया पर रील या वीडियो देखने के कारण दौरे का खतरा बढ़ जाता है। लगातार रील या वीडियो देखने के कारण दिमाग पर फोन की रोशनी का असर पड़ता है और न्यूरॉन्स की गतिविधियां अधिक तेज हो जाती हैं। इधर छोटे बच्चों में फोन की अधिक लत के कारण अकेलेपन की आदत बढ़ रही है।
इससे उनके मानसिक विकास पर भी बुरा असर होता है। जिला मानसिक स्वास्थ्य के नोडल अधिकारी डॉ राजेंद्र राय ने बताया कि शहर नागरिक अस्पताल में एक माह में दो से तीन मामले देखने को मिलते है।
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स्मरण शक्ति होती है कमजोर
डॉ. राजेंद्र राय ने बताया कि हमारे दिमाग में दो तरह की मेमोरी होती है जो याददाश्त बनाने के लिए मदद करती है। याददाश्त बनाने के लिए हमारा दिमाग किसी घटना को पहले रजिस्टर करता है, फिर स्टोर करता है और उसके बाद उसे जब हम याद करते है तो वह दिमाग की किसी कोने से बाहर आती है। सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण दिमाग में न्यूरॉन्स की गतिविधियां बढ़ जाती है, जिससे जो याददाश्त हमारे दिमाग ने स्टोर कि थी उसे ढूंढना मुश्किल हो जाता है।
पढ़ाई से भी भटकता है ध्यान
सोशल मीडिया के प्रभाव से अगर कोई विद्यार्थी पढ़ाई करने के लिए मोबाइल फोन या फिर लैपटॉप आदि का इस्तेमाल कर रहा है और किसी विषय पर लैक्चर सुन रहा है तो इसी दौरान आने वाले विज्ञापन से हमारा ध्यान निष्क्रिय हो जाता है। फिर विद्यार्थी अपने लक्ष्य को भूलकर उसी की ओर चला जाता है। इस तरह सोशल मीडिया पर आने वाले विज्ञापन से ऑनलाइन पढ़ाई करने वाले छात्र भी अपना लक्ष्य भटक जाते हैं।
छोटे बच्चों में बढ़ रहा अकेलापन
अगर छोटे बच्चों को शुरू से ही सोशल मीडिया पर वीडियो देखने की लत लग गई है, तो ऐसे में बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। इतना ही नहीं छोटा बच्चा अकेलेपन को भी पसंद करने लगता है। कुदरती माहौल की बजाय वर्चुअल माहौल बच्चों को पसंद आ जाता है। अगर बच्चे से फोन ले लिया जाए तो वह आक्रामक हो जाता है। इसलिए ऐसे बच्चों से प्यार से पेश आएं और मनोरोग चिकित्सक की सलाह पर ही उसकी दिनचर्या में बदलाव करें।
ये अपनाएं उपचार
- रात 11 बजे के बाद फोन का इस्तेमाल न करें
- लगातार फोन चलाने की आदत न डालें
- विद्यार्थी को 12 वीं कक्षा तक अपना निजी फोन न दें
- अगर किसी विद्यार्थी काे मोबाइल फोन की जरूरत पढ़ती है तो वह अपने माता पिता का फोन इस्तेमाल करे
- इसके अलावा भटकाने वाले विज्ञापनों से दूर रहने का प्रयास करें
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अंबाला सिटी। सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल करने से न केवल याददाश्त पर असर हो रहा, बल्कि हम जो लक्ष्य निर्धारित करते उसे भी हासिल नहीं कर पा रहें हैं। इससे विद्यार्थी अधिक प्रभावित हो रहे हैं।
कई घंटों तक सोशल मीडिया पर रील या वीडियो देखने के कारण दौरे का खतरा बढ़ जाता है। लगातार रील या वीडियो देखने के कारण दिमाग पर फोन की रोशनी का असर पड़ता है और न्यूरॉन्स की गतिविधियां अधिक तेज हो जाती हैं। इधर छोटे बच्चों में फोन की अधिक लत के कारण अकेलेपन की आदत बढ़ रही है।
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इससे उनके मानसिक विकास पर भी बुरा असर होता है। जिला मानसिक स्वास्थ्य के नोडल अधिकारी डॉ राजेंद्र राय ने बताया कि शहर नागरिक अस्पताल में एक माह में दो से तीन मामले देखने को मिलते है।
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स्मरण शक्ति होती है कमजोर
डॉ. राजेंद्र राय ने बताया कि हमारे दिमाग में दो तरह की मेमोरी होती है जो याददाश्त बनाने के लिए मदद करती है। याददाश्त बनाने के लिए हमारा दिमाग किसी घटना को पहले रजिस्टर करता है, फिर स्टोर करता है और उसके बाद उसे जब हम याद करते है तो वह दिमाग की किसी कोने से बाहर आती है। सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण दिमाग में न्यूरॉन्स की गतिविधियां बढ़ जाती है, जिससे जो याददाश्त हमारे दिमाग ने स्टोर कि थी उसे ढूंढना मुश्किल हो जाता है।
पढ़ाई से भी भटकता है ध्यान
सोशल मीडिया के प्रभाव से अगर कोई विद्यार्थी पढ़ाई करने के लिए मोबाइल फोन या फिर लैपटॉप आदि का इस्तेमाल कर रहा है और किसी विषय पर लैक्चर सुन रहा है तो इसी दौरान आने वाले विज्ञापन से हमारा ध्यान निष्क्रिय हो जाता है। फिर विद्यार्थी अपने लक्ष्य को भूलकर उसी की ओर चला जाता है। इस तरह सोशल मीडिया पर आने वाले विज्ञापन से ऑनलाइन पढ़ाई करने वाले छात्र भी अपना लक्ष्य भटक जाते हैं।
छोटे बच्चों में बढ़ रहा अकेलापन
अगर छोटे बच्चों को शुरू से ही सोशल मीडिया पर वीडियो देखने की लत लग गई है, तो ऐसे में बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। इतना ही नहीं छोटा बच्चा अकेलेपन को भी पसंद करने लगता है। कुदरती माहौल की बजाय वर्चुअल माहौल बच्चों को पसंद आ जाता है। अगर बच्चे से फोन ले लिया जाए तो वह आक्रामक हो जाता है। इसलिए ऐसे बच्चों से प्यार से पेश आएं और मनोरोग चिकित्सक की सलाह पर ही उसकी दिनचर्या में बदलाव करें।
ये अपनाएं उपचार
- रात 11 बजे के बाद फोन का इस्तेमाल न करें
- लगातार फोन चलाने की आदत न डालें
- विद्यार्थी को 12 वीं कक्षा तक अपना निजी फोन न दें
- अगर किसी विद्यार्थी काे मोबाइल फोन की जरूरत पढ़ती है तो वह अपने माता पिता का फोन इस्तेमाल करे
- इसके अलावा भटकाने वाले विज्ञापनों से दूर रहने का प्रयास करें