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- वर्ष 2010 में नगर निगम गठन से पहले ही नगर परिषद की एक्सडेंट लिमिट में शामिल हो चुके थे गांव
Updated Tue, 20 Feb 2018 12:44 AM IST
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निगम न नप ग्रामीण चाहते हैं पंचायती राज
अमर उजाला ब्यूरो
अंबाला कैंट। नगर निगम क्षेत्र में शामिल गांव क्या अब दोबारा नगर परिषद में शामिल होंगे या नहीं, इसको लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। सरकार ने गांवों को नप में शामिल करने के संकेत दे रही है मगर ग्रामीण पंचायती राज व्यवस्था को ही बेहतर मान रहे हैं। मगर, यहां पर साफ कर दें कि गांवों का भविष्य नगर निगम गठित होने से पहले ही तय हो गया था। पहले गठित नगर परिषद की एक्सडेंट लिमिट में वर्ष 2009 के दौरान गांवों को शामिल कर लिया गया था। यही गांव बाद में 2010 में गठित हुई निगम में शामिल हो गए थे।
1977 से 2010 तक अंबाला में नगर परिषद रही थी और वर्ष 2009 में नगर परिषद की लिमिट को बढ़ाया गया था। नगर परिषद कैंट की एक्सडेंट लिमिट में 19 गांवों को शामिल किया गया था,जबकि सिटी नप की लिमिट में आठ गांव शामिल थे। कैंट नगर परिषद में कलरहेड़ी, टुंडला, बोह, बब्याल, रामगढ़, चंदपुरा, सरसेहड़ी, रामपुर, खोजकीपुर, खुड्डाखुर्द, सलारहेड़ी, नग्गल, करधान, नन्हेड़ा, शाहपुर, मच्छौंडा, बेगमपुरा, मच्छौंडी व मीरपुर शामिल किए गए थे। इसी तरह सिटी में मंडौर, सुलतानपुर, कौलां, सौंडा, नसीरपुर, लहारसा आदि गांवों को शामिल किया गया था। इसके लिए बकायदा हरियाणा नगर पालिका अधिनियम के तहत अधिसूचना भी जारी की गई थी। सदर नगर परिषद का क्षेत्र पहले मात्र 6.33 स्क्वायर किलोमीटर था, जोकि गांवों के शामिल होने पर 49.60 स्क्वायर किमी. हो गया था।
ग्रामीण ये झेल रहे समस्याएं
- निगम या परिषद में आने से वॉटर, हाउस व सीवर टैक्स की मार झेल रहे हैं।
- ऑनलाइन टैक्स जमा करवाने का प्रावधान नहीं है। इस वजह से दफ्तर आकर टैक्स भरना पड़ रहा है।
-ग्रामीणों को काम के लिए शहर अधिकारियों के पास आना पड़ता है। अधिकारी नहीं मिले तो दोबारा आना पड़ता है।
-निर्माण कार्य के लिए नक्शा पास कराना पड़ता है।
- गांव में फिरनी, गलियों आदि निर्माण के लिए निगम ग्रांट पर निर्भर।
- इसके विपरीत सरपंच स्तर पर कई सरकारी कार्य हो जाते हैं।
यह बोले ग्रामीण अंचल में बसे निवासी
- जब से निगम बना तभी से इलाके में विकास कार्य प्रभावित हुए हैं। पहले जो कार्य सरपंच स्तर पर होते थे, उनके लिए अब निगम के चक्कर काटने पड़ते हैं। वापस पंचायतें गठित होने से लोगों को फायदा होगा।
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दीपक राणा, बब्याल।
- गांव निगम में होंगे या पंचायती व्य्वस्था होगी, इसको लेकर कोई जानकारी नहीं मिल रही। सभी असमंजस में हैं।
युद्धवीर सिंह, आनंद नगर।
- निगम भंग होने से गांवों में क्या व्यवस्था होगी यह साफ नहीं। गांवों में पंचायती व्यवस्था ही सही है। निगम में आने से नुकसान ही हुआ है।
- रविंद्र धीमान, करधान।
