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दादा और पिता की शहादत के बाद 13 साल की उम्र में चुनी थी स्वतंत्रता आंदोलन की राह

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 30 Jan 2022 12:51 AM IST
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After the martyrdom of grandfather and father, at the age of 13, the path of freedom movement was chosen
राजेश शांडिल्य
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अंबाला। पिता और दादा की शहादत के बाद महज 13 साल की उम्र में पंडित भगतराम शुक्ला भी आजादी की लड़ाई में गांधी जी के साथ कूद पड़े थे। इस दौरान उन्होंने अंग्रेजों की तमाम यातनाएं सही। कई बार उन्हें नजरबंद किया गया और जेलों में डाला गया, लेकिन पीछे नहीं हटे। महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर उनसे जुड़ी यादें साझा करते हुए दादा भगतराम के पोते आनंद मोहन शुक्ला भावुक हो उठे। उन्होंने गांधी और पटेल के साथ आजादी से जुड़ी भगतराम शुक्ला की कई तस्वीरें साझा की।
अंबाला कैंट क्षेत्र में निकलसन रोड पर एक तीन मंजिला भवन है, जोकि महात्मा गांधी के सहयोगी स्वर्गीय पंडित भगतराम शुक्ला का है। यहां वर्तमान में उनके पोते-पड़पोते और भरापूरा परिवार रहता है। इन्हीं में से एक हैं आनंद मोहन शुक्ला। उन्होंने बताया कि उनके पिता पंडित भगतराम शुक्ला जी का जन्म जालंधर के लसाड़ा गांव में पंडित नत्थूराम शुक्ला के घर हुआ था।
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पंडित नत्थूराम जी के पिता लालजीराम शुक्ला 1857 की क्रांति के योद्धा थे और अंग्रेजों की यातनाओं के बाद शहीद हो गये थे। उनके बाद नत्थूरामजी शुक्ला आजादी की लड़ाई में कूद पड़े और अंग्रेजों के जुल्म का शिकार होने के कारण 1901 में शहीद हो गये थे। तब उनके दादा पंडित भगतराम शुक्ला की आयु महज 13 साल की थी। इसके बावजूद वे भी अपने पिता और दादा के नक्शे कदम पर चलते हुए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अनेक गतिविधियों में शामिल हुए। उन्हें भी कई बार अंग्रेजों ने यातनाएं दीं, जबकि कई बार उन्हें नजरबंद कर जेल भेजा गया। अपने थैले से कई पुरानी फोटो दिखाते हुए आनंद मोहन ने अपने दादा के साथ महात्मा गांधी, सरदार पटेल, सरोजनी नायडू और दूसरे राष्ट्रभक्तों की आजादी से जुड़ी यादें साझा की। इनमें शिमला में तत्कालीन वायसराय हाउस के बाहर भगतराम शुक्ला जी और गांधी जी की वो पुरानी फोटो भी शामिल है, जो आज राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद है। इसके अलावा एक खास फोटो वर्धा जनसभा की है। इस फोटो में महात्मा गांधी, सरदार पटेल के साथ पंडित भगतराम शुक्ला अंगुली उठाए कुछ कहते हुए दिखाई देते हैं। इस दौरान दादा को यादकर वह भावविभोर हो उठे।
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आजादी के आंदोलन में हरियाणा में ही हुई थी साबरमती के संत की पहली गिरफ्तारी
आजादी के आंदोलन के दौरान साबरमती के संत की पहली गिरफ्तारी हरियाणा की वीर भूमि पर ही हुई थी। हालांकि उस समय यह क्षेत्र संयुक्त पंजाब का हिस्सा था।
हरियाणा के इतिहासकार एवं अंबाला के राजकीय कालेज के प्रोफेसर डा. अतुल यादव के मुताबिक गांधी जी के भारत आने के बाद उनकी पहली गिरफ्तारी भी हरियाणा के पलवल रेलवे स्टेशन पर ही हुई थी। उस समय महात्मा गांधी स्वामी श्रद्धानंद एवं अन्य नेताओं के निमंत्रण पर 6 अप्रैल 1919 को बंबई से दिल्ली तथा पंजाब के दौरे पर थे। इस दौरान पलवल के स्टेशन पर जहां रेलगाड़ी रुकी थी, वहीं ब्रिटिश सरकार ने उन्हें आगे जाने से रोक दिया था और 10 अप्रैल 2019 की इस गिरफ्तारी को उनकी पहली गिरफ्तारी माना जाता है। तब उन्हें हिरासत में लेने के बाद दूसरी रेलगाड़ी में बैठाकर बंबई भेजा गया था।
अंबाला डिवीजन कांफ्रेंस में ही गांधी जी ने पहली बार अंग्रेजी हुकूमत के लिये शैतान सरकार शब्द का प्रयोग किया
तत्कालीन पंजाब और वर्तमान के हरियाणा में 8 मार्च 1921 को महात्मा गांधी अंबाला आए थे और यहां भ्रमण के बाद उन्होंने कहा था कि मैं निकट भविष्य में यहां और दूसरे स्थानों पर आने की आशा रखता हूं, हालांकि इसके बाद गांधी जी के अंबाला आने का कोई प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन इससे पहले 22 अक्तूबर 1920 को गांधी जी कांग्रेस की प्रथम अंबाला डिवीजन कांफ्रेंस में भिवानी आए थे। तब उन्होंने यहां आकर मुख्यातिथि के रूप में हिंदी में भाषण दिया था। उस कांफ्रेंस की अध्यक्षता अंबाला निवासी कांग्रेस के 72 संस्थापक सदस्यों में से एक लाला मुरलीधर ने की थी। इस अंबाला डिवीजन कांफ्रेंस में ही गांधी जी ने पहली बार अंग्रेजी हुकूमत के लिये शैतान सरकार जैसा कड़ा शब्द प्रयोग किया था। उन्होंने कहा था कि इस तरह की सरकार के साथ सहयोग करना असंभव है।

बापू के हत्यारे को अंबाला जेल में ही हुई थी फांसी
महात्मा गांधी के हत्यारे नाथू राम गोडसे और नारायण आप्टे को अंबाला सेंट्रल जेल की अलग-अलग कोठरी में रखा गया था और फिर इसी जेल में 15 नवंबर 1949 को फांसी की सजा दी गई थी। फिलहाल लखबीर सिंह बराड़ अंबाला की उस ऐतिहासिक जेल के अधीक्षक हैं।
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