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#हिंदीहैंहम: 'हिंदी हमारा सम्मान ही नहीं अभिमान भी, अब रोजी-रोटी से जोड़ने की जरूरत'
Wed, 18 Aug 2021 03:02 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Wed, 18 Aug 2021 03:02 PM IST
सार
गोरखपुर जिले के साहित्यकारों ने अमर उजाला फाउंडेशन के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की सराहना की है। उनका कहना है इस मुहिम से युवा जुड़ेंगे। हिंदी की जय-जय होगी।
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हिंदी में व्यापकता दूसरे भाषाओं से बहुत ज्यादा है। बाजार, व्यापार, विज्ञापन, फिल्म हर जगह इसके महत्व को देखा जा सकता है। अब जरूरत इसे रोजी-रोटी से जोड़ने की है। ऐसा हुआ तो हिंदी माथे की बिंदी के रूप में चमकेगी। हिंदी हमारा सम्मान ही नहीं, अभिमान भी है। गोरखपुर जिले के साहित्यकारों ने अमर उजाला फाउंडेशन के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की सराहना की है। उनका कहना है इस मुहिम से युवा जुड़ेंगे। हिंदी की जय-जय होगी।
कवि व साहित्यकार डॉ आद्या प्रसाद द्विवेदी ने बताया कि हिंदी की व्यापकता बहुत है। दुनिया के जितने भी ज्ञान-विज्ञान हैं, उनकी शाखा-प्रशाखाएं, चिंतन की जितनी प्रणालियां व पद्धतियां हैं वे सभी हिंदी में विद्यमान हैं। हिंदी के प्रयोगकर्ताओं में भी इजाफा हुआ है। युवा वर्ग को इस भाषा के प्रति आकर्षित करने के लिए रोजगार से जोड़ना होगा। वहीं इसके प्रचार-प्रसार में सरकारी प्रयास की जरूरत है।
भोजपुरी संगम संयोजक कुमार अभिनीत ने बताया कि हिंदी का हमारे जीवन से गहरा नाता है। हम चाह कर भी इसे अपने से अलग नहीं कर सकते हैं। फैशन एवं हमारे जीवन में अंग्रेजी की दखल ने हिंदी से दूर करने व हिंदी को दूषित करने की भरपूर कोशिश की है। इसका कुछ असर भी है, लेकिन हिंदी अपनी व्यापकता के चलते आज भी माथे की बिंदी बनी हुई है। बाजार, व्यापार, विज्ञापन, फिल्मों में हिंदी का ही बोलबाला है।
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गीतकार चंदेश्वर परवाना ने बताया कि हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसमें लिखना, पढ़ना और बोलना आसान है। यही कारण है कि हिंदी की पहचान और व्यापकता दूसरी भाषाओं से ज्यादा है। सरस, सरल और बोधगम्य होने के कारण ही तो हमारी दिनचर्या में समाहित है। हिंदी हमारा सम्मान ही नहीं अभिमान भी है। हिंदी को रोजगारपरक बनाया जाए तो युवा पीढ़ी इसकी ओर आकर्षित होगी।
साहित्यकार सूर्यदेव पाठक पराग ने बताया कि भाषा जब रोजी-रोटी से सीधे जुड़ेगी तभी वह आमजन में स्वीकार्य होगी। हिंदी अधिकाधिक लोगों की भाषा है। इसे नौकरियों में महत्व दिया जाना चाहिए। जब युवा वर्ग, हिंदी को रोजगार पाने में सहायक बना पाएगा तो स्वत: उसका झुकाव बढ़ेगा। ऐसे में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सभी को दृढ़ संकल्प लेना होगा। अगर ऐसा हम कर पाए तो हिंदी अवश्य माथे की बिंदी बनेगी।
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कवि व साहित्यकार डॉ आद्या प्रसाद द्विवेदी ने बताया कि हिंदी की व्यापकता बहुत है। दुनिया के जितने भी ज्ञान-विज्ञान हैं, उनकी शाखा-प्रशाखाएं, चिंतन की जितनी प्रणालियां व पद्धतियां हैं वे सभी हिंदी में विद्यमान हैं। हिंदी के प्रयोगकर्ताओं में भी इजाफा हुआ है। युवा वर्ग को इस भाषा के प्रति आकर्षित करने के लिए रोजगार से जोड़ना होगा। वहीं इसके प्रचार-प्रसार में सरकारी प्रयास की जरूरत है।
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भोजपुरी संगम संयोजक कुमार अभिनीत ने बताया कि हिंदी का हमारे जीवन से गहरा नाता है। हम चाह कर भी इसे अपने से अलग नहीं कर सकते हैं। फैशन एवं हमारे जीवन में अंग्रेजी की दखल ने हिंदी से दूर करने व हिंदी को दूषित करने की भरपूर कोशिश की है। इसका कुछ असर भी है, लेकिन हिंदी अपनी व्यापकता के चलते आज भी माथे की बिंदी बनी हुई है। बाजार, व्यापार, विज्ञापन, फिल्मों में हिंदी का ही बोलबाला है।
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गीतकार चंदेश्वर परवाना ने बताया कि हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसमें लिखना, पढ़ना और बोलना आसान है। यही कारण है कि हिंदी की पहचान और व्यापकता दूसरी भाषाओं से ज्यादा है। सरस, सरल और बोधगम्य होने के कारण ही तो हमारी दिनचर्या में समाहित है। हिंदी हमारा सम्मान ही नहीं अभिमान भी है। हिंदी को रोजगारपरक बनाया जाए तो युवा पीढ़ी इसकी ओर आकर्षित होगी।
साहित्यकार सूर्यदेव पाठक पराग ने बताया कि भाषा जब रोजी-रोटी से सीधे जुड़ेगी तभी वह आमजन में स्वीकार्य होगी। हिंदी अधिकाधिक लोगों की भाषा है। इसे नौकरियों में महत्व दिया जाना चाहिए। जब युवा वर्ग, हिंदी को रोजगार पाने में सहायक बना पाएगा तो स्वत: उसका झुकाव बढ़ेगा। ऐसे में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सभी को दृढ़ संकल्प लेना होगा। अगर ऐसा हम कर पाए तो हिंदी अवश्य माथे की बिंदी बनेगी।