गर्व: 33वें मूर्तिदेवी पुरस्कार समारोह में बोले उपराष्ट्रपति, स्वयं को ढूंढने का प्रयास है डॉ. तिवारी की आत्मकथा 'अस्ति व भवति'
उन्होंने कहा कि डॉ. तिवारी ने उन सामयिक घटनाओं का भी जिक्र किया है जिन्होंने इस जीवन यात्रा को प्रभावित किया। उनका मानना है कि लेखक की सार्थकता पाठक को चिंतन की गहराइयों में ले जाकर आत्मरूप को खोजने के लिए प्रेरित करने में है।
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उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने शनिवार को साहित्य अकादमी सभागार में आयोजित 33वें मूर्तिदेवी पुरस्कार समारोह में कहा कि हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की आत्मकथा ‘अस्ति व भवति’ विवादों से दूर, स्वयं को ढूंढने का प्रयास है। उन्होंने इस अवसर पर डॉ तिवारी को उनकी आत्मकथा के लिए मूर्ति देवी पुरस्कार से सम्मानित किया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि लेखक, विचारक, राष्ट्र की बौद्धिक निधि होते हैं। कोई भी राष्ट्र मात्र धनधान्य से समृद्ध नहीं बनता, बल्कि अपने विचारों, संस्कारों से भी समृद्ध बनता है। अपने साहित्य और सृजन से भी समृद्ध होता है।
उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने ट्वीट करते हुए कहा कि हमने पिछले 7 दशकों में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। हालाँकि, हमारे समाज में अभी भी बुनियादी साक्षरता कौशल में भारी असंतुलन मौजूद है। यह चिंता का विषय है।
हम खुद को आईटी में सर्वश्रेष्ठ साबित कर रहे हैं और डिजिटलाइजेशन की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन बुनियादी वयस्क शिक्षा पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। कोई देश खुद को विकसित होने का दावा नहीं कर सकता, अगर उसकी 15 प्रतिशत आबादी भी शिक्षित नहीं है। यह देश और नेतृत्व के लिए एक चुनौती है।
जो मैं हूं और जो होना चाहता हूं ...इन्हीं दो ध्रुवों के बीच की यात्रा है यह जीवन
उपराष्ट्रपति नायडू ने कहा कि डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की आत्मकथा भगवान बुद्ध के जीवन के एक प्रसंग अत्तानम् किन्न, खुद को क्यों नहीं खोजते, से प्रारंभ हुई है। हमारी दर्शन परंपरा का हवाला देते हुए वो मानते हैं कि आत्मज्ञान से ही ब्रह्मज्ञान तक पहुंचा जा सकता है। आपका मानना है कि आत्मज्ञान ही ज्ञान है, बाकी सब तो सूचना मात्र है। स्वयं मुझे भी पुस्तक का शीर्षक ‘अस्ति व भवति’ को लेकर जिज्ञासा थी। इसका उत्तर मुझे इस पुस्तक से मिला। जो मैं हूं और जो होना चाहता हूं ...इन्हीं दो ध्रुवों के बीच की यात्रा है यह जीवन। जिसे इस आत्मकथा में पूरी निष्ठा से बताया गया है।
उन्होंने कहा कि डॉ. तिवारी ने उन सामयिक घटनाओं का भी जिक्र किया है जिन्होंने इस जीवन यात्रा को प्रभावित किया। उनका मानना है कि लेखक की सार्थकता पाठक को चिंतन की गहराइयों में ले जाकर आत्मरूप को खोजने के लिए प्रेरित करने में है। इस आत्मकथा के पाठकों को उनके आत्म रूप से साक्षात्कार शुभ हो, इसी कामना के साथ मैं डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को बधाई देता हूं। इस सुअवसर पर मुझे अपने विचार साझा करने का अवसर दिया, इसके लिए आप सभी सुधी विद्वत समाज को हार्दिक धन्यवाद देता हूं।
समाज की स्वीकृति होता है पुरस्कार : प्रो तिवारी
प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने पुरस्कार पाने के बाद कहा कि पुरस्कार समाज की स्वीकृति होती है। इससे लेखक का हौसला बढ़ता है। यह पुरस्कार पाकर बहुत खुशी हुई है। प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की कृति, ‘अस्ति व भवति’ साल 2014 में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास दिल्ली से प्रकाशित हुई थी। प्रो. तिवारी गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आचार्य और वर्ष 2013 से 2017 तक केंद्रीय साहित्य अकादमी, दिल्ली के अध्यक्ष रहे हैं। मूर्तिदेवी पुरस्कार भारतीय संविधान में स्वीकृत 22 भाषाओं में से किसी एक भाषा की चयनित कृति को दिया जाता है। यह पुरस्कार पहली बार 1983 में कन्नड़ लेखक सीके नागराज राव को प्राप्त हुआ था।स्मृतियों का जीवंत चित्रण है अस्ति व भवति’
