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Ambala News: जलवायु परिवर्तन से बिगड़ी धरती की सेहत, बदल रहा फसल चक्र

Mon, 22 Apr 2024 04:31 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला
संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला Updated Mon, 22 Apr 2024 04:31 AM IST
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Earth's health deteriorated due to climate change, crop cycle is changing
माई सिटी रिपोर्टर
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अंबाला। हरियाणा की धरती अपनी क्षमता काे खोती जा रही है। इसमें जलवायु परिवर्तन भी प्रमुख भूमिका है। देश की झोली में लाखों टन गेहूं और धान देने वाला राज्य हरियाणा भी अब धरती की सेहत से जुड़ी समस्याओं से अछूता नहीं है। अक्सर अप्रैल के प्रथम सप्ताह में हरियाणा की मंडियां गेहूं से भर जातीं हैं। इस बार अप्रैल के 15 दिन बीतने पर भी मंडियों में काफी कम ही गेहूं पहुंचा था।
वैज्ञानिक बताते हैं कि भले ही गेहूं की पैदावार अच्छी हो मगर फसल चक्र परिवर्तन के पीछे मौसम का हाथ है। इस बार सर्दी में 25 दिन से अधिक कोल्ड डे की स्थिति बनी। जिस कारण से फसल को पकने में समय लगा गया। इसी कारण कई स्थानों पर गेहूं की कटाई देरी से हुई। यह स्थिति गेहूं के लिए तो ठीक रही मगर आगने वाली दूसरी फसलों को प्रभावित करने वाली दिखाई देती है।
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भारतीय वन सेवा के अधिकारी व पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. सुनील ढाका बताते हैं कि हरियाणा और पंजाब ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों के लिए भू-क्षरण एक बड़ी समस्या बन गया है। भू-क्षरण और भूमि की गुणवत्ता में आ रही गिरावट चुनौती बनकर सामने खड़ी है। नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी (एनआरएसए) ने एक आंकड़ा जारी किया था, जिसमें बताया था कि हरियाणा में भूमि की गुणवत्ता में आती गिरावट से कृषि उत्पादकता में हर साल 1979 रुपये प्रति हैक्टेयर का नुकसान हो रहा है। वहीं पंजाब में 653 रुपये प्रति हैक्टेयर नुकसान है। यानि पंजाब की तुलना में अधिक तेजी से उत्पादन पर नुकसान उठाना पड़ रहा है।
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प्लास्टिक बनाम प्लेनेट इस बार का थीम

डॉ. सुनील ढाका बताते हैं कि पृथ्वी दिवस का थीम प्लास्टिक बनाम प्लेनेट है। धरती की सेहत पर जलवायु परिवर्तन से पड़ रहे असर का एक कारण प्लास्टिक कचरा भी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 3.4 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। इसमें से केवल 12.3 प्रतिशत प्लास्टिक वेस्ट ही रीसाइकल हो पाता है। भारत विश्व के शीर्ष 12 देशों में है जहां विश्व का 52 प्रतिशत प्लास्टिक कचरे का कुप्रबंधन होता है। वर्ष 2021 के आंकड़ों के अनुसार विश्व में कुल 390 मिलियन टन प्लास्टिक उत्पन्न किया गया। यह प्लास्टिक उत्पादन लगभग 3.4 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैस उत्पादन के लिए जिम्मेदार बना। भारत में भी इसकी संख्या अधिक है। यही कारण है कि ग्रीन हाउस गैसों से जलवायु परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं जोकि हमारे फसल चक्र को बार-बार प्रभावित कर रहे हैं। प्लॉस्टिक सिर्फ फसल चक्र को ही नहीं बल्कि इंसानों को भी बीमारियां दे रहा है।

इंसानों के लिए माइक्रो प्लास्टिक नुकसानदायक

डॉ. ढाका ने बताया कि प्लास्टिक कचरे में सबसे खतरनाक माइक्रो प्लास्टिक है। वर्तमान समय में माइक्रो प्लास्टिक आपको हर जगह मिल जाएंगे। बच्चों के खिलाैनों से लेकर दूध की बोतल आदि में भी माइक्रो प्लास्टिक मौजूद है। माइक्रो प्लास्टिक के कारण नई पीढ़ी पर भी खतरा है। सिर्फ यह नहीं बल्कि फूड चैन के जरिए इंसान भी इसकी जद में हैं। माइक्रो प्लास्टिक इंसान के दिमाग, लिवर, फैंफड़ों, पाचन तंत्र शरीर के अन्य अंगों को प्रभावित करता है। इस समस्या के लिए हरियाणा को तमिलनाडु की तर्ज पर प्लास्टिक पाबंदी को सख्ती से लागू करना चाहिए। लोगों को प्लास्टिक पर अपनी निर्भरता को कम करना होगा। विश्वविद्यालयों को प्लास्टिक कचरे के दुष्प्रभावों पर काम करने की जरूरत है। वहीं प्लास्टिक बना रहे उद्योगों की भी जिम्मेदारी है कि वह अपने आगामी प्लान को सरकार व लोगों के समक्ष रखें। सरकार को भी प्लास्टिक उत्पादन पर मिलने वाली छूट को बंद करने पर विचार करने की जरूरत है।
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