- निगम बनने से पहले गांवों में व्यवस्था बेहतर थी। अब तो छोटे से काम के लिए निगम जाना पड़ता है। साथ ही टैक्सों की मार। गांव निगम क्षेत्र से यदि अलग होंगे तो टैक्स नहीं देने पड़ेंगे।
सुखबीर सिंह, शाहपुर।
- निगम भंग होने के बाद क्या व्यवस्था होगी साफ नहीं है। निगम में अधिकारी तक कोई जानकारी नहीं दे रहे हैं और न ही पार्षद। गांवों को अब नगर परिषद से अलग करना चाहिए।
मनोज, बोह।
- निगम भंग कर परिषद बनती है तो इसका प्रारूप क्या होगा। निगम भंग करने से पहले जनता की राय जाननी चाहिए थी। गांवों पर उनका निर्णय छोड़ना चाहिए था कि वह कौन सी व्यवस्था में शामिल होना चाहते हैं।
मयंक अग्रवाल, बब्याल।
- सरकार द्वारा निगम भंग करने की अधिसूचना अभी जारी नहीं की गई है। अधिसूचना जारी होने पर ही कुछ स्पष्ट होगा कि नप का स्वरूप क्या होगा। 2009 में ही सरकार ने परिषद की एक्सडेंट लिमिट में ग्रामीण क्षेत्र का रकबा शामिल किया था। पर अभी कुछ स्पष्ट नहीं होने से लोग असमंजस में हैं।
ओंकार नाथी, पूर्व पार्षद।
अदालत में लड़ी जाएगी पूरी लड़ाई: मेयर
सरकार द्वारा नगर निगम को भंग करने के निर्णय के खिलाफ मंगलवार को हाईकोर्ट में याचिका दायर की जाएगी। मेयर रमेश मल ने कहा कि इसकी तैयारी कर ली गई है। सरकार ने बिना कोई नोटिफिकेशन निगम को भंग कर दिया है, जोकि सही नहीं है। निगम का गठन पूरी औपचारिकता के साथ किया गया था। अब उसे भंग करना तर्कसंगत नहीं है। इसके खिलाफ अदालत में पूरी लड़ाई लड़ी जाएगी।
कोट्स
नगर परिषद का प्रारूप क्या होगा यह अभी स्पष्ट नहीं है। सरकार द्वारा अभी इस मामले में अधिसूचना जारी की जानी है। गांव नगर परिषद में होंगे या नहीं यह अधिसूचना के बाद ही स्पष्ट होगा।
सत्येंद्र दूहन, कमिश्नर, नगर निगम, अंबाला।
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अमर उजाला ब्यूरो
अंबाला कैंट। नगर निगम क्षेत्र में शामिल गांव क्या अब दोबारा नगर परिषद में शामिल होंगे या नहीं, इसको लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। सरकार ने गांवों को नप में शामिल करने के संकेत दे रही है मगर ग्रामीण पंचायती राज व्यवस्था को ही बेहतर मान रहे हैं। मगर, यहां पर साफ कर दें कि गांवों का भविष्य नगर निगम गठित होने से पहले ही तय हो गया था। पहले गठित नगर परिषद की एक्सडेंट लिमिट में वर्ष 2009 के दौरान गांवों को शामिल कर लिया गया था। यही गांव बाद में 2010 में गठित हुई निगम में शामिल हो गए थे।
1977 से 2010 तक अंबाला में नगर परिषद रही थी और वर्ष 2009 में नगर परिषद की लिमिट को बढ़ाया गया था। नगर परिषद कैंट की एक्सडेंट लिमिट में 19 गांवों को शामिल किया गया था,जबकि सिटी नप की लिमिट में आठ गांव शामिल थे। कैंट नगर परिषद में कलरहेड़ी, टुंडला, बोह, बब्याल, रामगढ़, चंदपुरा, सरसेहड़ी, रामपुर, खोजकीपुर, खुड्डाखुर्द, सलारहेड़ी, नग्गल, करधान, नन्हेड़ा, शाहपुर, मच्छौंडा, बेगमपुरा, मच्छौंडी व मीरपुर शामिल किए गए थे। इसी तरह सिटी में मंडौर, सुलतानपुर, कौलां, सौंडा, नसीरपुर, लहारसा आदि गांवों को शामिल किया गया था। इसके लिए बकायदा हरियाणा नगर पालिका अधिनियम के तहत अधिसूचना भी जारी की गई थी। सदर नगर परिषद का क्षेत्र पहले मात्र 6.33 स्क्वायर किलोमीटर था, जोकि गांवों के शामिल होने पर 49.60 स्क्वायर किमी. हो गया था।