प्रो. तिवारी कृत ‘अस्ति व भवति’ उनके 50 से अधिक वर्षों के सार्वजनिक जीवन का आईना है। इसमें डॉ. तिवारी ने देश की समस्याओं, संकटों, विकास, राजनीतिक टकरावों, लेखकों के विचारों, वैश्वीकरण के दौर में बदले मूल्यों से लेकर घर-परिवार, गांव-दुनिया से जुड़ी स्मृतियों का जीवंत चित्रण प्रस्तुत किया है।‘दस्तावेज’ के संपादक हैं प्रो. तिवारी
कुशीनगर जिले में स्थित रायपुर भैंसही-भेड़िहारी गांव में 20 जून 1940 को पैदा हुए प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष भी रहे हैं। वह साहित्यिक पत्रिका ‘दस्तावेज’ के संपादक भी हैं। साहित्य के लिए वह इंग्लैंड, मॉरीशस, रूस, नेपाल, अमरीका, नीदरलैंड, जर्मनी, फ्रांस, लक्जमबर्ग, बेल्जियम, चीन, आस्ट्रिया, जापान और थाईलैंड आदि देशों की यात्रा कर चुके हैं।मिल चुके हैं ये सम्मान
प्रो. विश्वनाथ तिवारी को तमाम पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्हें साहित्य अकादमी का महतर सम्मान मिला। उन्हें व्यास सम्मान, रूस का पुश्किन सम्मान, शिक्षक श्री सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, हिंदी गौरव सम्मान, महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन सम्मान, महादेवी वर्मा गोयनका सम्मान, भारतीय भाषा परिषद का कृति सम्मान मिल चुका है।रचनाओं का सफर
प्रो. तिवारी 1978 से हिंदी की साहित्यिक पत्रिका दस्तावेज का लगातार संपादन-प्रकाशन कर रहे हैं। दस्तावेज के लगभग दो दर्जन विशेषांक प्रकाशित हुए हैं। दस्तावेज को सरस्वती सम्मान भी मिल चुका है। उनके शोध व आलोचना के 12 ग्रंथ, सात कविता संग्रह, चार यात्रा संस्मरण, तीन लेखकीय-संस्मरण व एक साक्षात्कार प्रकाशित हो चुका है।‘एक राष्ट्रीय भाषा है प्रत्येक भारतीय भाषा ’
इस बात पर बल देते हुए कि प्रत्येक भारतीय भाषा एक राष्ट्रीय भाषा है, उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रीय मीडिया से सभी भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य को पर्याप्त स्थान देने का आग्रह किया। भारत की गौरवशाली संस्कृति और मूल्यों और नैतिकता के सम्मान को याद करते हुए, नायडू ने लेखकों को देश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम से इन गुणों को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया।
धर्म धर्म नहीं है, यह सभी का कर्तव्य है
धर्म का अर्थ बताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि धर्म धर्म नहीं है, बल्कि यह हम सभी का कर्तव्य है। उन्होंने कहा, ‘अगर कोई अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन कर रहा है, तो वह सच्चे अर्थों में देशभक्त है।’ भारतीय भाषाओं में साहित्य के अनुवाद और प्रचार के लिए साहित्य अकादमी जैसी संस्थाओं के प्रयासों की सराहना करते हुए नायडू ने कहा कि इस दिशा में और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है और इसके लिए नवीनतम तकनीकों का पूरी तरह से उपयोग किया जाना चाहिए।
सभी शोध पुस्तक रूप में प्रकाशित हो
उन्होंने यह भी कहा कि अन्य भारतीय भाषाओं से अनुवादित साहित्यिक कृतियों को हमारे विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। इस बात पर जोर देते हुए कि विश्वविद्यालय अनुसंधान से व्यापक रूप से समाज को लाभ होना चाहिए, उपराष्ट्रपति ने शोध थीसिस को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने का आह्वान किया।
लिट फेस्ट ने युवाओं को मंच दिया
पिछले कुछ वर्षों में कई शहरों में आयोजित साहित्यिक उत्सवों या लिट फेस्ट का उल्लेख करते हुए, नायडू ने कहा, ‘इन लिट फेस्ट ने युवा लेखकों को अपनी रचनाओं को समाज और मीडिया के सामने पेश करने के लिए एक मंच दिया है।’ इस अवसर पर भारतीय ज्ञानपीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति विजेंद्र जैन, भारतीय ज्ञानपीठ के प्रबंध न्यासी साहू अखिलेश जैन और अन्य मौजूद थे।