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ग्रामीण ये झेल रहे समस्याएं
- निगम या परिषद में आने से वॉटर, हाउस व सीवर टैक्स की मार झेल रहे हैं।
- ऑनलाइन टैक्स जमा करवाने का प्रावधान नहीं है। इस वजह से दफ्तर आकर टैक्स भरना पड़ रहा है।
-ग्रामीणों को काम के लिए शहर अधिकारियों के पास आना पड़ता है। अधिकारी नहीं मिले तो दोबारा आना पड़ता है।
-निर्माण कार्य के लिए नक्शा पास कराना पड़ता है।
- गांव में फिरनी, गलियों आदि निर्माण के लिए निगम ग्रांट पर निर्भर।
- इसके विपरीत सरपंच स्तर पर कई सरकारी कार्य हो जाते हैं।
यह बोले ग्रामीण अंचल में बसे निवासी
- जब से निगम बना तभी से इलाके में विकास कार्य प्रभावित हुए हैं। पहले जो कार्य सरपंच स्तर पर होते थे, उनके लिए अब निगम के चक्कर काटने पड़ते हैं। वापस पंचायतें गठित होने से लोगों को फायदा होगा।
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दीपक राणा, बब्याल।
- गांव निगम में होंगे या पंचायती व्य्वस्था होगी, इसको लेकर कोई जानकारी नहीं मिल रही। सभी असमंजस में हैं।
युद्धवीर सिंह, आनंद नगर।
- निगम भंग होने से गांवों में क्या व्यवस्था होगी यह साफ नहीं। गांवों में पंचायती व्यवस्था ही सही है। निगम में आने से नुकसान ही हुआ है।
- रविंद्र धीमान, करधान।
- निगम बनने से पहले गांवों में व्यवस्था बेहतर थी। अब तो छोटे से काम के लिए निगम जाना पड़ता है। साथ ही टैक्सों की मार। गांव निगम क्षेत्र से यदि अलग होंगे तो टैक्स नहीं देने पड़ेंगे।
सुखबीर सिंह, शाहपुर।
- निगम भंग होने के बाद क्या व्यवस्था होगी साफ नहीं है। निगम में अधिकारी तक कोई जानकारी नहीं दे रहे हैं और न ही पार्षद। गांवों को अब नगर परिषद से अलग करना चाहिए।
मनोज, बोह।
- निगम भंग कर परिषद बनती है तो इसका प्रारूप क्या होगा। निगम भंग करने से पहले जनता की राय जाननी चाहिए थी। गांवों पर उनका निर्णय छोड़ना चाहिए था कि वह कौन सी व्यवस्था में शामिल होना चाहते हैं।
मयंक अग्रवाल, बब्याल।
- सरकार द्वारा निगम भंग करने की अधिसूचना अभी जारी नहीं की गई है। अधिसूचना जारी होने पर ही कुछ स्पष्ट होगा कि नप का स्वरूप क्या होगा। 2009 में ही सरकार ने परिषद की एक्सडेंट लिमिट में ग्रामीण क्षेत्र का रकबा शामिल किया था। पर अभी कुछ स्पष्ट नहीं होने से लोग असमंजस में हैं।
ओंकार नाथी, पूर्व पार्षद।
अदालत में लड़ी जाएगी पूरी लड़ाई: मेयर
सरकार द्वारा नगर निगम को भंग करने के निर्णय के खिलाफ मंगलवार को हाईकोर्ट में याचिका दायर की जाएगी। मेयर रमेश मल ने कहा कि इसकी तैयारी कर ली गई है। सरकार ने बिना कोई नोटिफिकेशन निगम को भंग कर दिया है, जोकि सही नहीं है। निगम का गठन पूरी औपचारिकता के साथ किया गया था। अब उसे भंग करना तर्कसंगत नहीं है। इसके खिलाफ अदालत में पूरी लड़ाई लड़ी जाएगी।
कोट्स
नगर परिषद का प्रारूप क्या होगा यह अभी स्पष्ट नहीं है। सरकार द्वारा अभी इस मामले में अधिसूचना जारी की जानी है। गांव नगर परिषद में होंगे या नहीं यह अधिसूचना के बाद ही स्पष्ट होगा।
सत्येंद्र दूहन, कमिश्नर, नगर निगम, अंबाला।